झामुमो-कांग्रेस के लिए भाजपा का इतिहास दोहराने का मौका?

Update: 2020-03-14 08:31 GMT

मात्र छह राज्यसभा सीटों वाला झारखंड बाहर के थैलीशाहों एवं दिल्ली से भेजे गए पाॅलिटिकल हैवीवेट को ऊपरी सदन में भेजने के लिए चर्चा में रहा है। पर, पहला बार ये दोनों परिस्थितियां झारखंड में नहीं हैं. हां, दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवारों की मौजूदगी से चुनाव जरूर बहुत रोचक हो गया है..

रांची से राहुल सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। झारखंड का राज्यसभा चुनाव हमेशा से रोचक रहा है। इस बार भी ऐसा ही है। दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवारों के मैदान में होने से प्रतिस्पद्र्धा बेहद कड़ी है। हालांकि इस बार एक अच्छी बात यह है कि चुनाव मैदान में आयातित थैलीशाह नहीं हैं, जिसके लिए झारखंड को बदनामियां मिलती रही हैं। राज्यसभा चुनाव के मौजूदा तीनों उम्मीदवार स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। इनमें एक शिबू सोरेन को छोड़ दो तो अपेक्षाकृत नए नाम हैं।

त्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने अध्यक्ष शिबू सोरेन को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने अपने नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश को उम्मीदवार बनाया है। भाजपा का उम्मीदवार तय होने के बाद कांग्रेस ने शहजादा अनवर को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया। शहजादा अनवर रांची से सटे रामगढ से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और झामुमो व राजद से भी जुड़े रहे हैं। कांग्रेस ने अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में उन्हें उम्मीदवार बनाकर उन छोटे राजनीतिक घटकों को लुभाने का प्रयास किया है, जो किसी न किसी तरह से बीते पांच सालों में भाजपा के सरकार में रहते हुए उसके मुख्यमंत्री रघुवर दास के रवैये से खुन्नस खाए हुए हैं।

नामांकन भरने के दौरान झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन

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कांग्रेस के उम्मीदवार से भाजपा की बढी बेचैनी

कांग्रेस द्वारा शहजादा अनवर को उम्मीदवार बनाए जाने पर भाजपा ने तल्ख प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन नहीं करती है। झारखंड के प्रभारी महासचिव अरुण सिंह ने कहा कि मात्र 18 विधायकों के बूते कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारा है। दरसअल, झारखंड में एक सीट पर जीत के लिए 28 विधायकों के वोट की जरूरत है। हालांकि सत्ताधारी खेमे को अपने प्रथम उम्मीदवार को जीत के बाद मिले अतिरिक्त वोटों का लाभ मिलता है। झारखंड में पिछले कई राज्यसभा चुनाव में कांटे की टक्कर हुई है और कई दफा सत्ताधारी खेमा बहुत मामली मतों से चुनाव जीतता रहा है।

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में पिछले साल हुए चुनाव में भाजपा के 25 विधायक चुने गए थे। बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने के बाद उनको अगर जोड़ दें तो विधायकों की संख्या 26 होती है। ऐसे में जीत पक्की करने के लिए उसे दो विधायकों का समर्थन चाहिए । लंबे अरसे से भाजपा की सहयोगी रही आजसू के पास दो सीटें हैं। अगर आजसू प्रथम प्राथमिकता के आधार पर भाजपा उम्मीदवार का समर्थन करती है तो दीपक प्रकाश की जीत पक्की है। लेकिन, इसमें संदेह है।

नामांकन के बाद दीपक प्रकाश (पीले कुर्ते में)

हालांकि कांग्रेस के अंदर शहजादा की उम्मीदवारी पर प्रभारी आपीएन सिंह और विधायक इरफान अंसारी में ठन गयी है। इरफान अंसारी कांग्रेस के युवा विधायक हैं और हर मुद्दे पर मुखर रहते हैं। उन्होंने कहा है कि आरपीएन ने अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए शहजादा को उम्मीदवार बनाया है और ऐसा कर भाजपा को वाॅकओवर दे दिया है। इस पर आरपीएन ने इरफान को चेतावनी दी है कि यह फैसला हाइकमान की जानकारी में लिया गया है और वे कार्रवाई के लिए मजबूर नहीं करें।

जीत-हार बहुत हद तक आजसू, एनसीपी व दो निर्दलीय विधायकों पर निर्भर

रअसल आजसू को लेकर भाजपा सशंकित है। इसी वजह से उसने चुनाव हारने वाले पूर्व सीएम रघुवर दास को राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया। आजसू को इस बात का अब भी अफसोस है कि दास की वजह से ही उसका भाजपा से गठबंधन नहीं हो सका और मनमाफिक सीटें नहीं मिली, जिससे न सिर्फ वह सत्ता से बाहर है बल्कि उसके पास ऐतिहासिक रूप से सबसे कम मात्र दो विधायक है। .

