अमेरिका ने पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर को किया प्रतिबंधित, इससे देश की सुरक्षा को खतरा
अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने एक जांच शुरू की थी। हाल में ही इस जांच का परिणाम सामने आया है, जिसके अनुसार यह सॉफ्टवेयर अमेरिका की विदेश नीति के खिलाफ है और इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
अमेरिका ने पेगासस को माना मानवाधिकार के खिलाफ।
वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पांडेय का विश्लेषण
अमेरिका ने इजराइल द्वारा निर्मित बहुचर्चित पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर ( Pegasus spy software ) को काली सूचि ( blacklisted ) में डाल दिया है| लगभग तीन महीने पहले फ्रांस की एक संस्था, फॉरबिडेन स्टोरीज (Forbidden Stories) के अंतर्गत दुनियाभर के पत्रकारों के एक दल (a consortium of journalists) ने खुलासा किया था कि इजराइल की कंपनी एनएसओ ( NSO ) द्वारा विकसित पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के माध्यम से दुनियाभर में पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं और अनेक सरकारों की जासूसी की जा रही है। इस खबर के बाद अमेरिका के वाणिज्य विभाग ( Commerce Department of USA ) ने एक जांच शुरू की थी। हाल में ही इस जांच का परिणाम सामने आया है, जिसके अनुसार यह सॉफ्टवेयर अमेरिका की विदेश नीति के खिलाफ है और इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
मानवाधिकार के लिए खतरा
अमेरिका के बाईडेंन प्रशासन ने इसे केवल अपने देश के लिए नहीं बल्कि दुनियाभर के लोगों के मानवाधिकार के लिए खतरा (dangerous for Human Rights) बताया है| काली सूचि में डालने का असर यह होगा कि अब अमेरिका में और इसके सहयोगी देशों में इसे बेचा नहीं जा सकेगा और इसके नाम पर कोई भी उपकरण और सामग्री अमेरिका के किसी कंपनी से नहीं खरीदी जा सकेगी।
सरकार की नीयत साफ नहीं
अमेरिका ने तो पेगासस को खुले तौर पर मानवाधिकार के लिए खतरा बताया है, फ्रांस समेत अनेक देशों में इसके उपयोग पर गहन जांच की जा रही है, पर हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के बार-बार पूछने के बाद भी सरकार ने आजतक पेगासस पर कोई जवाब नहीं दिया है, यह भी नहीं बताया है कि सरकार ने इसे खरीदा भी है या नहीं। जाहिर है, देश में पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों पर इसके उपयोग की जांच का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। सरकार की हरकतों और चुप्पी से इतना तो स्पष्ट है कि इसे सरकार ने गुप-चुप तरीके से खरीदा और प्रमुख विरोधियों की जासूसी की। यह, अब मोदी जी की हाल की विदेश यात्रा से भी स्पष्ट होता है।
इजरायल को न्योता मोदी की मजबूरी
स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर (Glasgow city on Scotland) में जलवायु परिवर्तन की बैठक (COP 26) के दौरान प्रधानमंत्री मोदी अपनी आदत के अनुरूप बहुत सारे वैश्विक नेताओं के गले पड़े, जिसमें इजराइल के प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट (Naftali Bennett) भी शामिल हैं और इन दोनों नेताओं की यह पहली औपचारिक मुलाक़ात थी। इजराइल के पिछले प्रधानमंत्री नेतन्याहू तो मोदी जी के घोषित मित्र थे और उनके कार्यकाल में मोदी जी इजराइल यात्रा पर गए थे और कहा यही जाता है कि तभी पेगासस सॉफ्टवेयर भारत के पास आया था। अब समस्या यह है कि जब पेगासस के बारे में सारी जानकारी मोदी सरकार छुपाना चाहती है तब इजराइल सरकार के गले पड़ना और उन्हें भारत आने का न्योता देना भी जरूरी है। पेगासस के सौदे के राज केवल भारत और इजराइल के पास हैं। ऐसे में अगर भारत सरकार कभी कुछ बताएगी नहीं तो राज को राज रहने देने के लिए इजराइल प्रधानमंत्री से विशेष मित्रता निभानी ही पड़ेगी।
भारत में मानवाधिकारों का हनन सामान्य सी बात
