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महत्वपूर्ण लेख : अहंकार और नस्लवाद के चलते अमेरिका हार रहा है कोविड-19 की जंग

Manish Kumar
24 April 2020 2:30 AM GMT
महत्वपूर्ण लेख : अहंकार और नस्लवाद के चलते अमेरिका हार रहा है कोविड-19 की जंग
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भावी जानकारों को इस पर विचार करना होगा कि अमेरिका के जिन विशेष गुणों का बखान किया गया था क्या उनके पूर्ण होने की संभावना थी भी या ये अमेरिकी अहम् को संतुष्ट करने की खातिर गढ़ी गयी कल्पना मात्र थी...

डोनाल्ड अर्ल कोलिन्स

विष्य में कभी, (शायद आज से 200 या 300 सालों बाद), जब इतिहासकार और दूसरे सामाजिक वैज्ञानिक अधूरे रह गए अमेरिकी प्रयोग की असफलता पर पहली पुस्तकें लिख रहे होंगे, उनके सामने बुनियादी सच्चाई मुंह बाए खड़ी होगी। यह सच्चाई कि अमेरिका द्वारा स्वतंत्रता और समानता की बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने के बावजूद नस्लवाद, स्त्री जाति से द्वेष, समलैंगिकों के प्रति अत्यंत घृणा, विदेशी लोगों के प्रति तिरस्कार और अमेरिकी समाज में व्याप्त भयंकर आर्थिक असमानता की ज़मीनी हकीक़त ने इन आदर्शों की धज्जियां उड़ा दी हैं।

भावी जानकारों को इस पर विचार करना होगा कि अमेरिका के जिन विशेष गुणों का बखान किया गया था, क्या उनके पूर्ण होने की संभावना थी भी या ये अमेरिकी अहम् को संतुष्ट करने की खातिर गढ़ी गयी कल्पना मात्र थी।

न भावी शोधकर्ताओं के पास उन घटनाओं की एक सूची होगी जो घटनाएं अमेरिका के उस रूप की समाप्ति के घंटनाद का संकेत दे रही होंगी, जिसमें अमेरिका को एक महाशक्ति, एक राज्य-राष्ट्र और हर किसी के द्वारा पाले जाने वाले विचार के रूप में देखा जा रहा था। और यह सूची बहुत लम्बी है : 1945 से लेकर 1980 के दशक तक अमेरिका ने शीत युद्ध, वियतनाम युद्ध और परमाणु हथियारों की होड़ में खरबों डॉलर खर्च कर डाले। रिचर्ड निक्सन का राष्ट्रपति काल, वॉटरगेट स्केंडल और सरकारी भ्रष्टाचार।

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1980 के दशक के दौरान राष्ट्रपति रीगन के शासनकाल में "अमेरिका में एक बार फिर सुबह हुई" के नाम पर अमेरिकी वासियों के सामाजिक सुरक्षा आवरण को विनिवेश कर तार-तार कर देना और कॉर्पोरेट जगत को बड़े स्तर पर नियंत्रण मुक्त करने का सिलसिला जो बाद के राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा के शासनकाल में भी जारी रहा।

1990-91 का पहला खड़ी युद्ध और बाद के दशकों के दौरान अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और अन्य जगहों पर लड़े गए अंतहीन युद्ध। 2008 के आवासीय क़र्ज़ बुलबुले के फूटने और बड़े पैमाने पर छायी मंदी ने एक बार फिर बड़ी-बड़ी कंपनियों को ही फायदा पहुंचाया जबकि लाखों लोगों को गरीबी में ढकेल दिया।

स सबने अमेरिका को वर्तमान आपदा की ओर ढकेल दिया है,यानी कि वर्तमान कोरोनावायरस महामारी की ओर जिसने 40,000 अमेरकी लोगों की जान ले ली है और अन्य सात लाख लोगों को बीमार कर दिया है। ये एक ऐसा महासंकट है जिसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से लेकर दूसरे नेताओं ने दूर कर दिया होता अगर उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन, रोग नियंत्रण केंद्रों और ओबामा प्रशासन द्वारा पूर्व में दी गयी चेतावनियों को सुना होता, ज़रूरी तैयारी की होती और फिर ज़मीनी कार्यवाई की होती।

ट्रंप कोरोना संकट के लड़ने में रहे नाकाम

ट्रम्प इस संकट को कम कर सकते थे लेकिन वे बुरी तरह असफल रहे। वो लगातार दिखाई दे रहे संकट को नकारते रहे। डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा कोविड -19 को लेकर लगातार दी जा रही चेतावनियों को वो 'इनकी नई धोखाधड़ी' कह कर मज़ाक उड़ाते रहे।

