डीडी कोसंबी : इतिहासकार, गणितज्ञ और शांतिदूत

Update: 2018-08-01 02:17 GMT

गणित को ‘प्रकृति की भाषा’ मानने वाले कोसंबी का कहना था कि ‘गणित के निष्कर्ष बिलकुल स्पष्ट होते हैं और उनसे एक विशेष बौद्धिक संतुष्टि मिलती है...

इतिहासकार और गणितज्ञ डीडी कोसंबी के जन्मदिन पर उनके समाज के लिए के योगदान और व्यक्तित्व को याद कर रहे हैं शुभनीत कौशिक

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इतिहासकार, गणितज्ञ, मुद्राशास्त्री डीडी कोसंबी का कल 31 जुलाई को 111वां जन्मदिन था। दामोदर धर्मानंद कोसंबी (1907-1966) को भारतीय इतिहासलेखन को नई दिशा देने और इतिहास संबंधी शोध को अपनी अंतर्दृष्टि से समृद्ध करने के लिए जाना जाता है।

भारतीय इतिहास से जुड़ी उनकी तीन किताबें क्लासिक का दर्ज़ा रखती हैं। ये हैं : ‘एन इंटरोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ (1956); ‘मिथ एण्ड रियलिटी’ (1962) और ‘द कल्चर एण्ड सिविलाइज़ेशन ऑफ एन्शियंट इंडिया’ (1965)। ‘वंडर दैट वाज़ इंडिया’ सरीखी प्रसिद्ध किताब लिखने वाले इतिहासकार एएल बाशम ने कोसंबी के बारे में लिखा है कि ‘उन्हें अपने जीवन में तीन विषयों से अनन्य लगाव रहा : अपने विविध पक्षों में भारतीय इतिहास; गणित और विश्व शांति।’

डीडी कोसंबी की आरंभिक पढ़ाई पुणे में हुई, जहाँ उनके पिता और बौद्ध दर्शन के अधिकारी विद्वान धर्मानंद कोसंबी फर्ग्युसन कॉलेज में पालि भाषा के शिक्षक थे। अपने पिता और बड़ी बहन के साथ डीडी कोसंबी वर्ष 1918 में हावर्ड गए। जहाँ धर्मानंद कोसंबी ‘हावर्ड ओरियंटल सीरीज’ के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली ‘विशुद्धिमग्ग’ का सम्पादन कर रहे थे।

डीडी कोसंबी की आगे की शिक्षा यहीं से पूरी हुई। जहाँ उन्होंने गणित के साथ-साथ ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, और जर्मन भाषाओं पर भी अधिकार प्राप्त किया। युवा कोसंबी जहाँ एक ओर हंबोल्ट, आइंस्टीन, फ्रायड, एचजी वेल्स के लेखन के मुरीद थे, वहीं लुई पाश्चर और क्लाड बर्नार्ड की जीवनियाँ उन्हें ख़ासी प्रभावित करती थीं।

गणित को ‘प्रकृति की भाषा’ मानने वाले कोसंबी का कहना था कि ‘गणित के निष्कर्ष बिलकुल स्पष्ट होते हैं और उनसे एक विशेष बौद्धिक संतुष्टि मिलती है।’ अमेरिका से लौटने के बाद कोसंबी ने बीएचयू, एएमयू, फर्ग्युसन कॉलेज और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च सरीखे संस्थानों में गणित का अध्यापन किया।

विज्ञान की बात करें तो, कोसंबी ने सांख्यिकी और गणित (टेंसर एनालिसिस और पाथ जियोमेट्रि) में विशिष्ट योगदान दिया। आनुवांशिकी से संबंधित अपने एक लेख में कोसंबी ने गुणसूत्रों से जुड़ी अपनी अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे ‘कोसंबी फॉर्मूला फॉर क्रोमोसोम मैपिंग’ के नाम से जाना जाता है।

सांख्यिकी में उनकी रुचि उन्हें प्राचीन मुद्राओं के विशद अध्ययन की ओर ले गई। इस अध्ययन की शुरुआत आहत मुद्राओं से हुई। कोसंबी का मानना था कि प्राचीन मुद्राओं का हरेक संग्रह समाज-विशेष की स्पष्ट छाप लिए होता है। सिक्कों के अपने अध्ययन से कोसंबी ने भारतीय मुद्राविज्ञान को एक नया आयाम दिया।

सिक्कों के साथ उनकी रुचि संस्कृत के ग्रन्थों में, उनके ऐतिहासिक महत्त्व में हुई। इसके लिए उन्होंने भर्तृहरि के शतकत्रयी (नीति, शृंगार और वैराग्य) को चुना। अपने पिता की भांति डीडी कोसंबी ने भी हावर्ड ओरियंटल सीरीज के अंतर्गत विद्याकर की कृति ‘सुभाषितरत्नकोश’ का सम्पादन किया।

अपनी इतिहास की किताबों में कोसंबी ने भारतीय इतिहास के परंपरागत काल-विभाजन को चुनौती दी। साथ ही, उन्होंने इतिहासकार के लिए पुरातत्त्व, नृविज्ञान, समाजविज्ञान, भाषा-विज्ञान से अंतर्दृष्टि हासिल करने और एक सुसंगत ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य विकसित करने को जरूरी बताया।

मार्क्सवादी सिद्धांतों का इस्तेमाल करते हुए भी कोसंबी ने इतिहासकार को चेताया कि “मार्क्स के सिद्धांतों को अपनाने का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि मार्क्स के निष्कर्षों को आँखें मूँदकर दुहराया जाये।” ख़ुद, कोसंबी ने मार्क्स के ‘अपरिवर्तनशील और आत्म-निर्भर भारतीय गाँवों’ की अवधारणा को चुनौती दी।

भारत में सामंतवाद के बारे में कोसंबी की मान्यताओं ने आगे चलकर सामंतवाद को लेकर एक विचारोत्तेजक बहस की शुरुआत की। साथ ही, उन्होंने कबीले और जाति के सम्बन्धों, बौद्ध धर्म और भारत में व्यापार, मिथकों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ, और भारत में सामंतवाद की प्रकृति के विषय में भी उल्लेखनीय काम किया। इसके साथ ही वे विश्व में शांति-स्थापना के लिए भी निरंतर सक्रिय रहे।

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