भूख सहन नहीं हुई तो आदिवासी गरीब बच्चे ने खा लिया जहर

Update: 2019-01-02 15:23 GMT

गरीब परिवार की हालत इतनी खस्ता थी कि बच्चे तक को दो जून की रोटी के लिए तरसना पड़ रहा था। जब भूख से बच्चा बेहाल हो गया तो उसने बजाय भूख से तड़प—तड़प कर मरने के जहर खा लिया, ताकि उसे शांति से मौत नसीब हो

जनज्वार। यह खाये-पीये-अघाये लोगों के लिए सिर्फ खबर की एक लाइन हो सकती है कि एक बच्चे ने खाना न मिलने पर जहर खा लिया। मगर यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि हमारी सरकारें गरीबों—पिछड़ों के विकास, उन्हें भरपेट भोजन के तमाम दावे करते हैं, मगर हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

हाल में 31 दिसंबर को ऐसा ही एक मामला आया है मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के आदिवासी इलाके में। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक गरीब परिवार की हालत इतनी खस्ता थी कि बच्चे तक को दो जून की रोटी के लिए तरसना पड़ रहा था। जब भूख से बच्चा बेहाल हो गया तो उसने बजाय भूख से तड़प—तड़प कर मरने के जहर खा लिया, ताकि उसे शांति से मौत नसीब हो।

घटना की खबर मिलने पर स्थानीय प्रशासन ने सुध ली और बच्चे को तुरंत उपचार के लिए ले जाया गया। शुरुआती छानबीन में सामने आया कि रतलाम जिले के आदिवासी ग्राम अंबा पाड़ा की राशन दुकान से जहर पीने वाला बच्चा सुनील राशन लेने कई दिनों से जा रहा था, किंतु दुकान वाले ने गेहूं नहीं दिया। घर में खाने को कुछ भी नहीं था। भोजन किए कई दिन हो गए थे। भूख लगातार बढ़ते-बढ़ते असहनीय स्थिति में पहुंच गई थी, तो उसने जान देने के लिए कीड़े मारने की दवा पी ली, जिससे उसकी तबीयत काफी ज्यादा खराब हो गई।

जहर खाने वाले बच्चे के पिता नानूराम ने मीडिया को बताया, हमारे परिवार पर बहुत कर्जा चढ़ चुका है। मैं पैसे कमाने के लिए कोटा गया था, ताकि परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब हो सके, मगर वहां से मेरे भाई का फोन आया कि मेरे बेटे सुनील ने कीटनाशक पी लिया है सब काम छोड़कर घर आ गया। फिलहाल सुनील उपचाराधीन है।

वहीं इस मामले में बजाना के तहसीलदार रमेश मसारे कहते हैं दोषियों के खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करेंगे। शायद बच्चा 21 दिसम्बर के बाद राशन लेने गया होगा, इसलिए उसे निर्धारित अवधि के बाद जाने के कारण राशन नहीं दिया गया होगा। सच्चाई क्या है यह जांच के बाद ही सामने आ पायेगा।

गौरतलब है कि रतलाम जिले के ग्राम बाजना और सैलाना आदिवासी अंचल में रोजगार की काफी कमी है और ज्यादातर परिवार यहां खेती ही अपना गुजर—बसर करते हैं, मगर खेती में भी इतना अनाज नहीं उगता कि दो जून की रोटी नसीब हो पाए।

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