पेट्रोलियम पदार्थ नहीं गैर परंपरागत ऊर्जा संसाधन हैं भविष्य की ताकत

Update: 2018-12-03 13:19 GMT

अजीब संयोग ही है कि अमेरिका की वर्तमान सरकार सारे संसाधन के बाद भी ऐसे किसी भी परिवर्तन का प्रबल विरोध कर रही है। दूसरी तरफ अनेक देशों का महत्व ऐसे संसाधनों के कारण भविष्य में बढ़ जाएगा...

बता रहे हैं वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय

जनज्वार। जीवाष्म ईंधनों के इस दौर में पेट्रोलियम उत्पादक देश प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर दुनिया की शक्ति का केंद्र हैं। सभी शक्तिशाली देश इस पर अपना नियंत्रण रखना चाहते हैं और यही नियंत्रण का प्रयास इन देशों को शांति से नहीं रहने देता। ईरान, इराक, लीबिया, कुवैत, वेनेज़ुएला, अल्जीरिया और नाइजीरिया जैसे देश हमेशा गृहयुद्ध या फिर विदेशी आक्रमण की चपेट में रहते हैं। पर अब यह माना जाने लगा है कि पेट्रोलियम पदार्थों की अवनति का दौर शुरू हो चुका है और अक्षय ऊर्जा या गैर-परंपरागत ऊर्जा संसाधनों का दौर शुरू हो चुका है।

बीसवीं सदी में ऊर्जा का मतलब कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस था, पर अब अक्षय ऊर्जा संसाधनों का दौर है और इनके लिए आवश्यक संसाधनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। सौर ऊर्जा में सिलिकॉन टेक्नोलॉजी का व्यापक उपयोग किया जा रहा है, इसके लिए रॉक क्वार्त्ज़ाइट की जरूरत होती है।

बिजली वाले वाहनों की बैटरी के लिए लिथियम की जरूरत है। पवन टरबाइन जेनरेटर के चुम्बक के लिए नियोडामीयम जैसे दुर्लभ मृदा धातुओं की और पवन ऊर्जा के संयंत्र में व्यापक तौर पर ताम्बा की जरूरत पड़ती है।

रॉक क्वार्त्ज़ाइट के सबसे बड़े भण्डार चीन, अमेरिका और रूस में हैं। ब्राज़ील और नोर्वे में भी रॉक क्वार्त्ज़ाइट मिलता है।

अमेरिका और चीन में ताम्बे के भंडारों का व्यापक दोहन किया जा रहा है, पर इसका खनन चिली, पेरू, कांगो और इंडोनेशिया में भी किया जा रहा है। लिथियम के सबसे बड़े भंडार चिली में हैं, पर चीन, ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना में भी यह उपलब्ध है। बोलीविया और अमेरिका में निम्न गुणवत्ता का लिथियम उपलब्ध है। दुर्लभ मृदा धातुओं के भंडार चीन, रूस, ब्राज़ील और वियतनाम में हैं।

वर्तमान में जीवाष्म ईंधनों के उत्पादक देशों में अमेरिका, चीन, रूस और कनाडा ऐसे देश हैं जो बिना किसी परेशानी के इन ईंधनों के बदले अक्षय ऊर्जा का आसानी से उपयोग कर सकते हैं। यह एक अजीब संयोग ही है कि अमेरिका की वर्तमान सरकार सारे संसाधन के बाद भी ऐसे किसी भी परिवर्तन का प्रबल विरोध कर रही है। दूसरी तरफ अनेक देशों का महत्व ऐसे संसाधनों के कारण भविष्य में बढ़ जाएगा।

आर्गेनाईजेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कन्ट्रीज (ओपेक) 14 देशों का संगठन है जिसके सदस्य विश्व में खर्च होनेवाले कुल पेट्रोलियम पदार्थों में से 47 प्रतिशत का उत्पादन करते हैं, और इसके 75 प्रतिशत भंडार के मालिक हैं। इसकी स्थापना 1960 में बगदाद में की गयी थी और उस समय ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ये पांच सदस्य थे।

अब इन देशों के साथ-साथ अल्जीरिया, अंगोला, इक्वेडोर, लीबिया, नाइजीरिया, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात भी सदस्य हैं। ओपेक का मुख्यालय विएना में है और इसके पूरे तेल उत्पादन में से दो-तिहाई मध्य-पूर्व के देशों में होता है। भविष्य में संभव है, ओपेक का महत्व कम हो जाये और इसी की तर्ज पर अक्षय ऊर्जा स्त्रोतों के संसाधनों वाले देशों का एक नया शक्तिशाली संगठन बन जाये। फिर मध्य-पूर्व जैसा महत्व संभवतः केंद्रीय अफ्रीका और दक्षिण अमेरिकी देशों का हो जाए।

लेकिन यह सब शांतिपूर्ण तरीके से होगा इसमें संदेह है। तेल के भंडार पर नियंत्रण करने को लेकर बीसवीं सदी में अधिकतर झगड़े, युद्ध और द्वंद्व होते आये हैं। अक्षय ऊर्जा संसाधनों का नियंत्रण भी ऐसी ही स्थिति पैदा कर सकता है। अमीर देश हमेशा इन देशों को अपने नियंत्रण में रखना चाहेंगे, जिससे इन साधनों तक उनकी पहुँच लगातार बनी रहे।

चीन ने इस दिशा में पिछले दशक से ही तैयारी शुरू कर दिया है। पिछले दशक में चीन ने अफ्रीका के खदानों में भारी-भरकम निवेश किया था और अब इसी तारक का निवेश पेरू और चिली जैसे दक्षिण अमेरिकी देशों में कर रहा है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञ इसे आर्थिक उपनिवेश की नीति बताते हैं।

इन सबके बाद भी पेट्रोलियम पदार्थों और अक्षय ऊर्जा में एक बड़ा अंतर है। पेट्रोलियम पदार्थों की लगातार जरूरत पड़ती है जबकि अक्षय ऊर्जा सूर्य या हवा जैसे संसाधनों पर निर्भर है। बहार के संसाधनों की जरूरत इसका ढांचा तैयार करने के लिए होती है और एक बार ढांचा तैयार होने पर लंबे समय तक इन पदार्थों की जरूरत नहीं पड़ती। वाहनों की अपेक्षाकृत कम आयु के कारण लिथियम की मांग लगातार होगी, पर रिसाइककल कर इसे उपयोग में लेन पर इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

कुछ भी हो, इतना तो निश्चित है कि भविष्य में बहुत कुछ बदलने वाला है और इसके लिए तापमान वृद्धि काफी हद तक जिम्मेदार है।

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