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विमर्श

मोदी सरकार के लिए चुनावी लोकतंत्र का त्यौहार भी है एक 'खेल'

Prema Negi
2 May 2019 7:39 AM GMT
मोदी सरकार के लिए चुनावी लोकतंत्र का त्यौहार भी है एक खेल
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मालेगांव ब्लास्ट में आरोपित ठाकुर प्रज्ञा सिंह ठाकुर की तरफजादी कर मोदी ने किया है आश्वस्त कि दोबारा आए सत्ता में तो मालेगांव ब्लास्ट की आरोपित साध्वी प्रज्ञा हो जायेगी सजामुक्त....

महेंद्र पाण्डेय

निर्वाचन आयोग के विज्ञापनों में चुनाव को एक महा-त्यौहार बताया गया है और प्रधानमंत्री मोदी लोकतंत्र को त्यौहार बताते हैं। सही मायने में चुनावों को ठीक से इन्हीं दोनों ने समझा है। त्यौहार मतलब मौज-मस्ती, विदूषक का खेल, खिलौने और कुछ धन की बर्बादी। हमारे देश का चुनाव भी यही सब कुछ तो है।

आजकल नेताओं के भाषण और रैलियाँ मौज-मस्ती ही तो है। अच्छे कपड़े पहने नेताओं का हवा में हाथ लहराकर गालियाँ देना, अपशब्दों की बौछार करना, एक दूसरे को धमकी देना, झूठ बोलना, हेलीकोप्टर और वायुयानों में दिनभर घूमना आधुनिक मौज मस्ती ही तो है। विदूषक जैसे कारनामे करता है और दृष्टि-भ्रम पैदा करता है, ठीक वैसे ही नेता जनता को सब्जबाग दिखाते हैं और जहां तहां धन, मदिरा या फिर साड़ियों की बौछार करते हैं।

परम्परागत उत्सव और चुनावी उत्सव में बस अंतर झूठ का है, परम्परागत उत्सव में झूठ नहीं होता, जबकि चुनावी उत्सव में कुछ सच नहीं होता।

प्रधानमंत्री के लिए संविधान हो या फिर आचार संहिता, सबका उल्लंघन करना एक खेल है। इस बार चुनावों के बीच में ही इंटरव्यू देने का चस्का लग गया है। अक्षय कुमार के बाद टीवी टुडे नेटवर्क को भी इंटरव्यू दे डाला। कभी इंटरव्यू गैर-राजनीतिक होता है तो कभी मुद्दों पर आधारित बताया जाता है।

मुद्दा तो राष्ट्रीय सुरक्षा बताया जाता है पर लगभग पूरा इंटरव्यू विपक्ष को कोसने में बीत जाता है, फिर एक रटा-रटाया वाक्य आ जाता है, हम तो विकास की राजनीति करते हैं। टीवी टुडे के इंटरव्यू में मोदी जी ने कहा, 2014 का चुनाव रोजगार और विकास के मुद्दे पर लड़ा गया था, इस बार भी ये मुद्दे हैं पर राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मुद्दा है।

पर मोदी जी को शायद याद नहीं है मुद्दा कोई भी हो, भाषणों में तो बस विपक्ष ही होता है, कभी बार-बाला। कभी दामाद जी, राहुल गांधी के लिए न जाने क्या-क्या और दीदी के 40 विधायक जिसके खरीदने का ऐलान दुनिया के सामने किया जा चुका है। मोदी कहते हैं कि उनके भाषणों में विकास, गरीब और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर रहता है।

पिछले चुनाव से लेकर इस चुनाव तक मोदी जी का एक भी भाषण ऐसा नहीं है जो इन तीन विषयों पर केन्द्रित हो। यदि मोदी जी समेत सत्ता पक्ष के नेताओं के भाषण का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि 75 प्रतिशत से अधिक भाषण विपक्ष को कोसने में, 15 प्रतिशत गांधी-नेहरु में और 10 प्रतिशत से कम हिस्सा वो क्या कर रहे हैं, के झूठे प्रचार पर केन्द्रित होता है।

ऐसे में विपक्ष को सत्ता पक्ष की आलोचना पूरी तरह से कुछ महीनों के लिए बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि इसी आलोचना के कुछ वाक्य सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं के भाषण का 75 प्रतिशत हिस्सा होते हैं। ऐसे में संभवतः सत्ता पक्ष के नेताओं के भाषण का समीकरण भी बदल जाएगा। पर, दुखद तो यह है कि बद्जुवानी का यह रोग बीजेपी से शुरू होकर अब सारे दलों के नेताओं में फ़ैल चुका है।

