मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर

Update: 2019-02-06 16:30 GMT

पाकिस्तान के एक मशहूर शायर सलमान हैदर की एक कविता ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर' लिखे जाने के बाद से ही चर्चा का विषय बनी हुई है और पाकिस्तान में इस कविता पर 2014 के बाद से ही विवाद हो रहा है। यह कविता न सिर्फ पाकिस्तान और मुस्लिम कट्टरपंथी बल्कि भारत और हिन्दू कट्टरपंथियों पर भी बिलकुल सही बैठती है।

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर

फूलों की खुशबू भी काफ़िर

शब्दों का जादू भी काफ़िर

यह भी काफिर, वह भी काफिर

फ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िर

नूरजहां का गाना काफिर

मैकडोनैल्ड का खाना काफिर

बर्गर काफिर, कोक भी काफ़िर

हंसी गुनाह, जोक भी काफ़िर

तबला काफ़िर, ढोल भी काफ़िर

प्यार भरे दो बोल भी काफ़िर

सुर भी काफिर, ताल भी काफ़िर

भांगरा, नाच, धमाल भी काफ़िर

दादरा, ठुमरी, भैरवी काफ़िर

काफी और खयाल भी काफ़िर

वारिस शाह की हीर भी काफ़िर

चाहत की जंजीर भी काफ़िर

जिंदा-मुर्दा पीर भी काफ़िर

भेंट नियाज़ की खीर भी काफ़िर

बेटे का बस्ता भी काफ़िर

बेटी की गुड़िया भी काफ़िर

हंसना-रोना कुफ़्र का सौदा

गम काफ़िर, खुशियां भी काफ़िर

जींस भी और गिटार भी काफ़िर

टखनों से नीचे बांधो तो

अपनी यह सलवार भी काफ़िर

कला और कलाकार भी काफ़िर

जो मेरी धमकी न छापे

वह सारे अखबार भी काफ़िर

यूनिवर्सिटी के अंदर काफ़िर

डार्विन भाई का बंदर काफ़िर

फ्रायड पढ़ाने वाले काफ़िर

मार्क्स के सबसे मतवाले काफ़िर

मेले-ठेले कुफ़्र का धंधा

गाने-बाजे सारे फंदा

मंदिर में तो बुत होता है

मस्जिद का भी हाल बुरा है

कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर

कुछ मस्जिद में अंदर काफ़िर

मुस्लिम देश में अक्सर काफ़िर

काफ़िर काफ़िर मैं भी काफ़िर

काफ़िर काफ़िर तू भी काफ़िर!

(स्रोत - इतिहासकार शम्सुल इस्लाम से प्राप्त)

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