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ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो पर सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा

Nirmal kant
30 April 2020 4:30 AM GMT
ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो पर सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा

ये वही राष्ट्रपति हैं जिनपर तमाम आरोप लगते रहे हैं - महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग, नस्लवादी और रंगभेदी वक्तव्य, हिंसा और खून-खराबा को बढ़ावा, तानाशाही के समर्थक, अमेजन के जंगलों को बर्बाद कर रहे हैं – पर हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी के बहुत करीब हैं...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

ब्राज़ील के सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो पर मुक़दमा दायर किया गया है, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति संघीय पुलिस को अपने अधिकार में करना चाहते हैं और इसके वर्तमान प्रमुख को हटा कर अपने पसंदीदा व्यक्ति को इस पद पर बैठाना चाहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में इस मुकदमे की पहली सुनवाई की जा चुकी है, इसमें न्यायाधीश सल्सोड़े मेलो ने कहा, गणतंत्र के राष्ट्रपति पर भी वैसे ही सारे क़ानून लागू होते हैं जैसे किसी भी सामान्य व्यक्ति पर। राष्ट्रपति समेत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह देश के क़ानून या संविधान की अवहेलना करे।

ये वही राष्ट्रपति हैं जिनपर तमाम आरोप लगते रहे हैं - महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं, नस्लवादी और रंगभेदी वक्तव्य देते हैं, हिंसा और खून-खराबा को बढ़ावा देते हैं, तानाशाही के समर्थक हैं (हाल में ही तानाशाही समर्थक आन्दोलन में वे उपस्थित भी थे), अमेजन के जंगलों को बर्बाद कर रहे हैं – पर हमारे प्रधानमंत्री जी के बहुत करीब हैं और ऐसे व्यक्ति को देश की सरकार इतना सम्मान देती है कि गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनाकर स्वागत करती है। ब्राज़ील की यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस खबर से इतना तो स्पष्ट है कि वहां की न्यायव्यवस्था, पुलिस और मीडिया आज भी स्वतंत्र है, निष्पक्ष है।

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दूसरी तरफ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हम ढिंढोरा पीटते हैं, और जस्टिस लोया की ह्त्या कर दी जाती हैं, पर जनता तो दूर न्यायव्यवस्था में सुगबुगाहट भी नहीं होती, किसी भी संवैधानिक और वैधानिक पद से किसी को भी हटाकर अपने पसंद के व्यक्ति को बैठा दिया जाता है, विपक्ष भी सवाल नहीं करता। यहाँ सरकार के मुखिया या फिर उनके चुनिन्दा व्यक्तियों पर कोई भी इल्जाम लगाने की किसी में हिम्मत है? किसी भी न्यायालय की हिम्मत है कि सरकार के विरुद्ध किसी मुकदमे की सुनवाई कर ले?

क्या कोई न्यायाधीश कह पायेगा, राष्ट्रपति समेत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह देश के क़ानून या संविधान की अवहेलना करे? जिस देश में सर्वोच्च न्यायालय जनता से सम्बंधित सभी मामलों को रोककर सरकार के चाटुकार टीवी चैनेल के मालिक को बचाने में जुट जाती हो, वहां आप ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते। दूसरी तरफ, ब्राज़ील के पुलिस की निष्पक्षता देखिये, जो राष्ट्रपति और उनके परिवार की शिकायतें भी उतनी ही कर्तव्यनिष्ठ के साथ दर्ज करती हैं, जितना सामान्य नागरिकों के।

की संघीय पुलिस अमेरिका के एफबीआई के समतुल्य है और बहुत हद तक निष्पक्ष है। संघीय पुलिस के प्रमुख को बदलने की कवायद भी राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो के परिवार की शिकायतों से ही जुडी है। पुलिस ने उनके बड़े बेटे, फ्लावियो बोल्सोनारो पर तथाकथित भ्रष्टाचार और रिओ के माफियाओं से सम्बन्ध रखने के मामले में शिकायत दर्ज की है, और इसकी तहकीकात अभी जारी है। हाल में ही छोटे बेटे, कार्लोस बोल्सोनारो पर सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाने का आपराधिक मामला दर्ज किया गया है।

जाहिर है, राष्ट्रपति चाहते हैं कि पुलिस शिकायतों पर कोई कार्यवाही न करे, पर वर्त्तमान पुलिस प्रमुख राष्ट्रपति के कहने के बाद भी ना तो शिकायतों को खारिज कर रहे हैं और ना ही सम्बंधित जांच की खुफिया फाइलों को राष्ट्रपति से साझा करने को तैयार हैं। ऐसे में राष्ट्रपति ने पुलिस प्रमुख को हटाने का निर्णय लिया, और नए प्रमुख के लिए इंटेलिजेंस के प्रमुख अलेक्सेंद्रे रामागेम का नाम आगे किया, जो उनके बेटे कार्लोस के मित्र हैं।

