6 महीने तक सामूहिक बलात्कार की शिकार पीड़िता पर पुलिस डाल रही समझौते का दबाव

Update: 2018-12-18 05:15 GMT

महीनों तक गैंगरेप का शिकार रही महिला कहती है, पुलिस ने मेरे पास आकर कहा कि 50 हजार तुलसी से और 60 हजार अनिल गुप्ता से दिलाते हैं और मुझसे जबरदस्ती एक कागज पर लिखवाया कि अनिल गुप्ता और तुलसी ने मेरे साथ कोई गलत काम नहीं किया और मै यह पत्र अपनी मर्जी से लिख रही हूं....

दिल्ली, जनज्वार। एक 23 वर्षीय महिला द्वारा उसके साथ गैंगरेप कर जबरन बंधक बनाने का मामला दिल्ली महिला आयोग में दर्ज कराया गया है। पीड़ित महिला उत्तर प्रदेश के बांदा स्थित बबेरू थानाक्षेत्र के मर्का थाने की रहने वाली है। ससुराल वालों से किसी बात पर विवाद होने के बाद उसके रिश्ते का देवर शिवचरण यादव उसे मायके पहुंचाने के नाम पर बहला—फुसलाकर अपने एक साथी सूरजदीन के पास ले गया, जहां पहली बार उसका गैंगरेप किया गया।

उसके बाद शिवचरण यादव की मिलीभगत से गैंगरेप का सिलसिला 6 महीने तक चलता रहा, मगर किसी एक जगह नहीं, दर्जनों जगह। वह रोज तमाम धमकियों के साथ बलत्कृत होने को विवश रही। पहली बार एक महीने तक उसे बंधक बना रोजाना उसका बलात्कार किया गया और उसके बाद उसके महिला के हाथों 30 हजार रुपए में उसका सौदा कर दिया। उसके बाद वह महिला एक महिला के हाथों ही कितने लोगों के हाथों बिकी और कितनों ने उसके जिस्म को रौंदा यह सिलसिलेवार कहानी उसकी चिट्ठी खुद बयां कर देती है।

सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के संगठन बंधुआ मुक्ति मोर्चा के साथियों के तमाम प्रयासों के बाद पीड़ित महिला की कहानी दिल्ली महिला आयोग तक पहुंची है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के साथियों की प्रयास से ही यह महिला बलात्कारियों के चंगुल से छूटी। बंधुआ मुक्ति मोर्चा ही पीड़िता को बांदा से दिल्ली लेकर आए हैं ताकि न्याय के लिए दर—दर भटक रही महिला के आरोपियों को सजा मिल सके और महिला को न्याय।

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश कहते हैं, 'इस जघन्य अपराध को जिसके बारे में सुनने पर भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं यूपी और दिल्ली पुलिस दोनों का रवैया शर्मनाक रहा है। मैं उम्मीद करता हूं कि इस पीड़ित महिला को न्याय मिलेगा।'

13 दिसंबर को दिल्ली महिला आयोग के नाम भेजे शिकायती पत्र में पीड़िता मंजू (बदला हुआ नाम) ने दिल्ली के रानीबाग थाना इंचार्ज के पास खुद पर हुए जुल्मों की शिकायत दर्ज करवानी चाही तो पुलिस वालों ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय उसी का उत्पीड़न करना शुरू कर दिया। पुलिस वालों ने मंजू पर दबाव डाला कि वह आरोपियों से कुछ पैसे लेकर मामला रफा—दफा कर ले। जब महिला ने पुलिस की यह बात मानने से मना कर अपराधियों के विरूद्ध सख्त कार्रवाई करने की मांग की तो पुलिस ने न सिर्फ उसके साथ गाली—गलौच की, बल्कि उस पर लगातार दबाव डालते रहे।

वहीं इस मामले के रेस्क्यू टीम के प्रमुख दलसिंगार बताते हैं, 'जो लोग बांदा की 23 वर्षीय महिला के साथ हुए जघन्य अपराध में शामिल हैं उनके प्रति पुलिस की नरमी अपराध करने वालों का हौसला बढ़ाती है। इसी कारण समाज में निर्भया जैसे कांड होते हैं।'