कोविड-19 के प्रकोप ने अमेरिकी समाज को लगी एक अन्य महामारी की और भी इशारा किया है। यह महामारी है अमेरिकी अहंकार या फिर अमेरिकी आत्ममोह।

मेरिकी अहंकार पहले भी किसी भी वायरस से ज़्यादा संक्रामक रहा है और आज भी है। इसका कारण यह है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहुत से अमेरिकियों के लिए अकूत दौलत और असीमित सफलता का आकर्षण उनका दास बन चुका है, भले ही यह एक उटपटांग सोच ही क्यों न हो।

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ब ज़रा इस पर निगाह डालें कि जब जनवरी के आरम्भ में चीन के वुहान शहर से गंभीर निमोनिया के मरीज़ों की मौत की खबर आई थी तो अमेरिका की प्रतक्रिया क्या थी ? संघीय सरकार ने अपनी शक्तियों और संसाधनों का इस्तेमाल यहां अमेरिका में रह रहे कोरोना वायरस से संभावित या वास्तविक रूप में संक्रमित लोगों को टेस्टिंग किट्स उपलब्ध कराने में कतई नहीं किया। उल्टे फरवरी माह की शुरुवात में मास्क, रेस्पिरेटर्स और अन्य मेडिकल सामग्रियां चीन रवाना कर दीं।

ब जनवरी महीने के अंतिम सप्ताह में वॉशिंगटन राज्य में अमेरिकी निवासियों को वायरस ने संक्रमित करना शुरू किया तो पूरे अमेरिका में इसके फैलने की संभावना को लेकर गंभीर रूप से कुछ भी नहीं किया गया। व्हाइट हाउस के लिए, अमेरिकी संसद के लिए और निर्वाचित बहुत सारे अधिकारियों के लिए मार्च महीने की शुरुवात तक सब कुछ सामान्य ढर्रे पर ही चलता रहा। हाँ, इस चुनावी साल में राष्ट्रपति पर लगे महाभियोग ने ज़रूर कुछ हलचल पैदा की।

बाजार से खत्म हुआ जरुरी सामान

जब लोगों को ये लगने लगा कि कोविड-19 महामारी को फ़ैलने से बचाने के सक्रीय प्रयास अमेरिकी नेतृत्व द्वारा नहीं किये जायेंगे तो देशवासियों की 'पहले मैं' की भावना जाग उठी। देखते-देखते सुपर बाज़ार और दवा की दुकानों के शेल्फ़ से टॉयलट पेपर, बोतलबंद पानी, हाथ में मलने वाला अल्कोहल, लिक्विड सोप, सर्जिकल फेस मास्क, हैण्ड सेनेटाइज़र्स, पेपर टॉवेल्स, संतरे का जूस और थर्मोमीटर्स ग़ायब होने लगे।

कुछ अमेरिकियों को ये विचार भा गया कि इन चीज़ों की जमाखोरी कर इस भयानक दुर्घटना से पैदा हुए दर्द और तकलीफ से मुनाफ़ा कमाया जाये। खरबों डॉलर का धंधा करने वाली कंपनी ऐमेज़ॉन ने इस जमाखोरी, दर्द और शोषण को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया।

मार्च महीने के मध्य के पहले तक कॉर्पोरेट घरानों और छोटे व्यवसायिओं ने भी अपने कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ नहीं किया। हालाँकि कई हफ़्तों और दिनों पहले हर एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय प्रतिरक्षा विज्ञानी और महामारी विशेषज्ञ ने सामाजिक दूरी बनाये रखने और कार्य स्थल पर ही शरण बनाने के आदेश पारित करने विनती की थी।

ब हारवर्ड विश्विधालय में आमने-सामने बैठ कर चलने वाली कक्षाएं बंद हो गयीं और नैशनल बास्केटबाल एसोशिएसन द्वारा 2019-2020 सत्र को आगे बढ़ाने के बाद ही दूसरे विश्वविद्यालयों, खेल जगत और अन्य संस्थाओं ने पूरी तरह से बंदी घोषित की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शिक्षा जगत और व्यावसायिक खेल वैश्विक प्रकृति के होते हैं। यह बात वैश्विक महामारी के दौर आपके लिए फायदेमंद हो सकती है और बोझ भी बन सकती है।

