जोशीमठ ही नहीं पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में जारी है जमीन का दरकना, गढ़वाल सहित कुमाउं मण्डल भी बैठा है खतरे के मुहाने पर

कुमांउ मंडल के भीमताल स्थित खूपी गांव के ग्रामीण पहाड़ी से हो रहे भूस्खलन और पानी के रिसाव को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में कोई बड़ा खतरा न हो सके। लेकिन प्रशासन अभी चेत नहीं रहा है, जोशीमठ में भी समय रहते कहां चेता था.....

Update: 2023-01-09 16:14 GMT

टिहरी जिले के नरेंद्रनगर नाम के शहर के निकट ही वह अटाली गांव है, जहां जोशीमठ जैसी ही दरारें पड़ने लगी हैं

सलीम मलिक की रिपोर्ट

Ground Report : उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित चर्चाओं का केंद्र बना जोशीमठ अपने भू धंसाव की वजह से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में है। जोशीमठ अपने जिस भू धंसाव के चलते इन दिनों खबरों में बना हुआ है वह नया नहीं है। बीते लंबे जमाने से यह शहर पल प्रतिपल धंस रहा था।

भूगर्भ वैज्ञानिक भी बहुत पहले से इस इलाके में बड़ी आपदा की संभावना जता रहे थे तो पर्यावरणविद तक इस खतरे की तरफ इशारा कर रहे थे, लेकिन किसी ने भी तवज्जो नहीं दी। चेतावनी देने वाले लोगों का विकास विरोधी कहते हुए मजाक उड़ाया गया। इन्हीं जैसे लोगों की बातों को सचेतन हाशिए पर डालने के लिए अर्बन नक्सली जैसे शब्द का आविष्कार भी किया गया।

कुल मिलाकर जब यह लोग अपनी आशंकाओं से दुनिया को सच्चाई बताना चाहते थे तो किसी के पास इनकी बात को तवज्जो देने का समय नहीं था, लेकिन अब जब तबाही खुद जीरो ग्राउंड पर उतर आई है तो हर कोई इस समस्या के बारे में जानने के लिए उत्सुक है। अफसोस, अब इन विशेषज्ञों के पास इतना भी वक्त नहीं बचा कि वह इस विषय पर कुछ विस्तार से कुछ कह सके।

जोशीमठ इन दिनों आपातकालीन स्थिति से गुजर रहा है। जिले, प्रदेश से लेकर नई दिल्ली तक की सरकार जोशीमठ की स्थिति देखकर हैरान है, लेकिन उत्तराखंड से बाहर के पाठकों के लिए शायद यह जानकारी नई हो कि उत्तराखंड में चल रहे तमाम कथित विकास कार्यों की वजह राज्य का जोशीमठ क्षेत्र ही नही बल्कि उत्तराखंड का पूरे का पूरा पर्वतीय हिस्सा तबाही के एक ऐसे टाइम बम पर बैठा है जिसकी घड़ी की सुई की हर टिक टिक के साथ ही तबाही और बर्बादी दबे पांव इधर बढ़ रही है।


उत्तराखण्ड में स्थापित बड़ी बिजली परियोजनाएं हों या ऑल वेदर रोड या फिर पहाड़ की चोटी तक रेलवे लाइन बिछाने की जिद्द, बिना किसी स्वतंत्र भूगर्भीय सर्वेक्षण के अभाव में उत्तराखंड के लिए विनाशकारी साबित होने वाले हैं। गढ़वाल और कुमाउं मंडलों के कई क्षेत्रों में प्रकृति खुद इस बाबत चेतावनी दे रही है। टिहरी जिले का नरेंद्रनगर और नैनीताल जिले का भीमताल वह जगह हैं, जहां प्रकृति की इस चेतावनी को साफ महसूस किया जा सकता है।

अटाली में खतरे की बजती घंटी

टिहरी जिले के नरेंद्रनगर नाम के शहर के निकट ही वह अटाली गांव है, जहां जोशीमठ जैसी ही दरारें पड़ने लगी हैं। जाहिर है कि इसकी वजह से यहां के ग्रामीण भी दहशत में हैं। जैसे जोशीमठ का मामला वहां की बिजली परियोजना से जुड़ा हुआ है तो यहां यह मामला ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के लिए बनाई जा रही सुरंग निर्माण से जुड़ा हुआ है, जिसकी वजह से अटाली गांव की फिलहाल तो कृषि भूमि सुरंग निर्माण की जद में आ चुकी है और मकानों पर दरारें पड़ती जा रही हैं।