संबंधियों के झांसे में आ जिस्म के सौदागरों के हाथों महीनों प्रताड़ित हुई मंजू ने दिल्ली महिला आयोग से गुजारिश की है कि उसने पत्र में जिन—जिन जगहों और व्यक्तियों का जिक्र किया है वहां छापे मार उन पर जल्द से जल्द कार्रवाई करे, ताकि कई मासूम जिंदगियों को नरक से छुटकारा दिलाया जा सके। इसके लिए मंजू ने कुछ आरोपियों के मोबाइल नंबर भी उपलब्ध कराए हैं, ताकि आरोपी बचकर निकल न पाएं। मगर महिला के जानकारी देने के बाद न यूपी पुलिस ने कोई कार्रवाई की, न ही दिल्ली पुलिस कोई कार्रवाई कर रही है।

इस केस के आलोक में Lalita Kumari. v/s Govt. Of U.P. & Ors मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देशों पर गौर करना चाहिए कि “Registration of FIR is Mandatory under Section 154 of the Code, if the information discloses commission of cognizable offence and no preliminary inquiry is permissible in such a situation.

पीड़िता द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर स्पष्ट होता है कि वह बहुत बदतर स्थितियों से बाहर निकली है। उसके साथ हुआ अपराध अत्यधिक घृणित है एवं cognizable offence की श्रेणी में आता है। गौरतलब है कि जिस्म के इस धंधे में कई प्रभावशाली एवं दबंग लोग शामिल हैं। इसलिए इस केस में अपराधियों के खिलाफ तुरन्त एफआईआर दर्ज कर उनकी जल्द से जल्द गिरफ्तारी बहुत जरूरी है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि इस घृणित अपराध में आरोपियों को पुलिस का पूरा साथ मिल रहा है, जिसके चलते अपराधियों का हौसला बुलंद है। इसमें एक राज्य की पुलिस नहीं बल्कि दिल्ली और यूपी पुलिस दोनों की भूमिका संदिग्ध रही है। अगर बलात्कारियों पर पुलिस द्वारा तुरंत एक्शन ले लिया जाता तो दिल्ली के डरावने और दिल दहलाने वाले निर्भया कांड जैसे अपराधों को बढ़ावा नहीं मिलता। इस मामले में भी पीड़ित महिला मंजू के मुताबिक पुलिस अधिकारियों ने सहयोग करने और सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाने के बजाय उल्टा उस पर डरा-धमका कर समझौता करने के लिए दबाव डाला गया।

पीड़िता मंजू कहती है, 'उपरोक्त संदर्भ में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने के संदर्भ में मैं दिनांक 14.12.2018 को रानी बाग पुलिस थाना में गई, लेकिन वहां की पुलिस ने मेरी कुछ भी नहीं सुनी। उल्टा मुझे ही डांटते-फटकारते रहे कि तू खुद ही गलत है और तू केवल पैसे के लिए इन सब ईमानदारों को फंसा रही है। तू नहीं जानती है कि इनकी कितने ऊंचे तक पकड़ है। तू इनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी, ये सब बहुत पैसे वाले हैं। तू खूद ही बर्बाद हो जायेगी। फिर मैंने कुछ कहना चाहा, परन्तु सभी ने मिलकर मुझे डराया धमकाया।' महिला द्वारा दिल्ली आयोग को लिखी गई चिट्ठी में सारा विवरण दिया गया है, जिसकी कॉपी जनज्वार के पास मौजूद है।

महीनों तक बलात्कार झेलती रही मंजू के मुताबिक, 'उसके बाद तुलसी और अनिल गुप्ता को पुलिस ने थाने में बुलाया और उनसे अलग से पहले बात की। उसके बाद पुलिस ने मेरे पास आकर कहा कि 50 हजार तुलसी से और 60 हजार अनिल गुप्ता से दिलाते हैं और पुलिस ने एक कागज पर जबरदस्ती बोल-बोलकर मुझसे लिखवाया कि अनिल गुप्ता और तुलसी ने मेरे साथ कोई गलत काम नहीं किया और मै यह पत्र अपनी मर्जी से लिख रही हूं।

मुझ पर दबाव डाला कि यह लिखो और साईन करो। समझौता करो जल्दी, तेरा बहुत हो गया सुबह से सुनते-सुनते। फिर मेरे से पुलिस ने साईन करवाये और मेरे ससुर को साइन करने के लिए बुलाया तो उन्होंने समझौता पत्र पढ़कर मना कर दिया। ससुर के मना करने पर पुलिस ने उनको गाली देते हुए भगा दिया और कहा कि तेरे खिलाफ उल्टा मुकदमा दर्ज करते हैं। ससुर को वहां से भगाने के बाद पुलिस ने मुझे कमरे में बंद कर कहा कि अपने ससुर के भी हस्ताक्षर कर, नहीं तो तुझे भी अभी ठीक करते हैं।'

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