मोदी जी ने अपने राष्ट्रवाद को साध्वी प्रज्ञा की तारीफ कर स्पष्ट कर दिया। बेल पर छूटी और अपशब्दों की बौछार करने वाली प्रज्ञा मोदी के लिए स्टार लीडर हैं। स्वयं से साध्वी प्रज्ञा की तुलना कर मोदी जी ने अपना इतिहास जनता को बता दिया, पर शायद वे भूल गए कि प्रज्ञा अभी बेल पर बाहर हैं और आरोपमुक्त नहीं हैं।

दूसरी तरफ राबर्ट वाड्रा पर पूछे गए सवाल पर मोदी जी ने तपाक से जवाब दिया कि वे क़ानून से छूटे कहाँ हैं, वे तो बेल पर बाहर हैं। ये बात दूसरी है कि यदि मोदी सरकार फिर से सत्ता में आयी तो प्रज्ञा सजामुक्त हो जायेंगी। आखिर कर्नल पुरोहित सजा-मुक्त हो ही चुके हैं।

देश की कानून व्यवस्था तो ऐसे लोगों के सामने नत-मस्तक रहती है। बाबरी मंदिर पर मुक़दमा चलता रहेगा और साध्वी प्रज्ञा और उमा भारती जैसे लोग टीवी चैनलों पर बैठकर चीखते रहेंगे कि बाबरी मस्जिद को गिराने में उनका भी हाथ है और उन्हें इसका भागीदार बनने में गर्व है। देश की न्याय व्यवस्था ऐसी है कि न्यायाधीश पर आरोप लगते ही पूरी न्याय व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, पर प्रज्ञा जब कहतीं हैं कि हेमंत करकरे उनके श्राप से मरे तब न्याय व्यवस्था अपनी आँखें बंद कर लेती है।

मोदी जी बड़े गर्व से बताते हैं कि तीन तलाक वोटों का मुद्दा नहीं है बल्कि मानवीय मुद्दा है, पर पत्नी को बिना तलाक दिए ही छोड़ देना भी क्या मानवीय है? यदि आपका जवाब नहीं में है, तो फिर अमानवीय व्यवहार करने वाले किसी से मानवीय मुद्दे की उम्मीद कैसे हो सकती है।

काले धन पर जागरूकता की बात यदि मोदी जी इस चुनाव में कर रहे हैं तो फिर वे केवल नोटबंदी की विफलता को लोगों को बता रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा की बात कर भी वे इसे स्वयं असफल मान रहे हैं। 8 नवम्बर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा के समय यही सब तो सुनाया था देश को, सारा कालाधन बाहर आ जाएगा, आतंकवाद की कमर टूट जायेगी।

कालाधन की ये हालत है कि पिछले चुनाव में जितना अवैध धन जब्त किया गया था, अब तक इस चुनाव में उससे चौगुने से भी अधिक जब्त किया जा चुका है। दूसरी तरफ यदि आतंकवाद की कमर टूट चुकी थी, फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा एक ज्वलंत मुद्दा है तो जाहिर है आपके सहयोग से वे फिर से और मजबूत हो गए हैं। राहुल गांधी ने हाल में ही रायबरेली में ठीक ही कहा था, 70 साल में नोटबंदी जैसी बेवकूफी किसी ने नहीं की थी।

यह चुनाव, जिसे राष्ट्रीय उत्सव भी कहा जा रहा है, में जनता भी उत्सब जैसा ही व्यवहार करती है। आजकल प्रधानमंत्री के चेहरे पर चुनाव लादे जाते हैं, ऐसे में किसी भी उम्मीदवार के बारे में स्थानीय जनता को कुछ भी नहीं पता होता। ऐसे में जनता का मत वैसा ही होता है जैसा मेले में किसी प्रोडक्ट पर रिंग डालने का खेल होता है।

होली और दिवाली जैसे उत्सवों की जैसे मूल-भावना मरती जा रही है, पर उत्सव का आकार बढ़ता जा रहा है, ठीक वैसे ही मतदान की मूल भावना नष्ट हो चुकी है पर इसका खर्चा और प्रचार बढ़ता जा रहा है।

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