संकट को लेकर 50 से ज़्यादा राज्यों और वाशिंगटन डीसी का व्यवहार पचास से भी ज़्यादा अलग-अलग तरीकों में सामने आया। जहां न्यूयॉर्क, इलिनोइस, न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया राज्यों ने सामान्य लॉकडाउन घोषित किया वहीं अलाबामा, फ्लोरिडा और टेक्सेस जैसे राज्यों ने तब तक सुरक्षा के कोई भी उपाय नहीं किये जब तक कि महामारी का असर उनके राज्यों में दिखाई नहीं देने लगा।

लोगों ने सामाजिक दूरी का नियम नहीं माना

तना सबकुछ होते हुए भी बहुत सारे अमेरिका निवासियों ने तो सामाजिक दूरी के मूल नियमों तक की धज्जियां उड़ाई हैं। वे समुद्र तट पर मौज-मस्ती करते रहे हैं और सार्वजनिक सभाओं में शामिल होते रहे हैं मानो कि ये संकट देश भर में मनाया जा रहा ग्रीष्म अवकाश हो।

मार्च के महीने में टेक्सस के लेफ्टिनेंट गवर्नर डैन पैट्रिक जैसे लोग अपरिपक्व सुजनन वादी सुर में बोलते हुए सरकार द्वारा उठाये गए कदमों पर विलाप करने लगे। फॉक्स न्यूज़ को दिए अपने सन्देश में पैट्रिक ने कहा था-" वापिस काम पर चलें, वापिस ज़िंदगी जीने का मज़ा लें। हमें इस बारे में स्मार्ट होना चाहिए। और हममें से जो सत्तर साल के ऊपर हैं वे अपना ख्याल खुद रख लेंगे, लेकिन देश का बलिदान मत दीजिये।"

गता है बूढ़ों की ज़िंदगी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्थायित्व से कम महत्वपूर्ण है। ट्रम्प, पैट्रिक और अन्य सरकारी अधिकारियों ने ऐसे लोगों को उपेक्षा और शोषण के लिये छोड़ दिया है, जो उम्रदराज़वाद, हृष्ट-पुष्टतावाद,लिंगभेदवाद और नस्लवाद के शिकार हैं।

धर मिसिसिप्पी राज्य के गवर्नर रीव्ज़ ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए जिसके माध्यम से गैर-ज़रूरी चीज़ों की दुकानें खोलने पर लगे स्थानीय प्रतिबन्ध को और सामाजिक दूरी बनाये रखने के कदम को अस्थायी रूप से हटा लिया। यानी कि उन्होंने राज्य के ज़्यादातर निवासियों को वापिस सामान्य जीवन जीने का आदेश दे दिया।

स बीच वर्जीनिया राज्य की लिबर्टी यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष जेरी फालवेल जूनियर और यूनिवर्सिटी के ईसाई धर्म पुस्तक सम्बन्धी नेतृत्व ने आमने-सामने बैठ कर चलने वाली कक्षाओं को फिर से चालू करना बुद्धिमानी समझा जबकि संक्रमित होने वालों की संख्या प्रति दिन हज़ारों में बढ़ती ही जा रही थी।

तो क्या यह मिसिसिप्पी के नागरिकों को सुरक्षा देने से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने का मामला था ? तो क्या यह विज्ञान और हज़ारों छात्रों के कल्याण से ऊपर जेरी फालवेल जूनियर के धार्मिक पुस्तक सम्बन्धी अंध-विश्वास का मामला था ? क्या वाकई?

लेकिन अमेरिकी अहंकारवाद की ही तरह अमेरिकी नस्लवाद भी उसी विषैली मिट्टी से उपजा है जो लालच और सत्ता की भूख से मिलकर बनी है और जिसके लिए मानवीय सरोकारों का कोई महत्व नहीं है। अमेरिका का अहंकारवाद और नस्लवाद मिलजुल कर काम करता है। वरना क्यों डोनाल्ड ट्रम्प मार्च महीने के मध्य में प्रेस को सम्बोधित करते हुए "कोरोना" शब्द को बदल कर "चीनी वायरस" नाम दे देते हैं?

चीनी और एशियाई मूल के लोगों के खिलाफ हिंसा

हीं तो क्यों अमेरिका में पिछले एक महीने में एशियाई और चीनी मूल के लोगों के खिलाफ हिंसा की 1100 से भी ज़्यादा वारदातें हुई हैं? इन लोगों की ऑन लाइन कक्षाओं को हैक करने और नस्लीय भाषा का इस्तेमाल कर उन्हें परेशान करने के पीछे कोई और तर्क कैसे दिया जा सकता है?