रेल के लिए बनी टनल को मान रहे हैं जिम्मेदार

विधानसभा नरेंद्रनगर की पट्टी दोगी के अटाली गांव के नीचे से होकर जाने वाली रेलवे लाइन सुरंग निर्माण का कार्य इन दिनों जोरों पर हैं। खेतों में सिंचाई करते वक्त अटाली के ग्रामीण उस वक्त सकते में आ गए, जब उन्होंने अपने खेतों में लंबी दरारें पड़ी देखीं। ग्रामीणों का कहना है देखते ही देखते ये दरारें 3 दिनों के भीतर 2 से ढाई फुट चौड़ी हो गई हैं। इसके अलावा मकानों में भी दरारें पड़ती जा रही हैं। इससे ग्रामीणों में आक्रोश और रेलवे विभाग के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार नरेंद्रनगर अयोध्या प्रसाद, रेलवे विकास निगम के उप महाप्रबंधक भूपेंद्र सिंह, सीनियर साइट इंजीनियर पीयूष पंत, जियोलॉजी एवं माइनिंग के निदेशक डॉक्टर अमित गौरव ने गांव में जाकर खेतों और मकानों में पड़ रहे दरारों का मुआयना किया।

टिहरी जिले के नरेंद्रनगर नाम के शहर के निकट ही वह अटाली गांव है, जहां जोशीमठ जैसी ही दरारें पड़ने लगी हैं

अधिकारी भी कर चुके हैं निरीक्षण

स्थानीय ग्रामीण करन चौहान का कहना है कि जिस माटी से उनका पीढ़ी दर पीढ़ी से सांस्कृतिक, भावनात्मक लगाव है, उस माटी को वे नहीं छोड़ना चाहते हैं। उनकी मांगें हैं कि कृषि भूमि और मकान का उन्हें दस गुना मुआवजा दिया जाए। हर परिवार में एक व्यक्ति को नौकरी दी जाए और विस्थापित करना हो तो सरकार यहां नजदीक व्यासी के समीप पूरे गांव को विस्थापित करें। इस मामले में रेल विकास निगम के महाप्रबंधक भूपेंद्र सिंह का कहना है कि उनकी ओर से गांव की भूगर्भीय जांच कराई है। इस सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद इसको मुख्यालय को भेजा जाएगा। साथ ही ग्रामीणों की मांग को लेकर उनका संबंधित प्रस्ताव भी मुख्यालय को भेजा जाएगा। मुख्यालय के दिशा-निर्देश मिलते ही मामले में अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

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कुमाउं के भीमताल का खौफ

यह एक तस्वीर गढ़वाल मण्डल के टिहरी जिले के नरेंद्रनगर की थी। इसके बाद अगर बात करें कुमाउं मंडल की तो नैनीताल जिले के भीमताल विकास खंड का एक खूपी गांव है, जहां पिछले तीस सालों से घरों में पड़ी दरारें हर रोज ग्रामीणों के खौफ में इजाफा कर रही हैं। बरेली-कर्णप्रयाग राजमार्ग पर स्थित खूपी गांव भूमियाधार ग्राम सभा का हिस्सा है जो पाइंस और कुरिया नाले के बीच बसा है। इस गांव में 60 से अधिक परिवार रहते हैं।

खूपी गांव में पहली बार दरारों को नोटिस आज से तीस साल पहले 1993 में किया गया था। गांव के नीचे बहने वाले नाले की सुरक्षा दीवार टूटने के बाद शुरू हुए भूस्खलन से गांव के बीम और कॉलम वाले मकानों की दीवारें तो छोड़िए कई मकानों के लिंटर तक में दरारें आ गई हैं। ऐसे प्रभावित लोगों ने बरसात का पानी घर में घुसने से रोकने के लिए उसी तरह लिंटर पर तिरपाल बिछा दी है, जैसे जोशीमठ के लोगों ने लिंटर गिरने से रोकने के लिए कभी लकड़ी की बल्लियां लगाई थी।