मोदी सरकार और इजराइल सरकार में मानवाधिकार का मुद्दा भी एक जैसा है। मोदी सरकार के लिए अपने ही नागरिकों के मानवाधिकार हनन एक सामान्य सी बात है तो दूसरी तरफ इजराइल सरकार के लिए फिलिस्तीनियों के मानवाधिकार कोई मायने नहीं रखते हैं – जबकि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार की खूब बातें करते हैं। हाल में ही संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के राजदूत गिलाड एर्दें (Gilad Erden) ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् की वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report of UN Human Rights Council) को सामान्य सभा (UN General assembly) में भाषण देने के दौरान फाड़ डाला और साथ में यह भी कहा कि इसकी असली जगह कूड़ेदान में है। वार्षिक रिपोर्ट में इजराइल के कब्जी वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र (Israel Occupied Territories Of Palestine) में इजराइल के कारनामों का खुलासा किया गया है, और इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना, युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्द्ध अपराध बताया गया है।
इजरायल की काबिलियत का डंका न पीटे सरकार
मई 2021 में जब इजराइल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध चल रहा था, तब इजराइल ने अपनी वायु सेना से गाजा पर हमले किए थे। 15 मई को इजराइल के आक्रमण में गाजा में एक भवन ध्वस्त हो गया था, जिसमें एसोसिएटेड प्रेस, अल जजीरा समेत अनेक समाचार पत्रों के कार्यालय थे। पूरे दुनिया की मीडिया ने इस खबर को दिखाया था। पर, 18 मई को जब इजराइल ने फिर से हवाई हमले किये तब गाजा में और आसपास के क्षेत्रों के रिहाएशी इलाकों पर बम गिराए गए थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इस हमले के दौरान 260 फिलिस्तीनियों की मौत हो गई थी, जिसमें 67 बच्चे, 40 महिलाएं और 16 बुजुर्ग थे। कुछ परिवार तो ऐसे भी थे, जिसके सभी सदस्य बमबारी में मार दिए गए। इस रिपोर्ट को इजराइल के राजदूत गिलाड एर्दें ने लगभग पूरी दुनिया के राजदूतों और शासनाध्यक्षों के सामने फाड़ डाला और इसे इजराइल के विरुद्ध साजिश करार दिया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग
भारत के लिए यह घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवाधिकार परिषद् के कुल 47 सदस्यों में एक भारत भी है और फिर से सयुंक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद् का सदस्य पुनःनिर्वाचित हो गया है। सरकार, मीडिया और सोशल मीडिया इसे ऐतिहासिक उपलब्धि करार दे रही है। दरअसल, अब वैश्विक मानवाधिकार की बागडोर उन हाथों में सिमट गई है जो खुलेआम मानवाधिकार का हनन करते हैं और इसे सही साबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों का सहारा लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र में 14 अक्टूबर को गुप्त मतदान द्वारा भारत समेत अर्जेंटीना, बेनिन, कैमरून, एरिट्रिया, फ़िनलैंड, गाम्बिया, होंडुरस, कजाखस्तान, लिथुआनिया, लक्सेम्बर्ग, मलेशिया, मॉन्टेंगरो, पैराग्वे, कतर, सोमालिया, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका को वर्ष 2022 से 2024 तक के लिए चुना गया है। मानवाधिकार कौंसिल में कुल 47 सदस्य होते हैं।
मानवाधिकार का हो रहा टूल के रूप में इस्तेमाल
डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनाने के बाद से मानवाधिकार परिषद् से नाता तोड़ दिया था, पर अब फिर से इसकी वापसी हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड ने कहा है कि वह ये सुनिश्चित करेंगी कि अफ़ग़ानिस्तान, म्यांमार, चीन, इथियोपिया, सीरिया और यमन में मानवाधिकार हनन पर पर्याप्त चर्चा की जाए, सभी देशों में बुनियादी आजादी और महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए, धार्मिक असहिष्णुता पर लगाम लगे, सभी नागरिकों के लिए समान कानून-व्यवस्था का पैमाना हो, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव रोका जा सके| लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड ने यह भी कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि मानवाधिकार के सन्दर्भ में दागी देश इस परिषद् के सदस्य नहीं बन सकें।
अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड का यह वक्तव्य कि बाईडेंन प्रशासन की मानवाधिकार के सन्दर्भ में अपनी एक घोषित नीति है। पेगासस सॉफ्टवेयर को काली सूचि में डाल कर अमेरिका ने अपना इरादा भी स्पष्ट कर दिया। अमेरिका की ऐसी नीति से मुकाबले के लिए मोदी सरकार को इजराइल जैसे मित्र की पहले से भी अधिक जरूरत होगी।