राम मंदिर निर्माण फिर अटका, चुनाव बाद ही आएगा कोई फैसला

Update: 2019-02-27 08:41 GMT

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगले मंगलवार यानी 5 मार्च को पीठ इस पर फैसला लेगी कि अदालत का समय बचाने के लिए मामले को कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता के जरिए सुलझाया जा सकता है या नहीं...

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

अयोध्या विवाद में राजनीतिक नफे नुकसान के लिए अपने कंधे का इस्तेमाल किये जाने को तगड़ा झटका देते हुये उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने के विकल्प पर एक बार फिर जोर देने का संकेत दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगले मंगलवार यानी 5 मार्च को पीठ इस पर फैसला लेगी कि अदालत का समय बचाने के लिए मामले को कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता के जरिए सुलझाया जा सकता है या नहीं।

उच्चतम न्यायालय ने 8 सप्ताह के लिए मामले की सुनवाई ट्रांसलेशन पर सहमति के लिए टाल दी है। अयोध्या में जमीन विवाद बरसों से चला आ रहा है। अयोध्या विवाद हिंदू मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव का बड़ा मुद्दा रहा है। आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए इस मामले पर देशभर की निगाह टिकी हुई है। उच्चतम न्यायालय के 26 फरवरी के आदेश से स्पष्ट हो गया है कि अब इस मुद्दे पर लोकसभा चुनाव के बाद ही फैसला आयेगा।

उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों की संविधान पीठ अयोध्या मामले की सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस के बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

उच्चतम न्यायालय अब 5 मार्च को तय करेगा कि अयोध्या मामले समझौते के लिए मध्यस्थ के पास भेजा जाए या नहीं। इससे पूर्व पक्षकारों को न्यायालय को बताना होगा कि वे मामले में समझौता चाहते हैं या नहीं? न्यायमूर्ति बोबड़े ने कहा कि यह कोई निजी संपत्ति को लेकर विवाद नहीं है, मामला पूजा-अर्चना के अधिकार से जुड़ा है।

न्यायमूर्ति बोबड़े ने कहा कि हम एक संपत्ति विवाद का फैसला कर सकते हैं, लेकिन हम दोनों पक्षों के रिश्तों में सुधार के बारे में अधिक सोच रहे हैं। यदि मध्यस्थता की जाती है तो ये गोपनीय तरीके से एवं अदालत की निगरानी में होगी। अयोध्या विवाद सिर्फ एक संपत्ति विवाद से "बहुत अधिक" है।

अयोध्या विवाद दशकों तक घसीटा गया मामला है। मध्यस्थता के परिणामस्वरूप विवाद का स्थायी समाधान हो सकता है। यहां तक कि अगर सौहार्दपूर्ण समझौते का एक प्रतिशत मौका भी है तो भी इसे आजमाया जाना चाहिए और मध्यस्थता अदालत के समक्ष लंबित मुकदमे के आसपास होगी। हम इस विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। मध्यस्थता की एक गोपनीय प्रक्रिया भी होगी।

मुख्य न्यायाधीश ने आदेश में कहा है कि अगर अदालत की निगरानी वाली मध्यस्थता का आदेश दिया जाता है, तो ये "अत्यंत गोपनीयता" के साथ किया जाएगा। इस मध्यस्थता में अपील में अदालत के समक्ष उठाए गए मुद्दों का सामना किया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किए गए दस्तावेजों के अनुवाद की सटीकता और प्रासंगिकता को सत्यापित करने के लिए 8 सप्ताह का समय दिया जा रहा है और इस अवधि का उपयोग सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 के तहत मध्यस्थता की संभावना के लिए प्रभावी रूप से किया जा सकता है। उन्होंने ये आशा भी व्यक्त की कि मध्यस्थता के जरिये इस भूमि पर विवाद के बीच शीर्षक विवाद में एक शांतिपूर्ण अंत प्राप्त किया जा सकता है।

वरिष्ठ वकील राजीव धवन, दुष्यंत दवे और राजू रामचंद्रन ने मुस्लिम पक्षों की ओर से मध्यस्थता के लिए अपनी इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि अदालत ने अगर ऐसा कोई निर्देश दिया तो यह उन्हें स्वीकार्य होगा। हालांकि रामलला विराजमान के लिए वरिष्ठ वकील सी. एस. वैद्यनाथन और कुछ हिंदू समूहों के वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने इस आधार पर मध्यस्थता का विरोध किया कि इससे पहले ऐसी कोशिशों से वांछित परिणाम नहीं आए हैं। वैद्यनाथन ने बताया कि कांची शंकराचार्य ने भी मामले में मध्यस्थता की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके, लेकिन निर्मोही अखाड़ा के वरिष्ठ वकील सुशील कुमार जैन मध्यस्थता के लिए सहमत हुए।

पिछली सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिए थे कि आज की सुनवाई में मामले की रूपरेखा तय की जाएगी। हालांकि अब उच्चतम न्यायालय ने अभी पक्षों को दस्तावेजों का अनुवाद देखने के लिए 6 हफ्ते दिए हैं। पिछली सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि मामले से संबंधित जो रेकॉर्ड हैं उसमें 50 ट्रंक दस्तावेज हैं। रजिस्ट्री उसका परीक्षण करे। दस्तावेज संस्कृत, अरबी, उर्दू, हिंदी, पारसी और गुरुमुखी में है, जिसका ट्रांसलेशन होना था। अगर जरूरत हो तो रजिस्ट्री आधिकारिक ट्रांसलेटर की मदद ले सकते हैं।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर सभी पक्ष यूपी सरकार की तरफ से दिए दस्तावेजों के अनुवाद से सहमत तो कार्रवाई आगे बढ़ाएं। वहीं मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन का कहना था कि हम दस्तावेज देख के बताएंगे। इसके बाद पीठ के सदस्य जस्टिस बोबडे ने कहा कि हम मध्यस्थता पर विचार कर रहे हैं।

अयोध्या में जमीन विवाद

अयोध्या में जमीन विवाद बरसों से चला आ रहा है। यह विवाद हिंदू मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव का बड़ा मुद्दा रहा है। अयोध्या की विवादित जमीन पर राम मंदिर होने की मान्यता है। मान्यता है कि विवादित जमीन पर ही भगवान राम का जन्म हुआ। हिंदुओं का दावा है कि राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई। दावा है कि 1530 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मंदिर गिराकर मस्जिद बनवाई थी। 90 के दशक में राम मंदिर के मुद्दे पर देश का राजनीतिक माहौल गर्मा गया था। अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया था।

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तीन हिस्सों में 2.77 एकड़ जमीन बांटी थी। राम मूर्ति वाला पहला हिस्सा राम लला विराजमान को मिला, राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को मिला। जमीन का तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का फैसला सुनाया गया। उच्चतम न्यायालय ने जमीन बांटने के फैसले पर रोक लगाई थी। अयोध्या में विवादित जमीन पर अभी राम लला की मूर्ति विराजमान है।

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