दिल्ली हाईकोर्ट का निर्देश पति वेतन का एक-तिहाई गुजारा भत्ता दे पत्नी को

Update: 2019-06-07 17:02 GMT

पहले भी कोर्ट ने दिया था निर्देश पति कुल सैलरी का 30 फीसदी गुजारा भत्ता दे पत्नी को, मगर इस फैसले को महिला के पति ने दी थी चुनौती, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने गुजारा भत्ता 30 से घटाकर कर दिया था सैलरी का 15 फीसदी, अब महिला ने खटखटाया था दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा....

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि पति की कुल वेतन का एक तिहाई हिस्सा पत्नी को गुजारा भत्ते के तौर पर दिया जाए। हाईकोर्ट ने कहा कि आमदनी के बंटवारे का फार्मूला तय है। इसके तहत नियम है कि अगर कोई और निर्भर नहीं हो तो पति की कुल सैलरी के दो हिस्से पति के पास और एक हिस्सा पत्नी को दिया जाएगा। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता महिला की अर्जी पर फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया है कि महिला को पति के वेतन से 30 फीसद दिया जाए।

जिस मामले में कोर्ट ने यह फैसला दिया है, उसमें महिला की शादी 7 मई 2006 को हुई थी। उनके पति सीआईएसएफ में इंस्पेक्टर हैं। 15 अक्टूबर 2006 को दोनों अलग हो गए। उसके बाद महिला ने गुजारा भत्ते के लिए अर्जी दी। 21 फरवरी 2008 को महिला का गुजारा भत्ता तय किया गया। इसके तहत उनके पति को निर्देश दिया गया कि वह अपनी कुल सैलरी का 30 फीसदी पत्नी को दें। फैसले को महिला के पति ने चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने गुजारा भत्ता 30 फीसदी से घटाकर सैलरी का 15 फीसदी कर दिया। तब फैसले को महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

महिला के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने गुजारा भत्ता 15 फीसदी कर दिया और कोई ठोस कारण नहीं बताया। वहीं पति की ओर से दलील दी गई कि महिला अकाउंट की डिटेल बताएं और साफ करें कि अकाउंट में किस-किस सोर्स से पैसे आए। महिला ने अकाउंट डिटेल में बताया कि उनके पिता ने खर्चे के लिए पैसे दिए

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव सचदेवा ने अपने फैसले में कहा कि यह तय है कि 21 फरवरी 2008 को जो गुजारा भत्ता तय किया था, उसके तहत महिला को उसके पति की कुल सैलरी का 30 फीसदी गुजारा भत्ता तय किया गया था। पैसे के बंटवारे का फार्मूला तय है। इसी कारण अदालत ने 30 फीसदी गुजारा भत्ता महिला को देने का कहा था। हाईकोर्ट ने डिपार्टमेंट को निर्देश दिया है कि वह सैलरी से 30 फीसदी काटकर पत्नी को सीधे भेजे।

देवर को भी देना पड़ सकता है गुजारा भत्ता

इस बीच उच्चतम न्यायालय ने गुजारा भत्ता मामले में अहम फैसला दिया है। कोर्ट का कहना है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत देवर को भी पीड़ित महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया जा सकता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा होने पर संबंधित परिवार के किसी भी वयस्क पुरुष को राहत नहीं दी जा सकती है। घरेलू हिंसा कानून का दायरा काफी व्यापक है और इसमें परिवार का हर वयस्क पुरुष आता है। इसके तहत पीड़ित पत्नी या शादी जैसे रिश्ते में रह रही कोई भी महिला पति/पुरुष साथी के रिश्तेदार के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि कानून के सेक्शन 2 (एफ) में 'घरेलू रिश्तेदारी' को व्यापक ढंग से समझाया गया है। घरेलू रिश्तेदारी वह रिश्तेदारी है, जिसमें कोई युगल शादी के बाद संयुक्त परिवार में रहता है या ऐसे घर में रहता है जहां परिवार के अन्य सदस्य भी रहते हैं।

उच्चतम न्यायालय पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महिला के देवर को आदेश दिया था कि वह पीड़िता को प्रतिमाह 4 हजार रुपये और उसकी बच्ची को दो हजार रुपये प्रतिमाह बतौर गुजारा भत्ता दे। इस महिला के पति की मौत हो चुकी है।

फैसले के खिलाफ अपील में देवर का कहना था कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत वह अपने दिवंगत भाई की पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। हालांकि कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि कानून के सेक्शन 12 के तहत मैजिस्ट्रेट को पूरा अधिकार है कि वह पीड़ित महिला को गुजारा भत्ता दिलवाने का आदेश दे सकता है। इस केस में पीड़ित महिला ने गुजारा भत्ता दिलाए जाने के पर्याप्त आधार दिए हैं।

गुजारा भत्ता पाने का अधिकार

एक अन्य मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा है कि अगर कोई महिला अपने पति से गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को छोड़ भी देती है तो भी आपराधिक दंड प्रक्रिया के तहत यह मांग करने का उसका अधिकार बरकरार रहता है। न्यायाधीश एम एस सोनाक ने एक फैसले में कहा कि पत्नी को गुजारा भत्ता दिलाने वाली सीआरपीसी की धारा 125 को जनहित में जोड़ा गया है। महाराष्ट्र के सांगली के एक निवासी की ओर से दाखिल याचिका पर उच्च न्यायालय सुनवाई कर रहा था। यचिका में निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें परित्यक्त पत्नी को गुजारा भत्ता देने को कहा गया था।

याचिका के अनुसार, एक दंपति ने 2012 में एक लोक अदालत में विवाह संबंध समाप्त करने के लिए एक संयुक्त याचिका दाखिल की थी। उन्होंने एक दूसरे से गुजारा भत्ता का दावा करने का अधिकार छोड़ने के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी किए थे। घटना के एक साल बाद पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम तथा सीआरपीसी के तहत कार्रवाई शुरू करते हुए दावा किया कि उसके पति ने गलत तरीके से उससे सहमति हासिल कर ली थी।

साथ ही महिला ने पति से प्रति माह गुजारा भत्ता की मांग की। मजिस्ट्रेट और सत्र अदालत ने महिला की याचिका बरकरार रखी, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय की शरण ली। उसने दावा किया कि पत्नी ने पहले अपनी मर्जी से गुजारा भत्ता का अधिकार छोड़ दिया था। इस पर न्यायमूर्ति सोनाक ने यह फैसला सुनाया।

गुजारा भत्ता कानून पर बदलता अदालती नजरिया

गुजारा भत्ता कानून का महिलाओं द्वारा बार—बार दुरुपयोग किए जाने के चलते अदालतें अब चौकन्नी हो गई हैं। वे फैसला सुनाने से पहले पत्नी से ऐसी जिरह करती हैं कि वह पति को ठग न सके। अदालतें अब आत्मनिर्भर महिलाओं को गुजारा भत्ता देने से साफ इनकार करने लगी हैं। अदालतें उन महिलाओं की गुजारे भत्ते की मांग को खारिज कर रही हैं जो पति से वसूली की मंशा रखते हुए तलाक से पहले अपनी नौकरी छोड़ देती हैं या सक्षम होते हुए भी कुछ काम नहीं करतीं। बदलते माहौल में अदालतें अब पत्नी की योग्यता और कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद ही उन्हें गुजारे भत्ते का हकदार ठहरा रही हैं। पत्नी को हर प्रकरण में गुजारा भत्ता मिल ही जाएगा, यह जरूरी नहीं।

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