कोरोना और NPR से जनगणना 2021 में आयेंगी भारी-भरकम मुश्किलें, समाज विज्ञानियों का दावा

Update: 2020-03-21 08:18 GMT

प्रणब राय समेत 200 से अधिक विशेषज्ञों ने मोदी सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि NPR को फिलहाल स्थगित कर दिया जाए, पर सरकार अपने एजेंडे पर कोई सुझाव नहीं चाहती...

महेंद्र पांडेय की टिप्पणी

जनज्वार। भारत की जनगणना एशियाई देशों में सबसे प्रतिष्ठित और सबसे पुरानी है। पहली बार यहां जनगणना वर्ष 1881 में की गई थी और तब से हरेक दस वर्ष में इसे किया जाता रहा है। अगले वर्ष यानी 2021 की जन गणना का काम पहली अप्रैल 2020 से शुरू होना है, जिसमें लगभग 30 लाख लोग पूरे देश से आंकड़े इकट्ठा करेंगे, पर अधिकतर सामाजिक वैज्ञानिकों का आकलन है कि इस बार के जनगणना में भारी—भरकम अड़चनें आने की संभावना है।

जकल देश में जिस तरह कोरोना वायरस का संक्रमण चल रहा है, इसमें इसके समय से शुरू होने की संभावना कम ही है। अभी तो संक्रमण काम है, पर अनेक विशेषज्ञ अप्रैल में इसके विकराल प्रसार का अनुमान लगा रहे हैं, ऐसे में जनगणना का काम यदि समय से शुरू भी हो जाए तब भी इसके सुचारू रूप से चलाने की संभावना कतई नहीं है।

गृहमंत्री अमित शाह और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही जोर देकर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) का काम अप्रैल महीने से शुरू करने का ऐलान कर चुके हैं। यह उनके अहम और प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बन चुका है, पर जनता किसी भी कीमत पर एक साथ दो सर्वेक्षण के लिए तैयार नहीं होगी।

देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा महीनों से नागरिकता संशोधन अधिनियम, नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स के प्रबल विरोध में खड़ी है। ऐसे में जब जनसंख्या और एनपीआर के आंकड़े एक समय पर जुटाने की योजना अनेक समस्याएं पैदा करेगी और अधिक संभावना यही है कि जनता जनगणना का बहिष्कार कर दे या फिर असहयोग कर दे।

भारत सरकार के भूतपूर्व प्रमुख सांख्यिकी अधिकारी, प्रणब सेन के अनुसार इस बार जैसी परिस्थितियां जनगणना के पूरे इतिहास में कभी नहीं रहीं और पहले के सभी जनगणना में जनता का भरपूर सहयोग मिला है। प्रणब राय के साथ 200 से अधिक विशेषज्ञों ने सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि एनपीआर को फिलहाल स्थगित कर दिया जाए, पर सरकार अपने एजेंडे पर कोई सुझाव नहीं चाहती।

सेन के अनुसार लोग एक समय पर दो सर्वेक्षण का हिस्सा नहीं बनना पसंद करेंगे। एन पी आर के विरोध में बड़ी आबादी है, इसलिए उसमें जनता के सहयोग की संभावना कतई नहीं है, और इसके कारण जनगणना में भी विरोध का सामना करना पड़ेगा और लोग सही आंकड़े देने में परहेज करेंगे।

यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के समाजशास्त्री सनल्ड देसाई के अनुसार देश के मौजूदा हालात को देखते हुए यही लगता है कि देश की एक बड़ी आबादी जिसमें अधिकतर मुस्लिम भी सम्मिलित हैं, इस बार संभवतः जनगणना का बहिष्कार करें या फिर अधूरी जानकारी दें। दोनों संभावनाओं में जनगणना के आंकड़े प्रभावित होंगे और जानकारी पूरी नहीं रहेगी। यह भविष्य के लिए बुरा होगा क्योंकि सारी योजनाएं इन्हीं आंकड़ों के आधार पर तैयार की जाती हैं।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज के विशेषज्ञ Arokiasamy Perianayagam के अनुसार एशिया के किसी दूसरे देश में इतने बृहत जनगणना का आयोजन नहीं किया जाता, जो पूरी आबादी की सटीक जानकारी से परिपूर्ण होता है, पर इस बार की जनगणना पहले जैसी होगी इसमें संदेह है।

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