Naveen Shekharappa Murder: नवीन शेखरप्पा का हत्यारा कौन?

Naveen Shekharappa Murder: भारत में नरेंद्र मोदी सरकार बहुत काम करती है। यही बताना उद्देश्य रह गया है भारतीय अखबारों और न्यूज चैनलों का। यही वजह है कि न्यूज चैनलों और अखबारों में भारत सरकार चौबीसों घंटे काम करते दिखती है।

Update: 2022-03-02 05:31 GMT

Naveen Shekharappa Murder: नवीन शेखरप्पा का हत्यारा कौन?

नवल किशोर कुमार का विश्लेषण

Naveen Shekharappa Murder: भारत में नरेंद्र मोदी सरकार बहुत काम करती है। यही बताना उद्देश्य रह गया है भारतीय अखबारों और न्यूज चैनलों का। यही वजह है कि न्यूज चैनलों और अखबारों में भारत सरकार चौबीसों घंटे काम करते दिखती है। आम आदमी भी यही समझता है कि जब अखबारों में लिखा गया है तो कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होगी। वैसे भी प्रधानमंत्री कितने देर की नींद लेते हैं, यह बात सूचना के अधिकार कानून के तहत तो नहीं मांगी जा सकती। इसी तरह यह भी नहीं कि वह कितनी देर काम करते हैं। कल ही एक आलेख पढ़ रहा था। आलेख डॉ. आंबेडकर पर केंद्रित था। यह आलेख 1960 के दशक में लिखा गया था और लेखक थे चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु।

हिंदी पट्टी में जिज्ञासु जी का काम बोलता है। उन्होंने वर्चस्ववादी सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ लेखन किया। आजीवन इसी प्रयास में रहे कि हिंदी पट्टी के दलित-बहुजन गुलामी की जंजीरों को देखें और तोड़ें। दर्जनों पुस्तकों और अनेक पुस्तिकाओं के इस रचनाकार की शैली बहुत खास थी। विषय पर पकड़ तो खैर थी ही। उनकी शैली की विशेष चर्चा इसलिए कि वह लिखते समय प्रथम पुरूष बन जाते थे। अन्य पुरूष के रूप में वह नहीं लिखते। उन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि जो वह लिख रहे हैं, वह उनकी आंखों के सामने ना हो।

हालांकि हर किसी की तरह जिज्ञासु जी की अपनी सीमा रही है। मैं जिज्ञासु जी के जिस पुस्तक के संबंध में अपनी बात कह रहा हूं, वह डॉ. आंबेडकर को समर्पित था। इस किताब में उन्होंने डॉ. आंबेडकर के पूरे जीवन को अपनी शानदार भाषा में प्रस्तुत किया है। लेकिन एक जगह वह लिखते हैं कि जब डॉ. आंबेडकर पढ़ने के लिए अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय गये तब उनका पूरा ध्यान ज्ञानार्जन पर रहा। वे करीब 16 घंटे तक पढ़ते और शेष समय में वह शौच, भोजन और सोने का काम करते थे।

दरअसल, लिखते समय अक्सर हर कोई अतिरेक भी लिख जाता है और उसे पता नहीं चलता। जिज्ञासु जी भी अपवाद नहीं थे। लेकिन भारत के अखबार और न्यूज चैनल जो कर रहे हैं, वह अतिरेक नहीं है। यह साजिश है। इस साजिश का उद्देश्य है कि भारत के लोग अपने हुक्मरान की काहिलपनई से अंजान रहे।

मेरे सामने उस व्यक्ति का बयान है, जिसके बेटे नवीन शेखरप्पा की मौत यूक्रेन के खारकीव में कल हो गई। मौत की वजह यह रही कि वह खारकीव में फंसा था और एक बंकर में छिपकर रह रहा था। उसके पास भोजन खत्म हो गया था और वह भोजन लाने ही बाहर निकला था। लेकिन उसे क्या पता था कि वह जिस जीवन को बचाने के लिए भोजन लाने बंकर से बाहर निकला है, वही जीवन उससे रूसी सैनिकों की गोली छीन लेगी। भारत के अखबारों के मुताबिक भारत सरकार यूक्रेन में फंसे भारतीयों को लाने के लिए पिछले एक सप्ताह से रोज 24 घंटे काम कर रही है। हद तो यह है कि "जनसत्ता" में विशेष पन्ने का प्रकाशन किया है और इस विशेष पन्ने की सबसे पहली खबर है– "जनवरी के प्रारंभ में ही सक्रिय हो गई थी सरकार"। लेखक का नाम अनिल बलूनी है। वे भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद हैं। अपने इस आलेख में इन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे जनवरी के प्रारंभ में भारत सरकार को यह अहसास हो गया था कि यूक्रेन पर रूस हमला करेगा और वहां से भारतीय छात्र-छात्राओं को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी थी। इतना ही नहीं, भाजपा के इस सांसद ने यह भी लिखा है कि नरेंद्र मोदी की सूझबूझ और त्वरित गति से कार्य करने के कारण ही यूकेन से सभी भारतीय बच्चों की वापसी हो सकी है।

अब इसे क्या कहा जाय? दोष किसका है? मेरे हिसाब से अनिल बलूनी का तो कोई दोष नहीं है। वे जिनकी कृपा से राज्यसभा सांसद हैं, उनके बारे में अच्छा ही लिखेंगे, फिर चाहे वह शतप्रतिशत असत्य ही क्यों ना हो। हकीकत यह है कि अभी तक एक सप्ताह में करीब 2200 छात्र-छात्राएं भारत वापस आ सके हैं। वे किसी तरह अपनी जान बचाकर पहले यूक्रेन के समीपवर्ती देश पहुंच रहे हैं और फिर वहां से अपने पैसे से टिकट कटाकर वापस लौट रहे हैं। यह सब पूरी दुनिया देख रही है।

लेकिन जनसत्ता को क्या हुआ है जो किसी भी आलेख को छापने से पहले यह सोचता भी नहीं कि कहा क्या जा रहा है? हालंकि मेरा यह कथन भी गलत है। जनसत्ता सहित तमाम अखबारों के संपादक सोचते जरूर हैं। लेकिन वे यह सोचते हैं कि कहीं किसी आलेख में नरेंद्र मोदी की आलोचना तो नहीं की गई है।

वैसे दोष अखबारों का भी नहीं है। दोष रूस के सैनिकों का भी नहीं है, जिन्होंने भारत के कर्नाटक राज्य के 21 वर्षीय छात्र को गोली मार दी। फिर दोष यूक्रेन के राष्ट्रपति श्रीमान व्लादिमीर जेलेंस्की का भी नहीं है। लेकिन कोई ना कोई गुनहगार तो है।

मृतक नवीन शेखरप्पा के पिता ने अपने बयान में कहा है कि उनका बेटा डाक्टर बनना चाहता था। उसने भारतीय संस्थानों में दाखिले के लिए हुई परीक्षा में 97 प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे। लेकिन उसका दाखिला नहीं हो सका। भारत में निजी मेडिकल कॉलेज की फीस एक करोड़ रुपए के करीब थी। जबकि उससे बेहतर पढ़ाई की व्यवस्था यूक्रेन में बहुत कम कीमत पर उपलब्ध है। इस कारण ही उन्होंने अपने बेटे को यूक्रेन भेजा था। अब बताइए कि नवीन शेखरप्पा को किसने मारा? पुतिन ने, जेलेंस्की ने या नरेंद्र मोदी ने?

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