ग्रामीण भारत के अधिकांश लड़के-लड़कियां विवाह की उम्र तक नहीं जानते कि कैसे ठहरता है गर्भ : सर्वे में खुलासा

Update: 2020-01-19 05:39 GMT

भारत की जनसंख्या पर होने वाली चर्चा अधिकारों और शिक्षा को बढ़ावा देने पर केंद्रित होनी चाहिए। बेहतर होगा कि हम विस्फोट की भाषा के प्रयोग से बचें, जिसमें ज़ोर-ज़बरदस्ती के संकेत निहित हैं...

भारत में जनसंख्या विस्फोट कैसे है एक भ्रामक कहानी जानिये शिरीन जेजीभॉय से

स्वतंत्रता दिवस समारोह के अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने देश में जनसंख्या विस्फोट की ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने विस्फोटक रूप से बढ़ती जनसंख्या से उभरी चुनौतियों को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने संकेत दिया था कि जो लोग अपने परिवार को छोटा रख रहे हैं वे देशप्रेम का काम कर रहे हैं और कहा कि अन्य लोगों को उनका अनुसरण करना चाहिए।

क्या भारत में आज जनसंख्या विस्फोट पर चर्चा उचित है? हाल में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट 'यूनाइटेड नेशंस वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स' के अनुसार भारत की जनसंख्या वास्तव में 1.37 अरब तक पहुंच चुकी है। यदि भारत के सभी परिवार सिर्फ दो संतान वाले परिवार बनना चुनें तो भी आनेवाले दशकों में वह बढ़ेगी। ऐसा इसलिए कि प्रजनन आयु (Reproductive Age) में प्रवेश करने वालों की जनसंख्या ही अपने आप में बहुत बड़ी है। पर हमें भारत की जनन क्षमता (Fertility Rate) में आयी महत्वपूर्ण गिरावट को पहचानना होगा।

मारे देश की कुल प्रजनन दर (TFR) - एक स्त्री के जीवनकाल में होने वाली संतान की औसत संख्या 2.2 है। देश के 28 में से 17 राज्यों व 9 में से 8 केन्द्र शासित प्रदेशों (Union Territories) में यह प्रतिस्थापन दर (Replacement Rate) 2.1 है। यानि एक पीढ़ी से दूसरी तक कोई जनसंख्या जब अपने आपको बिल्कुल बराबरी से प्रतिस्थापित करती है, तक पहुँच गई है। इसका अर्थ है कि भारत के अधिकांश भागों में दंपत्तियों की दो ही संतान हैं।

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शेष राज्यों में और एक केंद्र शासित प्रदेश (दादरा और नगर हवेली) में अधिकांश भागों में पिछले दशक में गिरावट की गति महत्वपूर्ण रही है। ऐसा सभी सामाजिक समुदायों में देखा गया है और अगले दो दशकों में इसके प्रतिस्थापन स्तर पर पहुँचने की सम्भावना प्रबल है। भारत में 4 राज्यों के अलावा, चाहा गया प्रजनन दर–यानि किसी युगल की अपने दांपत्यकाल में चाही गई संतानों की संख्या मात्र 1.8 है, जो कि प्रतिस्थापन स्तर से काफी कम है और ऐसा सभी केंद्र शासित प्रदेशों* में भी है।

जाय इसके कि हमारा देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य इससे परिभाषित हो कि हम कितने बच्चे पैदा करते हैं, इस पूरी चर्चा का केंद्र यह होना चाहिए कि कैसे सभी दंपती उतने बच्चे पाने में समर्थ बन पाएं जितने कि वे चाहते हों। दस में से एक दंपती अगला गर्भधारण कुछ वक्त बाद चाहता है, परन्तु वह गर्भनिरोधक तरीका नहीं अपना पाता है, क्योंकि अपनी पसंद के तरीके तक उनकी पहुंच नहीं है। उन्हें इन तरीकों को इस्तेमाल करना नहीं आता या पूरा तंत्र परिवार के ऐतराज और अन्य बाधाओं से उबरने में उनके लिए मददगार नहीं है।

तीजा यह है कि बड़े पैमाने पर परिवार नियोजन की ज़रुरत पूरी नहीं हो रही है। खासतौर पर जवान लोगों के बीच जो जनसंख्या का वो हिस्सा है, जो संभवतः आगामी समय में भारत में प्रजनन का स्वरुप निर्धारित करेगा। इनमें पांच में से एक से अधिक (22 प्रतिशत) गर्भधारण को मुल्तवी करना चाहते हैं पर उनके पास ऐसा करने की जानकारी, आय या क्षमता का अभाव है। ऐसे ही वो हैं जिनका अनचाहा गर्भ ठहर गया है लेकिन गर्भपात की कानूनी अवस्था की सीमित जानकारी, सुविधाओं और प्रशिक्षित सेवा प्रदाताओं की कमी के कारण वे सुरक्षित गर्भपात के अपने अधिकार का उपयोग नहीं कर पाते हैं।

