पटना में बाढ़ के बाद बीमारियों से आएगी असली आफत, प्रशासन को भी नहीं पता किधर से निकलेगा पानी

Update: 2019-10-05 03:45 GMT
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पटना नगर निगम का कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं कि शहर में ड्रेनेज कितने किलोमीटर में है, शहर के ज्यादातर इलाकों के हफ्तेभर से डूबे रहने और लगभग हर मुहल्ले में जलभराव के संकट का मूल कारण है यही, मेयर ​कहते हैं बुडको के पास नक्शा होगा, हमने पुराने कर्मचारियों से साफ कराए नाले...

पटना से डॉ. सलमान अरशद की ग्राउंड रिपोर्ट

जनज्वार। बिहार, उत्तर प्रदेश में बारिश ने अपना जमकर कहर बरपाया है। बाढ़ की विभीषिका का असली असर अब नजर आने लगा है। जहां गांवों में अभी भी बाढ़ का पानी निकल नहीं पाया है, वहीं फसलें भी बाढ़ में तबाह हुई हैं, किसानों ने औने-पौने दामों में अपने मवेशी बेच दिये हैं, ताकि वो इस तबाही की भेंट न चढ़ जायें।

बात करें बिहार की राजधानी पटना की तो यहां दशकों बाद बाढ़ ने इस तरह शहर को लीला है। हालांकि अब पटना में बारिश नहीं हो रही है, लेकिन अब तक बारिश ने जो कहर बरपाया है, शहरवासी अभी उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं। इस रिपोर्ट के लेखक ने 3 अक्टूबर को पटना को एक बार फिर देखने और ताज़ा हालात से रू-ब-रू कराने के ख्याल से शहर के अलग अलग इलाकों को जायज़ा लिया।

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भास्कर में छपी खबर के मुताबिक, नगर निगम में शहर के ड्रेनेज नेटवर्क का नक्शा ही नहीं है। वह 2017 के बाद से गायब बताया जा रहा है। नक्शा नहीं होने के चलते निगम को न तो नालियों की सही-सही जानकारी है और न कैचपिट-मैनहोल की। किसी को मालूम नहीं, पानी किधर से निकलेगा। निगम का कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में भी नहीं है कि शहर में ड्रेनेज कितने किलोमीटर में है। शहर के कुछ पॉश इलाकों के सात दिनों से डूबे रहने और लगभग हर मुहल्ले में जलभराव के संकट का मूल कारण यही है।

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लम यह है कि जलनिकासी के लिए अंडरग्राउंड नालियों की तलाश में निगम वाले पानी की पाइप तक तोड़ दे रहे हैं। नक्शा पास न होने का सबसे बड़ा कारण कि शहर में नालों का निर्माण किसी एक एजेंसी से नहीं, एनबीसीसी, शहरी विकास विभाग, सांसद-विधायक निधि, बुडको, बिहार राज्य जल पार्षद व नगर निगम के माध्यम से कराया गया। निगम के पास खुद निर्मित नालों का नक्शा था, पर वह गायब है। अंडरग्राउंड ड्रेनेज तो नक्शा के कारण साफ नहीं किया जा सका, लेकिन ओपन ड्रेन को भी साफ नहीं कराया जा सका। इस पर शहर के मेयर ​कहते हैं बुडको के पास नक्शा होगा, हमने पुराने कर्मचारियों से नाले साफ कराए थे।

सी सिलसिले में वेली रोड पर स्थित अशोकपुरी कॉलोनी में भारत ज्ञान विज्ञान समिति के दफ्तर पहुंचे, जहां काम करने वाले लोगों विनोद कुमार सिंह और संतोष महतो से मुलाकात की। इनके दफ्तर की गली में अभी भी बहुत पानी भरा हुआ है। यहां पानी के कहीं बहकर जाने का कोई रास्ता नहीं है। लगातार धूप होती रहे तब भी पानी सूखने में हफ्ते भर से 15 दिन का वक्त लग जायेगा।

