रोजगार-शिक्षा के लिए सरकार का खजाना खाली, लेकिन 1300 करोड़ का फ्लाईओवर बन गया पटना में

सवाल उठ रहा है कि क्या जिस राज्य का एक बड़ा तबका मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो और गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करता है, उस राज्य के लोगों को सैकड़ों-हजारो करोड़ के पुलों और सड़कों की जरूरत है या रोजगार, सस्ता इलाज और रहने के लिए मकान की...

Update: 2020-11-30 14:23 GMT

1300 करोड़ की लागत से बने दीघा-एम्स एलिवेटेड पुल का उद्घाटन करते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य

जनज्वार ब्यूरो, पटना। एक तरफ तो सरकार जनहितकारी योजनाओं के लिए फंड की कमी की बातें करती है, दूसरी तरफ सैकड़ो-हजारो करोड़ की दूसरी योजनाओं को चुटकियों में मंजूरी देती है और पूरा करती है।

सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजधानी पटना में 1289.25 करोड़ की लागत से बने 12.27 किलोमीटर लंबे दीघा-एम्स एलिवेटेड पुल का उद्घाटन किया। वहीं मॉडल सड़क के रुप में बन रहे दीघा-आर ब्लॉक छह लेन सड़क का उद्घाटन जनवरी 2021 के पहले हफ्ते में किया जाएगा। दीघा-एम्स एलिवेटेड पुल के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि इस पुल के बन जाने से लोगों को जाम से मुक्ति मिलेगी और काफी सहूलियत होगी।

बिहार को गरीब राज्य माना जाता है। यहां की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करती है तो निम्न मध्य आय वर्ग के लोगों की भी एक बड़ी संख्या है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जिस राज्य का एक बड़ा तबका मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो और गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करता है, उस राज्य के लोगों को सैकड़ों-हजारो करोड़ के पुलों और सड़कों की जरूरत है या रोजगार, सस्ता इलाज और रहने के लिए मकान की?


राज्य में बेरोजगारी का आलम यह है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान लगभग 40 लाख से ज्यादा की आबादी के प्रवासी होने और बिहार आने के लिए सड़कों पर किए गए संघर्ष की खबरों ने सुर्खियां बटोरी थीं।

बिहार में पैसे की कमी के कारण राज्य में अब 90 फीसदी से ज्यादा नई नियुक्तियां कॉन्ट्रेक्ट यानि ठेके पर की जा रहीं हैं। एक इससे भी नया प्रचलन शुरू हो गया है, जिसे आउटसोर्सिंग का नाम दिया गया है, अर्थात कोई और कंपनी सरकारी कार्यालयों और प्रतिष्ठानों में मैन पावर सप्लाई कर रही है।

इन सबके पीछे कारण यही होता है कि बजट कम होता है और सोच होती है कि ज्यादा पैसे इन सबपर खर्च नहीं हो। भले ही कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो और काम करने वाले इन कर्मियों को भी अल्प मानदेय पर काम करना पड़े और उन्हें सेवा शर्त की कोई सुविधा नहीं मिल पाए। इसे एक तरह की 'अर्द्ध बेरोजगारी' या फिर 'छिपी हुई बेरोजगारी' की भी संज्ञा दी जा सकती है।


भोजपुरी में एक कहावत है 'बइठल से बेगार भला' लगभग वही स्थिति कॉन्ट्रेक्ट और ठेका की नौकरी करने वालों की है। इनलोगों को इतना कम वेतन दिया जाता है, जिससे इनके जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं हो पाती। इन सबके पीछे कारण फंड का अभाव ही है।

बिहार चुनावों में बेरोजगारी का मुद्दा छाया रहा। विपक्षी महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने आंकड़े जारी कर कहा कि राज्य में 10 लाख सरकारी नौकरियों का तुरंत स्कोप है। उन्होंने इसके लिए शिक्षकों, पुलिसकर्मियों के साढ़े चार लाख खाली पदों के आंकड़े बताए। साथ ही केंद्र सरकार के अनुरूप कार्यबल की व्यवस्था के तहत साढ़े पांच लाख नए पदों की आवश्यकता बताई थी।

उन्होंने इसे प्रमुखता से अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल करते हुए यह भी कहा कि अगर उनकी सरकार बनो तो उनका पहला निर्णय इन 10 लाख सरकारी नौकरियों में बहाली का होगा। उन्होंने इन पदों पर कॉन्ट्रेक्ट और ठेका की नौकरी नहीं, बल्कि पूर्णतः सरकारी नौकरी देने का वादा किया था।

ऐसे में मुख्य सवाल यह बनता है कि राज्य के लोगों के लिए प्राथमिक जरूरत और समस्याएं क्या हैं? क्या राज्य के लोगों की जरूरतों और समस्याओं को सरकार नहीं समझ पा रही है या फिर समझने के बावजूद अनजान बनी हुई है?

दीघा-एम्स एलिवेटेड पुल के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संबोधन से राज्य सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट हो जाती हैं। नीतीश कुमार ने कहा 'इस पुल के उद्धाटन से राजधानीवासियों का चिर-प्रतीक्षित सपना पूरा हो गया। यह राज्य की जनता के लिए नई सरकार का पहला उपहार है।'

इससे पहले भी बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान सभाओं में नीतीश कुमार ने अपनी 15 साल की उपलब्धियों के तौर पर राज्य में सड़कों का जाल बिछाने और बिजली व्यवस्था सुधारने के कामों को बताया।

जाहिर है, राज्य सरकार के विकास के मायने और सोच यही है। सरकार के विकास का पैमाना पुल-पुलिया, सड़क, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं का निर्माण ही है, आम आदमी या फिर यूं कहें कि गरीब, सरकार के विकास मॉडल में कहीं फिट नहीं दिख रहा।

बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज यानी सोमवार को एम्स-दीघा ऐलिवेटेड पुल का उद्घाटन किया। 12.27 किलोमीटर लंबे इस पुल को बनाने 1289 करोड़ रुपये की लागत आई है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा 'इसके बारे में हम लोगों ने निर्णय 2013 में ही कर लिया था। यह हम लोगों की उसी समय की सोच थी, जिसके कारण हम लोगों ने एलिवेटेड बनाया और यह पहली बार ऐसा सोचा गया है कि एलिवेटेड सड़क के नीचे बगल से एक सड़क है। एलिवेटेड सड़क को ऊपर से क्रॉस करता हुआ एक दूसरा एलिवेटेड सड़क है।'

उन्होंने कहा कि इस एलिवेटेड परियोजना के निर्माण से पटना शहर को जाम से छुटकारा मिलेगा एम्स दीघा एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण बिहार राज्य पथ विकास निगम लिमिटेड की ओर से कराया गया है। यह बिहार में सबसे बड़ी एलिवेटेड परियोजना है। यह NH-98 के एम्स गोलंबर से शुरू होकर जेपी सेतु के दक्षिणी छोर पर समाप्त होती है। इस मौके पर राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद तथा रेणु देवी और पथ निर्माण मंत्री मंगल पाण्डेय भी मौजूद थे।

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