Fact Check : पैरों में जंजीर बंधी जिस तस्वीर को स्टेन स्वामी बताकर किया जा रहा वायरल, वह निकली कैदी की

जनज्वार की पड़ताल में सामने आया कि जिस तस्वीर को स्टेन स्वामी का बताकर प्रसारित किया जा रहा था, वह 92 साल के एक कैदी बलवान सिंह की है....

Update: 2021-07-05 15:02 GMT

सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को स्टेन स्वामी की बताकर किया जा रहा है वायरल 

जनज्वार ब्यूरो। आज 5 जुलाई को भीमा कोरेगांव हिंसा में आरोपित मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की बीमारी के दौरान कैद में ही मौत हो गयी है। उनकी मौत के बाद से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि यह स्टेन स्वामी की है, जिन्हें अस्पताल में बहुत गंभीर हालत में होने के बावजूद पैर में जंजीर बांधकर जकड़ा गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही यह तस्वीर क्या स्टेन स्वामी है, इसकी पुष्टि के लिए जब जनज्वार ने स्टेन स्वामी के नजदीक रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अलोका कुजूर से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि यह तस्वीर उनकी नहीं है, हो सकता है पहले किसी ने प्रतीकात्मक तौर पर किसी ने प्रसारित की हो और बाद में इसे स्टेन स्वामी की बताकर प्रसारित किया जाने लगा।'

स्टेन स्वामी की तस्वीर होने का दावा करते हुए तमाम बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर शेयर किया है

जनज्वार की पड़ताल में सामने आया कि जिस तस्वीर को स्टेन स्वामी का बताकर प्रसारित किया जा रहा था, वह 92 साल के एक कैदी बलवान सिंह की है। उत्तर प्रदेश के एटा में 92 साल के बुजुर्ग कैदी के पैरों में जंजीर डालकर अस्पताल में इलाज कराने का मामला पिछले दिनों सामने आया था और जंजीर में बांधे जाने की तस्वीर जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो प्रशासन हरकत में आया था और सम्बंधित जेलकर्मी को निलंबित कर दिया।

एटा जिला कारागार के जेलर कुलदीप सिंह भदौरिया ने भी इस तस्वीर के बारे में पुष्टि की थी कि हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 92 वर्षीय बुजुर्ग बाबूराम बलवान सिंह की नौ मई को तबीयत खराब हो गई तथा उन्हें सांस लेने में भारी परेशानी होने लगी।

इस तस्वीर को शेयर करते हुए संजीव त्यागी फेसबुक पर लिखते हैं, '84 साल के अस्वस्थ वृद्ध फादर स्टेन स्वामी कोविड और पार्किंसन दो दो घातक बीमारी से लड़ रहे थे तब भी उनको अस्पताल में पैरों में जंजीर और बेड़ियों से बांधकर रखा गया। कितनी अमानवीयता और क्रूरता बरती गई एक वृद्ध के साथ यदि यही व्यवस्था है तो ऐसी व्यवस्था को आग लगा देनी चाहिए।'

संजीव त्यागी की वॉल से इस तस्वीर को मात्र कुछ घंटों में ही 100 से ज्यादा लोग शेयर कर चुके हैं, मगर किसी ने भी यह नहीं कहा है कि यह स्टेन स्वामी की तस्वीर नहीं है।

प्रवीण मल्होत्रा कहते हैं, 'क्रूर लेकिन भयभीत तानाशाही सरकार का घिनौना एवं अमानवीय कृत्य। एक 84 साल के निस्सहाय वृद्ध मानवाधिकारवादी से इतना खतरा कि उन्हें हॉस्पिटल में भी जो ऑक्सीजन स्पोर्ट पर हैं, पैरों में बेड़ियां डाल कर रखा गया था!'

रवि चंदेलकर ने फेसबुक पर जरूर इस तस्वीर की तस्दीक करने की बात कहते हुए लिखा है, 'सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि स्टेन स्वामी के बारे में लिखते हुए ये तस्वीर न लगायें। ये वो नहीं हैं। ये बूढ़ा आदमी बाबूराम बलवान सिंह है। जेल में बंद था, फिर कोविड के चक्कर में अस्पताल जाना पड़ा। एटा के एक अस्पताल की ये तस्वीर है। ख़बर मई 2021 की है।'

मोहन राय लिखते हैं, 'इसी को कहते हैं लोकतंत्र को हिटलरशाही/ तानाशाही में परिवर्तित कर देना। पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज सत्ता की राजनीति की रक्षक सभी दल चाहे वे तथाकथित बाम पंथी ही क्यूं ना हों तानाशाही पर उतर ही जाती हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में जनांदोलन का दमन एवम् उत्पीड़न इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।'

रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, 'बहुत शर्मनाक रवैया है यह। इसके लिए जो भी जिम्मेदार हों उनके विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई होनी चाहिए। यह अमानुषिकता की पराकाष्ठा है। अब हम सबको मान लेना चाहिए कि इस देश में नस्लवादी फासीवाद का आगमन हो चुका है।'

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