Hindu Succession Act 1956: विधवा महिला की पहले पति से पैदा संतान भी दूसरे पति की संपत्ति में हिस्सेदार: गुजरात हाई कोर्ट

Hindu Succession Act 1956: भारतीय समाज के रिश्तों में कई तरह के ताने-बाने में होने वाले उतार-चढ़ाव को देखते हुए गुजरात उच्च न्यायालय का आया एक निर्णय भविष्य सामाजिक धारा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Update: 2022-06-27 16:15 GMT

Hindu Succession Act 1956: विधवा महिला की पहले पति से पैदा संतान भी दूसरे पति की संपत्ति में हिस्सेदार: गुजरात हाई कोर्ट

Hindu Succession Act 1956: भारतीय समाज के रिश्तों में कई तरह के ताने-बाने में होने वाले उतार-चढ़ाव को देखते हुए गुजरात उच्च न्यायालय का आया एक निर्णय भविष्य सामाजिक धारा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। रिश्तों की कई कड़िया अस्वभाविक तौर पर जोड़ने वाले एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक विधवा महिला के पूर्व पति से पैदा हुई संतान को भी दूसरे पति की संपत्ति में हिस्सेदार माना है। गुजरात हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद को लेकर चल रहे एक मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत यह महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

गुजरात उच्च न्यायालय में जस्टिस एपी ठाकुर की सिंगल बेंच में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर इस याचिका में यह केस में संपत्ति के मूल मालिक माखनभाई पटेल से जुड़ा था। पटेल ने अपने दो बेटों के साथ पत्नी कुंवरबेन को संपत्ति के उत्तराधिकारियों में से एक के रूप में नामित किया था। इसे 1982 के राजस्व रिकॉर्ड में भी दर्ज कर लिया गया था। बाद में, कुंवरबेन ने अपनी पिछली शादी से हुए बेटे की विधवा के पक्ष में भूमि के अविभाजित हिस्से के लिए एक वसीयत तामील कराई। लेकिन मामलातदार और डिप्टी कलेक्टर राजस्व रिकॉर्ड में संपत्ति को याचिकाकर्ता जो कि कुंवरबेन की बहू के उत्तराधिकारी थे, के नाम पर नहीं कर पाए। जिस पर याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कुंवरबेन संपत्ति की पूर्ण मालिक बन गई थीं और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार इसे बांटने का अधिकार था। इसके अलावा, 1982 में किसी भी पक्ष द्वारा उत्तराधिकार को चुनौती नहीं दी गई थी और इसलिए राजस्व अधिकारियों को वसीयत के अनुसार एंट्री करनी चाहिए।

लेकिन जब अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं के तर्क को नहीं माना तो याचिकाकर्ता इस मामले को न्यायालय के समक्ष ले गए। जहां न्यायालय की बेंच ने इस बात पर खास गौर किया कि कुंवरबेन की पहले किसी अन्य व्यक्ति से शादी हुई थी और उन्होंने बेटे को जन्म दिया था। बाद में उन्होंने माखनभाई से दूसरी शादी कर ली। उनकी वसीयत के अनुसार, माखनभाई से विवाह के बाद प्रतिवादी संख्या 5 और 6 का जन्म हुआ। बाद में उन्होंने अपनी संपत्ति को तीन हिस्सों में बांट दिया। पहला हिस्सा पिछली शादी से हुए बेटे की मृत्यु के बाद उसकी बहू के लिए और बाकी के दो हिस्से माखनभाई के साथ विवाह से पैदा हुए अपने दोनो बेटों के लिए।

हालांकि न्यायालय में प्रतिवादी संख्या 5 और 6 (कुंवरबेन के दूसरे पति से पैदा दोनो पुत्रों) ने जोर देकर कहा था कि चूंकि संपत्ति पैतृक थी इसलिए इसे केवल उन्हें ही दिया जा सकता है। उनकी मां के अन्य पुत्र की बहू के उत्तराधिकारियों का उस पर कोई अधिकार नहीं बनता है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के तहत जब बिना वसीयत किए किसी विधवा की मृत्यु हो जाती है तो बेटे और बेटी समेत उसके वारिस या अवैध संबंधों से जन्मी संतान भी उसकी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार होती है। जस्टिस एपी ठाकर ने आगे कहा कि चूंकि इस केस में मृतक विधवा संपत्ति के मालिकों में से एक थी, ऐसे में उसके पास अपना अविभाजित हिस्सा किसी को भी देने का पूरा अधिकार था। खासतौर से जब वसीयत को हाई कोर्ट के समक्ष किसी ने भी चुनौती नहीं दी हो। कोर्ट ने कहा, 'यहां हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम का जिक्र करना आवश्यक है जिसमें धारा 15 के तहत, एक हिंदू विधवा को अपने दूसरे पति से जमीन विरासत में मिल सकती है, यहां तक कि पहली शादी से पैदा हुए उसके बच्चे भी दूसरे पति की जमीन के वारिस हो सकते हैं।'

क्या कहता है अधिनियम ?

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की बात की जाए तो अधिनियम की धारा 15 के अनुसार किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत किए मृत्यु होने की स्थिति में उसकी संपत्ति उसके पुत्र, पुत्री और पति को, पति के वारिसों को, माता और पिता को, पिता के वारिसों को, माता के वारिसों को मिल सकती है। इस धारा में बेटे से आशय भी समझाया गया है कि अगर कोई हिंदू महिला के 2 बेटे हैं और उन दोनों के पिता अलग-अलग हैं, ऐसी स्थिति में हिंदू महिला की संपत्ति उसके दोनों ही पुत्रों को मिलेगी।

दूरगामी है यह निर्णय

भारतीय समाज के रिश्तों के ताने-बाने में कानून में स्पष्ट प्रावधान होने के बाद भी विधवा महिला के दूसरा विवाह करने पर उसकी पूर्व पति से पैदा हुई संतानों का अपनी माता के दूसरे पति की संपत्ति में हिस्सा न देने का आम रिवाज है। इस रिवाज का खामियाजा ऐसी संतानों को उठाना पड़ता था जो पहले ही अपने पिता को खो चुकी होती हैं। हालांकि यह गुजरात उच्च न्यायालय का ही निर्णय है। लेकिन भविष्य में इस निर्णय को नजीर बनाकर ऐसी संतान या उनके वारिसान को उनका वह हक दिलाए जाने में मदद मिल सकती है, जिससे वह सामाजिक रिवाजों व चालान के चलते वंचित रह जाते थे।

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