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मारा देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य यह भी बनता है कि हम अपने प्रबुद्ध कानूनों और नीतियों का पालन सुनिश्चित करें। उदाहरण के लिए प्रिवेंशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट (पीसीएमए) के होने के बावजूद चार में से एक से अधिक लड़कियों की शादी बचपन में कर दी जाती है। उनमें से कई ऐसी होती हैं जो कब और किससे शादी हो इन बातों को लेकर अपनी बात नहीं कह पातीं। जल्दी शादी और उसके बाद जल्दी प्रसव, दोनों ही लड़कियों के अधिकारों का हनन करते हैं। उनसे वही मौके छीनते हैं जैसे शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य, जिनके सहारे वे अपने गर्भधारण के बीच में उचित फासला रख सकें।

मारा देशभक्तिपूर्ण कर्त्तव्य यह भी है कि हम सभी बच्चों के लिए कम से कम माध्यमिक शिक्षा सुनिश्चित करें। परन्तु एन.एफ.एच.एस 4 (NFHS 4) की रिपोर्ट बताती है कि 20-24 साल की उम्र वालों में सिर्फ 60 प्रतिशत पुरुष और 52 प्रतिशत महिलाओं ने दसवीं कक्षा पूरी की। साथ ही 'असर' रिपोर्टों ने बार-बार दिखलाया है कि सीखने के नतीजे औसत दर्जे के ही हैं। हमने लगातार लड़कों और लड़कियों को इस अधिकार से वंचित रखा है कि वयस्क होते होते उनके पास गर्भधारण की बारे में पूरी जानकारी हो और अनचाहे गर्भ रोकने के बारे में पूरी मालूमात रहे। समग्र यौनिकता शिक्षा (Comprehensive Sexuality Education) उपलब्ध कराना अनेक स्थितियों में निषिद्ध (taboo) है।

दाहरण के तौर पर पॉपुलेशन कॉउन्सिल का उदया (UDAYA) शोध (बिहार और उत्तर प्रदेश) दिखलाता है कि सिर्फ 19 प्रतिशत लड़कियों और 8 प्रतिशत लड़कों को कभी यौन शिक्षा (Sex Education) मिली है। नतीजा यह है कि बहुत से लड़के-लड़कियां वयस्कता और विवाह में प्रवेश करने पर भी नहीं जानते कि गर्भ कैसे ठहरता है। कइयों को यह नहीं पता कि लड़की के पहले यौन सम्बन्ध के समय गर्भ ठहर सकता है या माहवारी न आना गर्भ ठहरने का संकेत हो सकता है। शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी दोनों ही कम उम्र के लोगों को यह जानकारी देने से कतराते हैं।

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विस्फोट की भाषा के बजाय भारत को अधिकारों को बढ़ावा देने के प्रति पुनः समर्पित होने की ज़रुरत है। स्वास्थ्य तंत्र को नयी दिशा मिलनी चाहिए और सेवाप्रदाताओं का पुनः प्रशिक्षण होना चाहिए, जिससे कि वो लोगों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं जो उनके चुनाव के अधिकार का सम्मान करती हैं, प्रदान करने के प्रति संवेदनशील हों और उन्हें उनके प्रजनन लक्ष्यों (चाइल्ड बेयरिंग गोल्स ) तक पहुंचाने में मददगार साबित हों। शिक्षातंत्र को नई दिशा मिलनी चाहिए कि वो इस बात की ज़िम्मेदारी ले कि जब नौजवान स्कूल ख़त्म करके निकलें तो उनके पास वो जानकारी और कौशल हों, जिनसे वो अनचाहे गर्भ से बच सकें और उनका प्रजनन सम्बन्धी स्वास्थ्य सुनिश्चित हो सके। अंततः संदर्भगत बाधाएं दूर की जानी चाहिए।

स्त्रियों और लड़कियों का ऐसा सशक्तिकरण होना चाहिए कि वे अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय ले सकें और उसमें यह निश्चय भी शामिल हो कि वो कब और कितने बच्चे पैदा करें। पुरुषों के हक़ के बारे में कायम पितृसत्तात्मक सामुदायिक रवैये जो स्त्रियों और लड़कियों से अच्छी शिक्षा, रोजगार और हिंसा से सुरक्षा के मौके छीनते हैं और उनको उनकी अपनी जिन्दगी के बारे में फैसले नहीं लेने देते हैं ,हर हाल में उन पे काबू पाना जरूरी है।

प्रजनन सम्बन्धी अधिकारों को बढ़ावा देने से यह सुनिश्चित होगा कि दंपत्ति उतनी ही संतानों को जन्म दें जितनी कि वो चाहते हैं। प्रजनन लक्ष्यों को लेकर जानकारी सहित चुनाव कर सकें। इसी के साथ भारत के जनसंख्या संतुलन के लक्ष्य भी साधे जाएंगे और यह सब बिना विस्फोट की भाषा और ज़ोर ज़बरदस्ती की आशंका के हो सकेगा।

* नेशनल हेल्थ एंड फैमिली सर्वे (एनएफ़एचएस4) आईआईपीएस व आईसीएफ़, 2017

(यह लेखक के निजी विचार हैं। शीरीन जेजीभॉय अक्शा सेंटर फॉर इक्विटी एंड वेलबीइंग की निदेशक हैं। वे जनसांख्यिकिकी की जानकार हैं। इन्होंने पॉपुलेशन कौंसिल, इंडिया में अपनी सेवायें दी हैं। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का हिंदी अनुवाद मनीषा चौधरी ने किया है।)

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