राष्ट्रपति की इस हरकत पर कांग्रेस के अनेक सदस्यों ने विरोध प्रदर्शित किया, विरोध के स्वर मंत्रिमंडल में भी उठे और राष्ट्रपति के चहेते न्याय मंत्री, सेर्गियो मोरो ने इसी सप्ताह के शुरू में इस विवाद पर मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफ़ा देने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने राष्ट्रपति पर गंभीर आरोप भी लगाए। मोरो के अनुसार राष्ट्रपति पुलिस के काम में हस्तक्षेप चाहते हैं और इसीलिए वे पुलिस प्रमुख को बदलना चाहते हैं, जिससे वे अपने बेटों की पुलिस जांच की खुफिया फाइलों तक पहुँच सकें।

ब्राज़ील का मीडिया दुनिया में सबसे प्रखर, बड़ा और निष्पक्ष होने का दावा तो नहीं करता, जैसा भारत का मीडिया करता है, पर इस हद तक निष्पक्ष है कि सरकार के विरुद्ध भी हरेक खबरें प्रकाशित की जाती हैं। एस्तादो दे साओ पाउलो नामक अखबार के अनुसार अगली सुनवाई से पहले सेर्गियो मोरो ऑडियो के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय में कुछ महत्वपूर्ण सबूत प्रस्तुत करने वाले हैं।

र्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति पर अधिकारों के दुरुपयोग, न्याय प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने और भ्रष्टाचार का चार्ज स्थापित किया है। इन सबके बाद से राष्ट्रपति बोल्सोनारो की लोकप्रियता लगातार कम हो रही है, और हाल में ही करवाए गए एक सर्वेक्षण में 50 प्रतिशत से अधिक नागरिकों ने कहा कि उन्हें अपने पद से हटा देना चाहिए। पिछले महीने के सर्वेक्षण में केवल 37 प्रतिशत नागरिकों ने ऐसा माना था।

ब्राज़ील के 38 प्रतिशत नागरिकों के अनुसार वे राष्ट्रपति पर भरोसा नहीं करते। राष्ट्रपति बोल्सोनारो दक्षिणपंथियों के गठबंधन का नेतृत्व करते हैं, जिसके पास कोंग्रेस (संसद) में 210 सीटें हैं, और वामपंथी गठबंधन के पास केवल 134 सीटें हैं। इस कारण राष्ट्रपति पर महाभियोग तो नहीं चलाया जा सकेगा, पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर बोल्सोनारो का भविष्य अवश्य निर्भर करता है। ब्राज़ील के विपक्ष के साथ-साथ दुनियाभर के मानवाधिकार कार्यकर्ता उनपर पर्यावरण, संस्कृति और लोकतंत्र को बर्बाद करने का आरोप लगाते रहे हैं।

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हाल में ही कोरोनावायरस के संक्रमण की रोकथाम में भी वे पूरी तरह से असफल रहे हैं और अब तक इससे लगभग 4700 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। कोरोनावायरस संक्रमण की आंकड़े छुपाने का भी उनपर आरोप है। मार्च के शुरू में वे एक प्रतिनिधिमंडल लेकर अमेरिका में ट्रम्प से मिलने अमेरिका गए थे, वापसी में उस दल के 20 सदस्य कोरोनाग्रस्त पाए गए थे। राष्ट्रपति की भी दो बार जांच की गयी थी, पर इस जांच के परिणाम को जनता के सामने आने से रोक दिया गया। अब, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया है कि इन जांच रिपोर्टों को 48 घंटे के भीतर न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।

ले ही यह खबर, ब्राज़ील का अंदरूनी मामला हो पर इससे अपने देश के तथाकथित लोकतंत्र की तार तार हो चुकी मर्यादा का पता तो चलता ही है। एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें तमाम बुद्धिजीवी देशद्रोही करार दिए जाते हैं, जेलों में ठूंसे जाते हैं, गायब करा दिए जाते हैं और सार्वजनिक तौर पर दंगे और हत्याए कराने वाले हमपर राज करते हैं। ऐसा लोकतंत्र जिसमें सरकार का विरोध आपको अपराधी बनाता है और झूठी खबरें फैलाने वाले संसद में बैठते हैं।

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