बीवी की लाश घर में दफ़नाने को मजबूर हुआ एक महादलित

Update: 2018-09-15 03:28 GMT

यह अमानवीयता और बर्बरता की हाइट भारत के हाशिए के समाज की दुर्दशा की दास्तान है, जिन्हें पहले अछूत कहकर प्रताड़ित किया जाता रहा है उन्हें आज भी समाज में कई स्तरों पर सामाजिक वंचना और आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है....

सुशील मानव की रिपोर्ट

जब हम विकास की बात करते हैं तो किसके विकास की बात करते हैं। जब हम डवलप इंडिया की बात करते हैं तो किस इंडिया की बात करते हैं। जब हम मनुष्यता की बात करते हैं तो किसकी मनुष्यता की बात करते हैं।

सरकार एक ओर दलित शब्द के इस्तेमाल पर बैन करके दलित अस्मिता पर हमले करती है, तो दूसरी तरफ समाज के लोग एक महादलित को अपनी जमीनों पर बीवी की लाश तक दफनाने नहीं देते। एक ओर सरकार दलितों का हिंदूकरण करने में लगी हुई है दूसरी ओर हिंदू समाज उन्हें इंसान तक मानने को तैयार नहीं है।

मैं जो सुना रहा हूँ वो किसी महादलित की विवशता का नहीं निकम्मी सरकारों और हिंदू समाज की बेशर्मी का किस्सा है। ताजा मामला बिहार के मधुपुरा जिले के कुमरखंड ब्लॉक के केवतगामा गांव की है। इस गांव के एक महादलित व्यक्ति को अपने घर के अंदर अपनी बीवी को दफनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उसके पड़ोसियों ने गांव में अपनी जमीनों पर उसे अपनी बीवी के अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी, जबकि गाँव में महादलित के लिए कोई सामुदायिक श्मशान नहीं है।

हरिनारायण ऋषिदेव दलितों में भी सबसे दीन हीन महादलित समुदाय से ताल्लुक़ रखनेवाले भूमिहीन व्यक्ति हैं, जो दैनिक मजदूरी करके परिवार का जीवन यापन करते आया है। 9 सितंबर 2018 रविवार को अचानक उनकी बीवी सहोगिया देवी बीमार पड़ गई। उन्हें डायरिया हो गया और एक दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।

सबसे पहला सवाल तो यही खड़ा होता है कि डायरिया (दस्त) जैसी सामान्य बीमारी से किसी व्यक्ति की मौत होना। जिस देश में एक महादलित महिला की मौत डायरिया जैसे सामान्य बीमारी से हो जाए, उस देश को डिजिटल इंडिया बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने की बात करने वाले को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

अपनी राजनीति और वोटबैंक तैयार करने के लिए दलितों के भीतर महादलित जैसे वर्ग रेखांकित करने वाले नीतीश कुमार को भी अपने पद पर रहने का कोई नैतिक हक़ क्यों है, जबकि उनके ही शासनकाल में एक महादलित को अपने साथी की लाश को दफ़नाने के लिए पूरे गाँव में कई जगह नहीं मिलती और थक-हारकर उसे अपने ही घर में उसे दफ़नाना पड़ता है।

40 साल के हरिनारायण ऋषिदेव विक्षुब्ध और भरे मन से पूरे वाकिये पर कहते हैं- "वह दस्त से पीड़ित थी। जब कोई ग्रामीण अपनी जमीन पर दफनाने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं था, तो मैंने उसे अपने घर में दफनाने का फैसला किया।"

ये अमानवीय और बर्बर घटना भारत के हाशिए के समाज की दुर्दशा की दास्तान है। जिन्हें पहले अछूत कहकर प्रताड़ित किया जाता रहा है उन्हें आज भी समाज में कई स्तरों पर सामाजिक वंचना और आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है।

आरक्षण को बार बार मुद्दा बनाकर दलित वर्ग और संविधान पर हमला बोलने वाले सवर्ण समाज के लोग अपने बर्बर समाज के इस कुकृत्य को भलीभांति देख समझ लें। पीड़ित हरिनारायण ऋषिदेव का कहना है कि भूमिहीन लोगों को गरिमा के साथ जीवन जीने से वंचित कर दिया गया है, यहां तक कि किसी की मृत्यु के बाद शव को दफनाने तक के लिए वे एक श्मशान तक से वंचित हैं।

उन्होंने आगे कहा, 'मैं नहीं चाहता कि यह सब मेरे जैसे दूसरे भूमिहीन भाइयों के साथ भी दोहराया जाए।' पीड़ित हरिनाराण का कहना है कि अब हम प्रत्येक पंचायत में हमारे समुदाय के लिए एक अलग श्मशान भूमि की मांग करते हैं, जबकि गाँव के पूर्व मुखिया बेचन ऋषिदेव ने भी समुदाय के लिए अलग श्मसान की मांग दोहराते हुए कहा "उत्पीड़ित, भूमिहीन अनुसूचित जाति लोग मृत्यु के बाद भी शांति में आराम नहीं कर सकते हैं।

हरिनारायण की पीड़ा सरकार को ले जाना चाहिए और उन्हें तुरंत सुधारात्मक उपायों के साथ आना चाहिए, अन्यथा हमें शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू करने के लिए मजबूर होना होगा। इस अमानवीय घटना के बारे में सूचना पाने के बाद मधेपुरा के एसडीओ बृंदा लाल कुमारखंड सर्कल अधिकारी के साथ गांव पहुंचे। बृंदा लाल ने कहा, "हम गांव जा रहे हैं और ग्रामीणों और पंचायत मुखिया के साथ बातचीत करने के बाद दाह संस्कार के लिए जमीन के एक टुकड़े को उपलब्ध कराया जाएगा।"

प्रश्न तो तब भी उठता ही है सरकार और प्रशासन द्वारा भूमिहीन महादलित समुदाय के मृतकों के बुनियादी न्यूनतम अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम अब तक क्यों नहीं उठाया गया।

सवाल ये भी है कि एक 35 साल की महिला की मौत दस्त जैसी सामान्य बीमारी से कैसे हो गई। सरकार उसे मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं मुहैया करवा सकी? देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी खस्ताहाल क्यों हैं, जबकि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ही देश का दलित और पिछड़े वर्ग बुरी तरह से निर्भर है।

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