Sahitya Akademi Award विजेता को किताबों की रॉयल्टी के रूप में साल के सिर्फ 14 हजार रुपये!
Sahitya Akademi Award : मानव कौल ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि पिछले एक साल में वाणी प्रकाशन से श्री शुक्ल की छपी तीन किताबों का इन्हें मात्र छह हजार रुपए का भुगतान किया गया है.....
Sahitya Akademi Award विजेता को किताबों की रॉयल्टी के रूप में साल के सिर्फ 14 हजार रुपये!
Sahitya Akademi Award : वजीर (1971), कायपोचे, तुम्हारी सुलू जैसी चर्चित फिल्मों में अभिनय कर चुके अभिनेता मानव कौल (Manav Kaul) की एक इंस्टाग्राम पोस्ट इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। अभिनेता मानव कौल ने अपनी पोस्ट में वरिष्ठ लेखक 85 वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल के बारे में लिखा है - हिन्दी के दो अग्रणी प्रकाशकों राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन की ओर से किताबों की रॉयल्टी के रूप में कुल 14 हजार रुपए दिये। अपनी इस पोस्ट में मानव ने विनोद कुमार शुक्ल (Vinod Kumar Shukla) को इस देश का सबसे बड़ा लेखक बताया है।
मानव कौल ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि पिछले एक साल में वाणी प्रकाशन (Vaani Publication) से श्री शुक्ल की छपी तीन किताबों का इन्हें मात्र छह हजार रुपए का भुगतान किया गया है। वहीं राजकमल प्रकाशन से पूरे साल का उन्हें सिर्फ आठ हजार रुपए का भुगतान किया गया। मतलब देश का सबसे बड़ा लेखक साल का सिर्फ 14 हजार रुपए मात्र ही कमा पा रहा है। प्रकाशक को पत्र लिखने पर महीनों तक जवाब नहीं मिलता है।
मानव कौल की पोस्ट (Manav Kaul Instagrame Post) चर्चा में आने के बाद पत्रकार आशुतोष भारद्वाज से बातचीत में कहा कि वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं- दीवार में एक खिड़की रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन। दो किताबों के ईबुक संस्करण भी हैं। मई 1996 से लेकर अगस्त 2021, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल एक लाख पैंतीस हजार, अर्थात साला करीब पांच हजार रुपए मिले। जबकि इनमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जाएगी।
राजकमल से उनकी छह किताबें हैं- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लंबी कविता, प्रतिनिधि कविताएं, कभी के बाद अभी। सातवीं हाल ही में प्रकाशित हुई है। इनके अलावा ईबुक संस्करण भी हैं। उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल 2016 से मार्च 2020 तक, चार वर्षों में इतनी सारी किताबों के करीब 67 हजार रुपए दिए हैं। यानी प्रति वर्ष सतरह हजार रुपए। उन्होंने कहा-पिछले कई वर्षों से रायल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह कभी के बाद अभी का जिक्र भी नहीं है।
रॉयल्टी के अलावा विनोद कुमार शुक्ल का यह भी कहना है कि वाणी प्रकाशन उनके मौखिक और लिखित रूप से मना करने के बावजूद उनकी किताबों के नए संस्करण छाप रहा है।विनोद जी के अनुसार वाणी और राजकमल दोनों ने उनके ई-बुक्स के बारे में कोई अनुबंध किए बिना ही उनकी किताबों की ईबुक्स प्रकाशित और वितरित कर दी।
अब सवाल यह उठता है कि अगर इतने वरिष्ठ लेखकों को रॉयल्टी के रूप में साल के सिर्फ 14 हजार रुपए मिलेंगें तो आखिर साहित्य के लिए कौन अपनी सेवा दे पाएगा। गुणवत्तापूर्ण पठन सामग्री लोगों को कैसे उपलब्ध हो पाएगी।