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इस खूपी गांव को बरसात में दोनों ओर के नाले नीचे से काटते हैं, जिसकी वजह से यहां की जमीन लगातार धंस रही है। गांव में प्रदीप कुमार, महेंद्र, वीरेंद्र आदि के मकानों की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। मकान की दरारें और दो हिस्सों में बंटा फर्श इन्हें दहशत में डालने की वजह बन रहा है। गांव के कई घरों की जहां बुनियाद तक दिखने लगी है तो इस गांव का प्राइमरी स्कूल भी कई साल पहले भूधंसाव की भेंट चढ़कर ध्वस्त हो चुका है, जिसे अब दूसरी जगह बनाया गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में भूधंसाव के पीछे नालों से हो रहे कटान के अलावा भारी निर्माण भी एक वजह है। उन्होंने प्रशासन से इस क्षेत्र में बड़े निर्माणों पर रोक लगाने की मांग की है। इसके अलावा इसी विकासखंड का गेठिया पड़ाव भी भूधंसाव की चपेट में है।

ग्राम प्रधान अमित के अनुसार 25 से अधिक घर खतरे की जद में है। बरसात में राष्ट्रीय राजमार्ग के लगातार धंसने से समस्या बढ़ती जा रही है। इसके अलावा तल्लीताल में ही ढुंगशिल की पहाड़ी भी लगातार भूस्खलन की चपेट में है। तल्लीताल स्थित ढुंगशिल की पहाड़ी से दो साल से लगातार भूस्खलन और पानी का रिसाव हो रहा है। इससे पहाड़ी के नीचे तथा ऊपर बसे लोग दहशत में है। यहां के लोग भी लंबे समय से प्रशासन से पहाड़ी से होते भूस्खलन का सर्वे कराने की मांग उठा रहे हैं।

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प्रशासन ने भूगर्भ वैज्ञानिकों से यहां सर्वे भी कराया गया है, लेकिन सर्वे को लेकर कोई ठोस वजह अभी सामने नहीं आ पाई है। लोग पहाड़ी से हो रहे भूस्खलन और पानी के रिसाव को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में कोई बड़ा खतरा न हो सके। लेकिन प्रशासन अभी चेत नहीं रहा है, जोशीमठ में भी समय रहते कहां चेता था?

पहाड़ों की रानी भी संकट में

उत्तराखंड के मसूरी शहर को पहाड़ों की रानी कहा जाता है, लेकिन उत्तराखंड में हो रहे भू धंसाव का संकट इस खूबसूरत शहर के नजदीक पहुंच चुका है। अंग्रेजों के बसाए इस खूबसूरत शहर के लंढौर में मुख्य सङक में मोटी दरारे पड़ने की वजह से सड़क अपने लेवल से काफी नीचे धस गई है। वैसे यह सड़क भी साल दर साल नीचे की ओर धंस रही है। मसूरी शहर के सबसे पुराने बाजार लंढौर के जैन मंदिर के पास सड़क पर जो मोटी दरारें पड़ गई हैं उससे सड़क के नीचे धंसने की वजह से लोगों के घरों, दुकानों में भी दरारें भी पड़ गई हैं। जैन मंदिर, होटल निशिमा के पास यह सड़क हर साल धंसती जा रही है। लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र का ट्रीटमेंट समय रहते तत्काल होना चाहिए। यह सड़क अपने लेवल से करीब दो फीट नीचे धंस चुकी है।

उत्तराखंड के मसूरी शहर को पहाड़ों की रानी कहा जाता है, लेकिन उत्तराखंड में हो रहे भू धंसाव का संकट इस खूबसूरत शहर के नजदीक पहुंच चुका 

इस मामले में नगर पालिकाध्यक्ष अनुज गुप्ता ने कहा कि लंढौर मुख्य मार्ग नगर पालिका की सड़क है। सड़क का रखरखाव भी पालिका द्वारा किया जाता है। कहा सड़क धसने का मामला उनके संज्ञान में है, लेकिन क्षेत्र में पेयजल लाइन बिछाने के लिए काम होना है। इसलिए सड़क की मरम्मत नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि पानी की पाइप लाइन बिछाए जाने के बाद सड़क की मरम्मत की जाएगी। जबकि मसूरी के एसडीएम शैलेन्द्र सिंह नेगी के संज्ञान में यह मामला अभी तक नहीं है। खुद यह बात कबूल करते हुए एसडीएम नेगी का कहना है कि उनके संज्ञान में मामला नहीं है, लेकिन शुरुआती जानकारी मिल गई है। मौके पर जाकर निरीक्षण किया जाएगा और जो भी उचित होगा कार्यवाही की जायेगी।

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