तापमान वृद्धि से 20 फीसदी तक बढ़ गई हैं युद्ध की संभावनायें

Update: 2019-06-30 05:32 GMT

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तापमान वृद्धि के कारण सामाजिक अस्थिरता, अपराध और आत्महत्याएं तो बढ़ती हैं, पर अब नए शोध बता रहे हैं कि इसके कारण युद्ध की संभावनाएं भी बढ़ेंगी

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट

तापमान वृद्धि एक ऐसा विषय है जिस पर चर्चा तो खूब की जाती है, पर इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। इन सबके बीच वैज्ञानिक समय समय पर इसके नए प्रभाव खोजते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार के विशेषज्ञ फिलिप अल्स्तों के अनुसार जिस तरह आर्थिक असमानता है, रंगभेद है उसी तरह तापमान वृद्धि भी दुनिया की आबादी में एक नए तरह का अन्तर पैदा करेगा।

तापमान वृद्धि का सबसे अधिक प्रभाव दुनिया की सबसे गरीब आबादी झेल रही है और दूसरी तरफ अमीर अपने पैसों के बल पर किसी भी समस्या से निजात पा लेते हैं। तापमान वृद्धि से यह अंतर और बढ़ता जाएगा।

रअसल तापमान वृद्धि अमीरों के कारण ही है, जो संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग करते रहे हैं। उन्हें पानी की कमी से दिक्कत नहीं होती, खेती बर्बाद होती है तब भी कोई असर नहीं पड़ता, बाढ़ और सूखा से असर नहीं पड़ता, भयानक गर्मी में भी अमीर ठंडक को खरीद लेते हैं। पर गरीब हरेक मार झेलता है, बर्बाद होता है और मरता है।

फिलिप अल्स्तों के अनुसार यह अंतर इतना बढ़ेगा कि दुनिया में दो वर्ग हो जायेंगे और इनमें आपस में लगातार मतभेद होते रहेंगे। हालात तब और खराब होंगे जब पीड़ित तबका यह समझाने लगेगा कि अमीरी ही उनकी इन सारी समस्याओं की जड़ में है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार तापमान वृद्धि से दुनियाभर में जो विकास, स्वास्थ्य, और गरीबी उन्मूलन में प्रगति दर्ज की गयी है, उस पर पानी फिर जाएगा। विकसित देशों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन दुनिया में तापमान वृद्धि के लिए 70 प्रतिशत से भी अधिक जिम्मेदार है, जबकि दुनिया की गरीब आबादी द्वारा तापमान वृद्धि में केवल 10 प्रतिशत का ही योगदान है। पर इस गरीब 50 प्रतिशत आबादी से जीवन, पानी, खाद्यान्न सुरक्षा, आवास, लोकतंत्र और क़ानून का अधिकार छीनता जा रहा है। यह एक भयानक और विस्फोटक स्थिति है।

तापमान वृद्धि के कारण सामाजिक अस्थिरता, अपराध और आत्महत्याएं तो बढ़ती हैं, पर अब नए शोध बता रहे हैं कि इसके कारण युद्ध की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। जून में प्रतिष्टित वैज्ञानिक पत्रिका, नेचर में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार पिछली शताब्दी में केवल तापमान वृद्धि के कारण युद्ध की संभावनाएं 3 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गयीं। आगे भी यदि इस शदाब्दी के अंत तक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होगी, तब युद्ध की संभावनाएं 13 प्रतिशत तक बढ़ेंगी।

वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि दुनियाभर में सरकारों का यही रवैया रहा तब तापमान 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा और युद्ध की संभावनाएं 26 प्रतिशत तक बढ़ जायेंगी। इस अध्ययन को स्तान्फोर्ड एनवायर्नमेंटल असेसमेंट फैसिलिटी की वैज्ञानिक कैथेरीन मच की अगुवाई में किया गया है।

जुलाई 2016 में प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंसेज के अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार जिन देशों में जातिगत और वर्ण से सम्बंधित विविधताएं अधिक हैं वहां तापमान वृद्धि के कारण अधिक अराजकता और युद्ध होंगे। इसमें उत्तरी और केन्द्रीय अफ्रीका के देश और केन्द्रीय एशिया के देश प्रमुख हैं। इस अध्ययन को पाट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च ने किया है।

तना तो तय है कि दुनिया का भविष्य भयानक है, इसमें अपराध और युद्ध का बोलबाला होगा और एक अराजक समाज होगा। तब शायद युद्ध को भी एक प्राकृतिक आपदा माना जाएगा।

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