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Video : गुजरात के हर टोल नाके पर हो रही वसूली, ड्राइवर ने जनज्वार को बताया कौन और कैसे वसूलता है रूपया

Janjwar Desk
30 Nov 2022 10:46 AM GMT
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Video : गुजरात में इलेक्शन का समय है। जिसे लेकर जनज्वार की टाम गुजरात दौरे पर है। जनता से जुड़ी रिपोर्टिंग करते हुए Janjwar ने आपको परत दर परत सच दिखाने का हरसंभव प्रयास किया। खतरा उठाकर...

Video : गुजरात में इलेक्शन का समय है। जिसे लेकर जनज्वार की टाम गुजरात दौरे पर है। जनता से जुड़ी रिपोर्टिंग करते हुए जनज्वार ने आपको परत दर परत सच दिखाने का हरसंभव प्रयास किया। खतरा उठाकर। इसी कवरेज के दौरान हमारी मुलाकात यहां ट्रांसपोर्ट का काम करने वाले एक ड्राइवर से हुई। नाम और पहचान छुपाकर उस ड्राइवर ने हमें जो कुछ बताया वह गुजरात मॉडल का नकाब नोच फेंकने के लिए काफी है।

मुंह पर रूमाल बांधकर ड्राइवर ने जनज्वार को बताया कि पूरे गुजरात में कहीं भी चले जाओ, हर तरफ लूट मची हुई है। हमने ड्राइवर से चेहरा छुपाने का कारण पूछा तो उसने हमें जवाब दिया कि, सच बताने के बाद उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। ड्राइवर ने हमसे कहा कि यहां टोल नाकों के बाद भी पुलिस वाले गाड़ियां रोककर रूपया वसूलते हैं। कहीं किसी पर कोई भी लगाम नहीं है।

गुजरात के सौराष्ट्र में मिले इस ड्राइवर ने गुजरात मॉडल की जो सच्चाई बताई अगर वो मॉडल पूरे देश में लागू हो जाए तो जनता के पास तन ढ़कने के लिए कपड़े तक ना बचें। ड्राइवर कहता कि आज से दो साल पहले तक टोल नाका नहीं लगता था। लेकिन अब हर जगह पुलिसवाले खड़े हैं, नहीं देते हैं तो मारते हैं। गुजरात के अहमदाबाद जो गुजरात की राजधानी है वहां भी इसी तरह का हाल है।

हमने पूछ की कई बार ड्राइवर वगैरा कहीं से लेकर पी-पा लेते हैं तो क्या होता, जिसके जवाब में ड्राइवर ने बताया कि उनसे सीधा 5 हजार की रकम वसूल की जाती है। टोल नाका पार करने के बाद सीसीटीवी कैमरे बंद करवा दिये जाते हैं। आगे पुलिसवाले और आरटीओ कर्मचारी खड़े रहते हैं, जिनकी मिलीभगत से यह सारा खेल चलता है। ड्राइवर बताता है कि पुलिस को इससे मतलब नहीं है कि गाड़ी में क्या है, उन्हें बस पैसे से मतलब है दो और जाओ।

ऐसै में बड़ा सवाल ये है कि क्या इतनी लूट खसोट के बाद भी मोदी या गुजरात सरकार को मालूम नहीं है इस भ्रष्टाचार का। अगर मालूम है तो फिर क्या इसी गुजरात मॉडल की बात की जाती है। नेता वोट मांग रहे हैं। दो दिन बाद चुनाव है। मोदी सरकार को कम से कम चुनाव तक यानी एक या दो दिनों के लिए इस लूट पर कम से कम लगाम लगानी ही चाहिए थी। अपने अफसरों से कहा जा सकता था, कि चुनाव के दिन तो कम से कम जनता को ना लूटें। क्योंकि जनता तो हर बार वोट देकर लुट ही रही है।

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