पुष्पम प्रिया का हार के बाद इमोशनल पोस्ट, कहा अंधेर नगरी में मनाएं अंधेरे का जश्न

पुष्पम कहती हैं, मीडिया मेरे कपड़ों और मेरी अंग्रेज़ी से ज़्यादा नहीं सोच पायी, बाक़ी पार्टियों के लिए चीयरलीडर बनी रही...

Update: 2020-11-11 14:18 GMT

जनज्वार। बिहार चुनावों के दौरान और प्रचार के समय एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा था, वह है पुष्पम प्रिया का, जिन्होंने खुद को सीएम पद का दावेदार घोषित किया था। पटना की बांकीपुर और मधुबनी की बिस्फी सीट से चुनावी मैदान में उतरी पुष्पम प्रिया ने मीडिया में विज्ञापन देकर खुद को अगला मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर रखा था। इसीलिए मीडिया की नजर उनकी दोनों सीटों पर बनी हुई थी कि क्या वो किसी एक सीट पर भी जीत हासिल करने में कामयाब हो पायेंगी, मगर उन्हें जिस तरह बहुत कम वोट मिले, जमानत भी बचाने में वह कामयाब नहीं हो पायी, उसके बाद वह बहुत दुखी नजर आई।

मूल रूप से दरभंगा की रहने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी ने लंदन के मशहूर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री ली है और वह मार्च से ही बिहार में काफी सक्रिय रहीं। उन्होंने बुरी तरह हारने के बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी है, जो वायरल हो रही है।

पुष्पम ने लिखा है, 'आज सुबह हो गयी पर बिहार में सुबह नहीं हुई। मैं बिहार वापस एक उम्मीद के साथ आयी थी कि मैं अपने बिहार और अपने बिहारवासियों की ज़िंदगी अपने नॉलेज, हिम्मत, ईमानदारी और समर्पण के साथ बदलूँगी। मैंने बहुत ही कम उम्र में अपना सबकुछ छोड़कर ये पथरीला रास्ता चुना, क्योंकि मेरा एक सपना था - बिहार को पिछड़ेपन और ग़रीबी से बाहर निकालने का।'

'बिहार के लोगों को एक ऐसी इज़्ज़तदार ज़िंदगी देना जिसके वो हक़दार तो हैं, पर जिसकी कमी की उन्हें आदत हो गयी है। बिहार को देश में वो प्रतिष्ठा दिलाना जो उसे सदियों से नसीब नहीं हुई।

'मेरा सपना था बिहार के गरीब बच्चों को वैसे स्कूल और विश्वविद्यालय देना जैसों में मैने पढ़ाई की है, जैसों में गांधी, बोस, अम्बेडकर, नेहरू, पटेल, मजहरूल हक़ और जेपी-लोहिया जैसे असली नेताओं ने पढ़ाई की थी। उसे इसी वर्ष 2020 में देना क्योंकि समय बहुत तेज़ी से बीत रहा और दुनिया बहुत तेज़ी से आगे जा रही। आज वो सपना टूट गया है, 2020 के बदलाव की क्रांति विफल रही है।

'हर छोर हर ज़िले में गयी, लाखों लोगों से मिली। आपमें भी वही बेचैनी दिखी बिहार को लेकर जो मेरे अंदर थी - बदलाव की बेचैनी। और उस बेचैनी को दिशा देने के लिए जो भी वक्त मिला उसमें मैंने और मेरे साथियों ने अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी। पर हार गए हम। इनकी भ्रष्ट ताक़त ज़्यादा हो गयी और आपकी बदलाव की बेचैनी कम। और मैं, मेरा बिहार और बिहार के वो सारे बच्चे जिनका भविष्य पूरी तरह बदल सकता था, वो हार गया।

'मीडिया मेरे कपड़ों और मेरी अंग्रेज़ी से ज़्यादा नहीं सोच पायी, बाक़ी पार्टियों के लिए चीयरलीडर बनी रही और आप नीतीश, लालू और मोदी से आगे नहीं बढ़ पाए। आपकी आवाज़ तो मैं बन गयी, पर आप मेरी आवाज़ भी नहीं बन पाए और शायद आपको मेरे आवाज़ की जरुरत भी नहीं। इनकी ताक़त को बस आपकी ताक़त हरा सकती थी, पर आपको आपस में लड़ने से फ़ुर्सत नहीं मिली।

'आज अंधेरा बरकरार है और 5 साल, और क्या पता शायद 30 साल या आपकी पूरी ज़िंदगी तक यही अंधेरा रहेगा, आप ये मुझसे बेहतर जानते हैं। आज जब अपनी मक्कारी से इन्होंने हमें हरा दिया है, मेरे पास दो रास्ते हैं। इन्होंने बहुत बड़ा खेल करके रखा है जिसपर यक़ीन होना भी मुश्किल है। या तो आपके लिए मैं उससे लड़ूूं, पर अब लड़ने के लिए कुछ नहीं बचा है ना ही पैसा ना ही आप पर विश्वास, और दूसरा बिहार को इस कीचड़ में छोड़ दूँ। निर्णय लेना थोड़ा मुश्किल है।

'मेरी संवेदना मेरे लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ है। फ़िलहाल, आप अंधेर नगरी में अंधेरे का जश्न मनाएँ और चौपट राजाओं के लिए ताली बजाएँ। जब ताली बजा कर थक जाएँ, और अंधेरा बरकरार रहे, तब सोचें कि कुछ भी बदला क्या, देखें कि सुबह आई क्या? मैंने बस हमेशा आपकी ख़ुशी और बेहतरी चाही है, सब ख़ुश रहें और आपस में मुहब्बत से रहें।'

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