घुवर दास से मतभेदों के कारण भाजपा से बाहर हुए सरयू राय भी रघुवर दास का समर्थन राज्यसभा के लिए किसी हाल में नहीं करते। अब बाबूलाल मरांडी और दीपक प्रकाश ने उनसे संपर्क साध कर भाजपा को समर्थन देने का आग्रह किया है।

नसीपी के विधायक कमलेश सिंह व बरकट्टा के निर्दलीय विधायक अमित कुमार मंडल का वोट किसी ओर जाएगा, यह भी जीत हार को प्रभावित करेगा। अगर कमलेश सिंह पार्टी लाइन को मानेंगे तो उनका वोट स्वाभाविक रूप से झामुमो-कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में जाएगा।

त्ताधारी गठबंधन में झामुमो के पास 29, कांग्रेस के पास 18 व राजद के पास एक यानी 48 विधायक हैं। इस गठबंधन को भाकपा माले के एक विधायक का समर्थन मिलना भी तय है। पहली सीट पर झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन की जीत तय है। इसके बाद इनके पास 21 अतिरिक्त मत पहली प्राथमिकता के बचेंगे।

रअसल, विधायकों की संख्या के आधार पर राज्यसभा उम्मीदवार चुना जाना इसे आसानी से समझने भर के लिए है। इसके मतों की गणना में कई बारीकियां होती हैं। अगर तीन उम्मीदवार हैं तो वोट देने वाले विधायक उम्मीदवारों को लेकर अपनी पहली पसंद, दूसरी पसंद व तीसरी पसंद बताना होता है। ऐसे में रणनीतिक रूप से यह चुनाव लड़ जाता है और विपक्षी खेमे पर कई दफा आखिरी सीट के लिए भी सत्ताधारी खेमा भारी पड़ जाता है।

2016 के राज्यसभा चुनाव के वक्त भाजपा मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन से भी कम सीटों के साथ सत्ता में थी, लेकिन दोनों सीटों पर जीत दर्ज कर ली। एक सीट पर मुख्तार अब्बास नकवी जीते थे, जबकि दूसरी सीट पर महेश पोद्दार जीते थे। राज्यसभा चुनाव में एक पक्ष के उम्मीदवार को जीत के बाद मिले सरप्लस वोट दूसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर हो जाते हैं और पोद्दार उसी आधार पर जीते थे।

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स चुनाव में नकवी को प्रथम वरीयता के 2900 वोट हासिल हुए थे और उनका 264 सरप्लस वोट महेश पोद्दार को ट्रांसफर हो गया था, जिससे उनका वोट 2664 हो गया और वे 2600 वोट लाने वाले झामुमो प्रत्याशी बसंत सोरेन से जीत गए थे। यानी पोद्दार को निजी तौर पर बसंत से कम ही वोट मिले थे, लेकिन उन्हें अपनी पार्टी के पहले उम्मीदवार मुख्तार अब्बास नकवी के अतिरिक्त वोटों का लाभ हासिल हुआ। हालांकि उस चुनाव में झामुमो के चमरा लिंडा और कांग्रेस के देवेंद्र सिंह वोट नहीं दे सके थे. तब चुनाव में 79 विधायकों ने हिस्सा लिया था।

स बार हेमंत सोरेन की छोड़ी हुई एक सीट दुमका रिक्त है और चुनाव 80 विधायकों पर ही होना है। राज्यसभा चुनाव में मौजूदा परिदृश कमोबेश वैसा ही है जैसा 2016 में था. तब भाजपा में सत्ता में थी तो उसने दोनों सीटें सत्ता की ताकत सहित हर रणनीतिक दावं खेल कर जीत ली थी और आज झामुमो-कांग्रेस सत्ता में है तो उसके पास ही वैसा ही अवसर है।

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