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निःसंदेह अहंकारवाद और नस्लवाद के प्रति झुकाव और बहुत से दूसरों को शोषण लायक समझना आपस में जुडी बातें हैं, ऐतिहासिक रूप से और अमेरिका में कोविड-19 के संकट के सन्दर्भ में भी।

स सबके बीच अमेरिका के सबसे कमज़ोर लोगों की और ध्यान भी नहीं दिया गया है। घपलाशुदा अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था का मतलब है कि ग़रीबी, आवास विहीनता, कैद, विकलांगता और मनोवैज्ञानिक बीमारी के साथ जी रहे लाखों लोग अगले कुछ हफ़्तों और महीनों में कोरोनावायरस के शिकार हो जायेंगे।

नकी हिस्सेदारी उन दो लाख लोगों में असंतुलित स्तर की होगी जिनके अगले 12 से 18 महीनों में वायरस से मरने की भविष्यवाणी जानकारों ने की है। ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी मेडिकल सुविधाओं का लाभ इन्हें नहीं मिलेगा। ये लोग संसद द्वारा पास २ खरब डॉलर के उस पॅकेज का हिस्सा भी नहीं होंगे जिसका एकमात्र उद्देश्य कॉर्पोरट घरानों की जेबें भरना है।

नके लिए जिन्हें तुरंत ख़तरा नहीं भी है, इस पैकेज में साधारण आदमी की मदद के लिए रखी गयी सहायता-राशि बहुत कम है और बहुत देर में आई है। इसलिए बहुत सारे और लोग बेरोज़गारों, कम रोज़गारों, स्थाई एवं अस्थाई रूप से बेघरों, क़ैदियों, बीमारों और मरे हुए लोगों की पंक्ति में शामिल हो जायेंगे।

स वैश्विक महामारी के दौरान अमेरिका द्वारा देश में और देश के बाहर भी नेतृत्व ना संभालना आश्चर्य में डालता है, लेकिन अमेरिकी जनता द्वारा इन तथ्यों को नकारना तो और भी आश्चर्यचकित करता है।

च तो ये है कि बहुत सारे अमेरिकी अपने साथी अमेरिकियों के लिए भी ज़्यादा चिंतित नहीं रहते हैं, खासकर उनके लिए जो अश्वेत या भूरे हैं। इस तरह की वैश्विक महामारी तो और भी ध्यान नहीं रखते हैं।400 साल के नस्लवाद और अहंकारवाद ने यही तो दिया है।

ज़्यादातर अमेरिकी या तो इस बात की चिंता ही नहीं करते हैं कि यह तथाकथित प्राकृतिक आपदा भूमंडलीकरण और जलवायु परिवर्तन से ही उपजी है या फिर ऐसे दिखाते हैं कि इस बारे में कुछ भी नहीं किया जा सकता है। कोविड-19 का यह संकट अमेरिका की उस स्थाई शर्म को और गहरा देता है जिसके चलते दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश होने के बावजूद कुछ भी ना करने वाला देश बन गया है।

क्या खत्म होने की ओर है अमेरिका?

तो क्या अमेरिका ख़त्म होने की ओर अग्रसर है? हाँ, ये आने वाले कुछ समय तक तो महाशक्ति और सबसे अमीर देश बना रहेगा, लेकिन ये ताक़त और दौलत अमीर श्वेतों और कॉर्पोरेट्स के हाथों में चली जाएगी।

वैश्विक कोरोनावायरस महामारी अमेरिका को अन्धकार में नहीं ढ़केलेगी लेकिन ये संकट एक अपशकुन है, वाकई एक डरावना संकेत है कि अमेरिका का एक स्थाई राष्ट्र-राज्य और आज़ादी एवं भलाई का प्रतीक होना सफ़ेद झूठ साबित हुआ है।

जो कोई भी इसके इतर विश्वास रखता है या अमेरिका के वर्तमान रूप को बचाये रखने की उम्मीद रखते हुए ऐसे आदर्शों के लिए लड़ता है तो वो न केवल अमेरिकी अहंकारवाद और नस्लवाद को बढ़ावा दे रहा होता है, बल्कि भविष्य की आपदाओं की गारंटी भी दे रहा होता है। अंत में अमेरिका द्वारा अपने काल्पनिक प्रयोग को पूरा करने में असफल रहने की उतनी ही ज़िम्मेदारी इन लोगों पर भी रहेगी, जितनी कि लिंडन जॉनसन से लेकर अब तक के प्रत्येक राष्ट्रपति के कंधे पर।

(लेखक वाशिंगटन स्थित अमेरिकी यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते हैं, उनका यह लेख अल जजीरा से साभार। अनुवाद : पीयूष पंत)

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