आरबीआई और मोदी सरकार पर सोचिए, समझिए, सवाल करिए

Update: 2018-12-16 13:19 GMT

आरबीआई पर बेवजह नियमों में बदलाव और सरकार को पैसे देने का दबाव किस हद तक रहा होगा जो नोटबंदी जैसे अहम फ़ैसले पर रबर स्टाम्प की भूमिका निभाने वाले गवर्नर उर्जित पटेल को भी विद्रोह करना पड़ गया...

बता रहे हैं स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अनुपम

आरबीआई बोर्ड के साथ हुए मैराथन मीटिंग में लगता है सरकार ने थोड़ा बहुत डैमेज कंट्रोल कर लिया है। आज की परिस्थितियों में गवर्नर उर्जित पटेल अगर इस्तीफ़ा दे देते तो मोदी सरकार की बहुत फजीहत होती, लेकिन लगता है फिलहाल के लिए समझौता हो गया है।

भले ही मुख्यधारा की भारतीय मीडिया देश के ऐसे गंभीर मुद्दों पर आम जनता को पर्याप्त ढंग से सूचित न कर रही हो, लेकिन ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको जरूर समझना चाहिए कि देश कैसे चल रहा है और हमारी सरकार क्या खेल कर रही है। इस सरकार के काम करने के तरीके का एक उदाहरण है आरबीआई का वर्तमान प्रकरण।

इस सरकार के कार्यकाल से ये स्पष्ट है कि मोदी-शाह के लिए देश के सभी संस्थान राजनीतिक मशीनरी का हिस्सा मात्र हैं। चाहे वो सीबीआई हो, चुनाव आयोग या आरबीआई। इस सरकार ने संस्थाओं को सिर्फ़ ध्वस्त ही नहीं किया, बल्कि अपने राजनीतिक फायदों के लिए बेशर्मी से इस्तमाल भी किया है।

चुनावी साल आ चुका है और हमारे प्रधानमंत्री हमेशा इकोनॉमिक्स से ज़्यादा तरजीह पॉलिटिक्स को देते रहे हैं। ऊपर से चौकीदार के क़रीबी दोस्तों ने ही चोरी कर ली और देश का पैसा लेकर विदेश फ़रार हो गए। इसलिए सरकार को अब पैसों की ज़रूरत है, क्योंकि चुनावों को देखते हुए घोषणाएं करनी हैं, राजनीति को प्रभाव करने वाले कुछ कदम उठाने हैं।

तो आरबीआई पर बेवजह नियमों में बदलाव और सरकार को पैसे देने का दबाव बनाया जाने लगा। आप सोच सकते हैं कि ये दबाव किस हद तक रहा होगा जो नोटबंदी जैसे अहम फ़ैसले पर रबर स्टाम्प की भूमिका निभाने वाले गवर्नर उर्जित पटेल को भी विद्रोह करना पड़ गया!

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के सेंट्रल बोर्ड पर 18 सदस्य हैं। पिछले कुछ महीनों में सरकार ने खुलकर ऐसे लोगों की नियुक्ति कर डाली है जो सत्ताधारी पार्टी से जुड़े रहे हैं या सरकारी हस्तक्षेप के पक्षधर हैं। अगस्त में एस. गुरुमूर्ति और सतीश मराठे को आरबीआई की सेंट्रल बोर्ड में डाल दिया गया। नियुक्ति से ठीक पहले तक गुरुमूर्ति स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक थे।

सतीश मराठे एक एनजीओ चलाते हैं और अपने युवाकाल में बीजेपी की छात्र संगठन से जुड़े थे जिसके वो चार साल तक कोषाध्यक्ष भी रहे। इसी तरह पिछले महीने सरकार ने स्वतंत्र राय रखने वाले बोर्ड सदस्य नचिकेत मोर को हटाकर पूर्व आईएएएस अधिकारी रेवती अय्यर और दिल्ली में एक थिंक-टैंक चलाने वाले सचिन चतुर्वेदी की बोर्ड में नियुक्ति कर दी। आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने नचिकेत को हटाने की मांग की थी।

अपने लोगों को नियुक्त तो पहले की सरकारों ने भी किया, लेकिन आरबीआई में कभी भी ऐसे लोगों को नियुक्त करने की परंपरा नहीं थी जो घोषित तौर पर सार्वजनिक रूप से किसी राजनीतिक विचारधारा के पक्षधर हों। पहले तो बोर्ड के नए सदस्यों के लिए प्रस्ताव ख़ुद रिज़र्व बैंक की तरफ़ से आया करता था।

अगर सरकार किसी को नियुक्त करे तो गवर्नर से सलाह मशविरा करने की परंपरा थी। लेकिन जब से मोदी जी देश के प्रधानसेवक बने हैं, कोई सलाह विचार नहीं होता। वही होता है जो मंज़ूर-ए-साहेब होता है!

अब कुछ लोगों को लग सकता है कि अगर हमने मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाया है तो उन्हीं की मर्ज़ी से नियुक्तियां होंगी। मैं भी समझता हूँ कि लगभग हर सरकार अहम पदों पर अपने लोगों को ही नियुक्त करती रही है। पिछली सरकारों ने भी यही किया है। कुछ हद तक बात ठीक भी है।

सरकार चलाने वाले अपने विरोधी विचार वाले लोगों को नियुक्त कर डालेंगे तो काम कैसे होगा। मान लीजिए कोई सरकार फ्री मार्किट की समर्थक है तो किसी ऐसे अर्थशास्त्री को नियुक्त क्यूँ करे जिसके विचार विपरीत हों।

यहाँ तक तो बात समझ आती है, लेकिन दिक्कत तब होती है जब सरकार ये भूल जाए कि संस्थानों में बैठे लोगों का अपना दिमाग भी है और काम करने के अपने तौर तरीके भी हैं। कई मसलों पर विपरीत राय भी हो सकती है, आलोचना भी हो सकती है, विरोध भी हो सकता। हमें चिंता तब ज़रूर करनी चाहिए जब सरकार प्रक्रियाओं को ही ध्वस्त कर दे।

हमें तब ज़रूर सवाल करना चाहिए जब कोई सरकार देशहित को विचारधारा या राजनीति की बलि चढ़ा दे। आज की ये सरकार कुछ ऐसा ही कर रही है। इसलिए समझिए.. सोचिए.. और सवाल करिये!

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