Full View के बाद शहर में मचे इस प्रलय पर विनोद कुमार सिंह कहते हैं, शहर में जलभराव की स्थिति के लिए जहाँ प्रशासन जिम्मेदार है, वहीं नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। लोग अपने घरों का कूड़ा नालियों में फेंकते रहते हैं, जिससे नालियां पट जाती हैं। साथ ही वे हैरानी जताते हैं कि अख़बारों से पता चलता है सरकार ने करोड़ों रुपये नालियों की सफाई पर खर्चा किया है, लेकिन नालियों की स्थिति को देखते हुए पता नहीं चलता कि ये पैसा कहाँ खर्च हुआ।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति से संबद्ध संतोष महतो कहते हैं, 'शहर के मेयर का कहना है कि हमारे यहां 49 पम्प ख़राब हैं, जिससे पता चलता है कि प्रशासन के पास इस भयावह स्थिति से निबटने की कोई तैयारी नहीं थी। जनता आवाज़ उठाये तो शायद इस स्थिति में कोई बदलाव आये और आगे से लोगों को इतनी तबाही न झेलनी पड़े।

गौरतलब है कि पटना सिटी के कई इलाकों में बारिश के तकरीबन 1 हफ्ते बाद भी अच्छा-खासा पानी भरा हुआ है। ऐसे ही जलभराव वाले शहर के एक इलाके में सेवानिवृत्ति सरकारी कर्मचारी मोहम्मद नईम से मुलाकात हुई। वे दिन भर घर पर ही रहते हैं, उनकी गली और आंगन में पानी भरा हुआ है। वो नीतीश सरकार से इस कदर नाराज़ हैं कि कहते हैं, 'इस बार ये सरकार जरूर गिर जाएगी।'

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हीं रहने वाली एक खातून कहती हैं, उन्हें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली। यहां रहने वाले बच्चे फिक्रमंद हैं कि उनका स्कूल बंद है और वो पढ़ने नहीं जा पा रहे।

टना शहर के कई इलाकों में बेघर-बार लोग रहते हैं, ये वो लोग हैं जो शहर को बनाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, लेकिन यही शहर इन्हें अपनी आगोश में थोड़ी जी जगह भी नहीं देता। शहर को बनाने वाले ये लोग शहर के बाहर किसी उपेक्षित जगह पर पनाह पाते हैं। पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन के पीछे, ओवरब्रिज के नीचे नाले के दोनों तरफ ऐसे ही लोगों की एक बस्ती है।

हजारों मवेशी फंसे हुए हैं बाढ़ में, किसान औने—पौने दामों में बेचने को मजबूर

हाँ रहने वाले बिरजू, सोनू, सुलेखा देवी और नागेन्द्र कुमार से बातचीत की। बिरजू एक मजदूर हैं, पिछले 6 महीने से उन्हें काम नहीं मिल रहा है, और इस बारिश ने उनकी झोपड़ी को भी निगल लिया। फ़िलहाल बिरजू सड़क किनारे एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में खुले आसमान के नीचे गुज़ारा करते हैं। सोनू हाईस्कूल का छात्र है, लेकिन इस बारिश में उसकी किताबें भीग चुकी हैं, फ़िलहाल किसी तरह दिन में एक बार खाने का बंदोबस्त हो पाता है। सोनू भी सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे रात गुज़ारते हैं।

सुलेखा देवी भी इन्ही में से एक हैं। उनका अनुरोध है कि सरकार उन्हें कहीं थोड़ी सी ज़मीन दे दे तो वो अपने बच्चों के साथ सुकून से गुज़ारा कर सकें। नागेंद्र पास की बस्ती में रहते हैं। उनके घर में अभी भी टखने के ऊपर तक पानी है। घर से बाहर निकलने के लिए जो रास्ता है, उसमें गले तक पानी भरा हुआ है है, नाव में बैठकर वो मुख्य सड़क तक आ पाते हैं। इन सभी लोगों का कहना है कि सरकार या किसी समाजसेवी संस्था की ओर से इन्हें अब तक किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिली है।

Full View आसपास सड़क के किनारे और खाली प्लॉटों में पानी भरा हुआ है, जिसमें गंदगी पटी हुई है। पास में एक गाय मरी हुई है, जिसकी बदबू दूर तक फ़ैल रही है। बारिश की विभीषिका से मुक्त होने से पहले बीमारी फैलने का खतरा है, लेकिन इन स्थितियों से निबटने की कोई तैयारी शासन-प्रशासन की तरफ से नहीं दिखाई देती।

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