इजराइल-हमास युद्ध के बाद मृत्युदंड के मामलों में अप्रत्याशित तेजी, इस साल ईरान में दी जा चुकी है 700 से ज्यादा लोगों को फांसी

ईरान में फांसी की सजा को सरकार अपनी तरफ से गुप्त रखती है, और सोशल मीडिया पर या सामान्य बातचीत में भी नागरिक इस विष पर चर्चा नहीं कर सकते हैं....

Update: 2023-12-05 08:25 GMT

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महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

As per human rights groups, Iran has executed more than 700 political prisoners and protesters in this year. ईरान के मानवाधिकार संगठनों के अनुसार वर्ष 2023 के अगस्त-सितम्बर महीनों की तुलना में अक्टूबर-नवम्बर महीनों में दुगुने से भी अधिक लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। ईरान ह्यूमन राइट्स नामक संस्था के अनुसार वर्ष 2023 में अब तक 700 से अधिक लोगों को जिनमें महिलायें और किशोर शामिल हैं, को फांसी पर चढ़ाया जा चुका है, पर इजराइल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद मृत्युदंड के मामलों में अप्रत्याशित तेजी आई है। दरअसल इस युद्ध के बाद से दुनिया का पूरा ध्यान इस युद्ध पर केन्द्रित है, और मानवाधिकार गौण हो चुका है। मानवाधिकार से जुड़े दो अन्य संगठन – नॉर्वे स्थित हेन्गाव और ईरान का ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स इन ईरान - ने भी ईरान ह्यूमन राइट्स के दावों को सही ठहराया है।

7 अक्टूबर से शुरू हुए इजराइल-हमास युद्ध के शुरुआती 54 दिनों के दौरान ईरान में 176 लोगों को फांसी पर चढ़ाया जा चुका है, इसमें अधिकतर राजनीतिक बंदी, सरकार की नीतियों के आलोचक और सरकार के विरुद्ध आन्दोलनों में हिस्सा लेने वाले लोग, महिलायें और किशोर हैं। अकेले 22 नवम्बर को 24 घंटे के भीतर 7 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया है। इनमें 17 वर्षीय किशोर हमिद्रेज़ा अजारी भी शामिल है, जिसे ह्त्या के आरोप में जेल में रखा गया था।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार उसे सत्ता विरोधी प्रदर्शन के दौरान पकड़ा गया था, पुलिस ने ताकत के बल पर धमकाकर उससे हत्या का जुर्म कबूल करवाया और उसे अपना पक्ष रखने के लिए कोई कानूनी मदद या वकील नहीं दिया गया। फांसी की सूचना उसके परिवार को भी नहीं दी गयी, उल्टा फांसी वाले दिन उसके परिवार को बिना किसी आरोप के दिन भर बंदी बना कर रखा गया। सरकारी मीडिया ने फांसी के बाद 17 वर्षीय किशोर की उम्र 18 वर्ष बताई। इस घटना को संयुक्त राष्ट्र ने भी दुखद बताया है और कहा कि बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाए ही फांसी की सजा दी जा रही है।

मेहसा अमीनी की मोरल पुलिस द्वारा ह्त्या के बाद पूरे ईरान में भड़के उग्र आन्दोलन, जिसे लाइफ का नाम दिया गया था, उस आन्दोलन में शरीक रहे 8 लोगों को फांसी पर चढ़ाया जा चुका है। संयुक्त राष्ट्र ने अक्टूबर 2023 में बताया था कि इस वर्ष जनवरी से जुलाई के बीच ईरान में 419 लोगों को फांसी दी गयी है, यह संख्या पिछले वर्ष के इसी अवधि की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है। ईरान में फांसी की सजा को सरकार अपनी तरफ से गुप्त रखती है, और सोशल मीडिया पर या सामान्य बातचीत में भी नागरिक इस विष पर चर्चा नहीं कर सकते हैं।

इस प्रतिबंध को नहीं मानने वाले अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को मोरल पुलिस ने जेल में डाल दिया है। ईरान ह्यूमन राइट्स के अनुसार जितने लोगों को फांसी डी जाती है, उनमें से 95 प्रतिशत से अधिक को कोई कानूनी सहायता और वकील की सुविधा नहीं दी जाती है। अधिकतर लोगों को यह भी नहीं पता होता कि उन पर आरोप क्या हैं। ऐसे अधिकतर मामले विशेष अदालतों में चलाये जाते हैं, जहां तथाकथित मुजरिमों को मुकदमे की फ़ाइल भी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, और ना ही उन्हें अपने पक्ष में बोलने का मौका दिया जाता है।

ईरान ह्यूमन राइट्स के अध्यक्ष महमूद अमीरी मोघद्दम ने कहा है कि ईरान में सत्ता अपना विरोध कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती है, और विरोध करने वालों को नशीले पदार्थों की तस्करी, या फिर सत्ता के विरुद्ध युद्ध, जिसे वहां ईश्वर के विरुद्ध युद्ध कहा जाता है, के आरोप लगाकर फांसी पर चढ़ा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आश्चर्य यह है कि दुनिया मानवाधिकार की खूब चर्चा करती है, पर ईरान में हरेक दिन 3 से अधिक के औसत से मृत्युदंड दिया जा रहा है, और दुनिया खामोशी से इसे देख रही है।

मृत्युदंड सबसे अधिक बलूचिस्तान क्षेत्र के नागरिकों, कुर्दिश और बहाई लोगों को दिया जा रहा है। बहाई ईरान में सबसे बड़ा गैर-मुस्लिम समूह है। हाल में ही इसके 38 सदस्यों को सम्मिलित तौर पर 133 वर्षों के जेल की सजा सुनाई गयी है। शिया बहुल ईरान में सुन्नी समुदाय अल्पसंख्यक है, और इनकी आबादी मुख्य तौर पर बलूचिस्तान में बस्ती है – ईरान में फांसी की सजा पाने वाले लोगों में एक-तिहाई से अधिक संख्या सुन्नी लोगों की है।

केवल ईरान ही नहीं है जहां सत्ता द्वारा मानवाधिकार और विरोध की आवाज को कुचला जा रहा है, बल्कि अब यह पूरी दुनिया का एक “न्यू नार्मल” बन गया है। म्यांमार में भी सेना नए सिरे से जनता को कुचल रही है। अब तो आन्दोलन, प्रदर्शन या विरोध अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी कुचले जा रहे हैं, और संयुक्त राष्ट्र एक तमाशबीन रह गया है।

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