भारत में पिछले छह वर्षों में पत्रकारों पर हुए 200 से भी ज्यादा गंभीर हमले, 40 की मौत : स्टडी रिपोर्ट

Update: 2019-12-30 11:08 GMT

2014 से 2019 के बीच पत्रकारों पर हुए 200 से ज्यादा गंभीर हमले, सबरीमाला मंदिर प्रवेश को कवर करने वाली 19 महिलाओं को भी बनाया गया निशाना....

जनज्वार। पिछले पांच वर्षों में भारत में पत्रकारों पर हमलों पर की गई एक नई स्टडी से पता चला है कि 2014 और 2019 की अवधि में देश में पत्रकारों पर 200 से अधिक गंभीर हमले हुए हैं।

मिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की गेटिंग अवे विथ मर्डर नामक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, 2014-19 के बीच पत्रकारों की 40 हत्याएं हुईं। इनमें से 21 की पुष्टि उनकी पत्रकारिता से जुड़े होने की हुई है।

सके अलावा 2010 से अब तक मारे गए 30 से अधिक पत्रकारों के मामलों में केवल तीन ही मामलों के दोषी साबित हुए हैं। जिन तीन मामलों के दोषियों को सजा हुई है उनमें जे डे (2011 में मारे गए), राजेश मिश्रा (2012 में मारे गए) और तरुण आचार्य (2014 में मारे गए) के मामले शामिल हैं।

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स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक हत्याओं और हमलों के अपराधियों में सरकारी एजेंसियां, सुरक्षा बल, राजनीतिक दलों के सदस्य, धार्मिक संप्रदाय, छात्र समूह, आपराधिक गिरोह और स्थानीय माफिया शामिल थे।

Full View रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि साल 2014 के बाद से भारत में पत्रकारों पर हमलों के मामलों एक को भी दोषी नहीं पाया गया है। उन्हें जांच के काम के लिए निशाना बनाया गया।

स रिपोर्ट के निष्कर्ष के मुताबिक, कमजोर और सुस्त पुलिसिया जांच के कारण पत्रकारों की हत्या और हमलों के अपराधी बच गए हैं।

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स्टडी से यह भी पता चलता है कि महिला पत्रकारों पर भी हमले समय-समय पर बढ़े हैं। सबरीमाला मंदिर प्रवेश को कवर करने वाली 19 महिला पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया।

स्टडी रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जाहिर की गई है कि मीडिया के भीतर बढ़ते ध्रुवीकरण, राजनीतिक दलों के स्वामित्व वाले या करीबी मीडिया हाउसों के पक्षपात, पत्रकारों पर हमले में मीडिया ने भूमिका निभाई है।

Full View रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगुलुरू में गौरी लंकेश, श्रीनगर में शुजात बुखारी और छत्तीसगढ़ में माओवादी हमले में मारे गए दूरदर्शन के कैमरापर्सन अच्युतानंद साहू का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्री भाषा के प्रकाशनों के पत्रकारों, कर्मचारियों या स्ट्रिंगर्स के रूप में काम करने वालों पर भी हमले बढ़े हैं। गैरकानूनी गतिविधियों की इंवेस्टीगेशन करने वाले सात पत्रकारों के मामले हैं जिनको निशाना बनाया गया। इनमें पत्रकारों की रेत खनन, अवैध शराब का कारोबार, जमीन पर कब्जा, पानी माफिया आदि की रिपोर्ट शामिल हैं।

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स स्टडी को पत्रकारों और मीडिया शोधकर्ताओं और ठाकुर फैमिली फाउंडेशन द्वारा किया गया था। सीएए और एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों पर हुए हमलों पर शोधकर्ताओं ने प्रेस को बयान जारी कर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बीते छह वर्षों के न्याय के दयनीय रिकॉर्ड को देखते हुए इन अन्यायों पर जवाबदेही और समाधान की थोड़ी ही उम्मीद है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 11 दिसंबर से 21 दिसंबर के बीच देश भर में कम से कम 14 पत्रकारों पर पुलिस ने हमला किया, उन्हें डराया और परेशान किया गया। उनमें से अधिकांश संख्या मुस्लिम समुदाय की है।

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