गंगा में लाश : मछुआरों पर आया रोटी का संकट, मछली खरीदने से कतरा रहे लोग

अगर यही हाल रहा तो सरकार की नाकामी व अफवाहों के चलते व्यवसाय पूरी तरह हो ठप हो जाएगा व हजारों परिवारों के सामने रोटी का संकट उत्पन्न हो जाएगा....

Update: 2021-05-23 15:04 GMT

(रोजी रोटी का संकट : मछुआरों ने बताया एक सप्ताह से काफी प्रभावित है बिक्री। पहले कुछ गांव घूमने पर ही बिक जाती थी मछलियां लेकिन अब पूरे दिन घूमने के बाद भी बच जा रही हैं)

जितेंद्र उपाध्याय के साथ मनीष दुबे, संतोष देव गिरी और दिनेश राय की रिपोर्ट

जनज्वार। कोरोना के कहर के बीच नदियों में तैरते शव ने एक नए हालात पैदा कर दिए हैं। शव के चलते मछलियों के संक्रमित होने की अफवाह ने मछुआरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। इसका असर गंगा के तटीय जिलों के गांवों से लेकर नदी से जुड़ी ताल तलयों से मछली मारने वाले मछुआरों पर पड़ा है।

कोरोना की दूसरी लहर शहरों से लेकर गांव की गलियों तक तेजी से फैलने का नतीजा रहा कि हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। सरकारी आंकड़ों से कई गुना अधिक मौत का आलम इस कदर पैदा हुआ है कि अंत्येष्टि करना भी मुश्किल हो गया। अंत्येष्टि स्थल तक शवों को ले जाने के लिए चंद लोग तक न मिलने व गरीबी के चलते ये हालात पैदा हुए हैं। देखते देखते गंगा के तट का हिस्सा सैकड़ों किलोमीटर तक तैरते शव से पट गए।

हाल यह है कि प्रदेश के बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और उन्नाव समेत कई जिलों में नदियों में बड़ी संख्या में शव बहते हुए मिलने के बाद अफवाहों की एक नई तस्वीर उत्पन्न हो गई है। अब चर्चा यह है कि शवों को मछलियों के खाने व इसके बाद लोगों के सेवन करने से कोरोना का संक्रमण हो सकता है। इसका कोई वैज्ञानिक आधार न होकर मात्र अफवाहों के चलते एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसका असर कुछ जिलों में सुनाई भी पड़ने लगी है।

मिर्जापुर में गंगा घाट के किनारे मछुआरों की नावें, कभी मछलियों की तलाश में नदी के चक्कर काटती नावें अब कर रहीं कोरोना खत्म होने का इंतजार

वाराणसी जिले के रमना गांव निवासी घनश्याम कहते हैं कि काशी विद्यापीठ ब्लॉक के रमन पुरवा समेत आसपास के गांव के मछुआरे बाजार में मछलियों के न बिकने से इसे सुखा कर पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में भेजने की तैयारी कर रहे हैं। इन कारोबारियों का कहना है कि लोग मछली खरीदने से कतराने लगे हैं।

इन लोगों का कहना है कि नदियों में तैरते शवों को खाने से मछली भी संक्रमित हो जा रही हैं। यह अफवाह अगर तेजी से फैलता रहा तो यह एक बड़ा संकट बन सकता है। वाराणसी जिले के रमना गांव के अलावा छीतुपुर, मगरवा समेत आधा दर्जन गांव के मछुआरे इसी का व्यवसाय से जुड़े हैं।

इसके अलावा रामनगर से राजघाट पुल के मध्य के इलाके में भी रह रहे मछुआरे मछली का व्यवसाय करते हैं। इनकी पिछले कई पीढ़ियों से रोजी रोटी का यही बड़ा साधन है। इनके सामने एक नया संकट उत्पन्न हो गया है। सरकार की नाकामी का नतीजा मछुआरे भुगत रहे हैं।

मऊ जिले के मधुबन अंतर्गत तालरतोय ताल तकरीबन 21 किलोमीटर परिक्षेत्र में फैला है। गंगा से हाहा नाला होते हुए ताल में पानी आता है। इसके फैलाव का नतीजा है कि आस-पास के 26 गांव के मछुआरों की बड़ी आबादी मछली के व्यवसाय से खुशहाल है। प्रमुख मछली व्यवसायी रामप्रवेश साहनी का कहना है कि कोरोना ने भारी तबाही मचाई है। अब कारोबार प्रभावित होने लगा है।

अगर यही हाल रहा तो सरकार की नाकामी व अफवाहों के चलते व्यवसाय पूरी तरह हो ठप हो जाएगा व हजारों परिवारों के सामने रोटी का संकट उत्पन्न हो जाएगा। इसको लेकर समय रहते सरकार व प्रशासन को कदम उठाना चाहिए। ऐसी ही दलील गाजीपुर मछुआरा संगठन के नेता रमेश साहनी व बलिया के लक्ष्मी साहनी की भी है।

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चंदोली व वाराणसी के प्रमुख मछली कारोबारी अनिल साहनी मौजूदा हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि एक ओर सरकार के समय से कदम न उठाने के चलते कोरोना संक्रमण का इतने बड़े पैमाने पर खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब रोटी का संकट बीमारी पर भी भारी पड़ जाएगी।

देवरिया जिले के मझौली राज निवासी व जिला सहकारी मत्स्य विपणन फेडरेशन लिमिटेड के उपाध्यक्ष व प्रशासन की तरफ से मछुआरा प्रतिनिधि पारस निषाद कहना है कि निषादों का एकमात्र मछली ही आमदनी का साधन है। अधिकांश मछुआरा परिवारों के पास खेती योग्य जमीनें नहीं हैं। छोटी गंडक के सटे गांव मेहरोना, पिंडी, खरवानिया, कर्मुवा, तकिया धरहरा, भागलपुर , मझौली राज डोल छपरा, प्यासी, बड़कागांव , खैराट, बलुवा अफगान समेत दो दर्जन से अधिक गांव मछुआरा समुदाय की आबादी के बड़े गांव है। जिनके लिए एक मात्र मछली का व्यवसाय आमदनी का साधन है।

अब हाल यह है कि अफवाहों के कारण लोग मछली खरीदने से कतराने लगे हैं। कारोबार इसी तरह प्रभावित रहने पर रोटी का एक बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा। यही परेशानी मछली के कारोबार से जुड़े मझोली निवासी प्रभुनाथ निषाद ,संतोष साहनी, शंकर निषाद, प्यासी निवासी विधान साहनी ,पटवारी साहनी, सुरेश साहनी, कर्महुआ निवासी दरबारी साहनी, रामकुमार साहनी, नवलपुर के ललन साहनी, गोरख साहनी, बरसी पार के लीला धर साहनी, रंगीला साहनी, राम छबीला साहनी, डोलछपरा के राम आशीष साहनी, सुरेंद्र साहनी, बभनौली के संतोष साहनी, डुमरी खरवनिया के छेदी, लालबहादुर, मायापुर चुरिया के लालबाबू ,पदम ,धर्मेंद्र भी जताते हैं।

इनका कहना है कि पहले मछलियों की मांग अधिक थी। बाजार बंद पड़े हैं। गांव व कस्बों में घूमकर बेचने का कार्य करते थे। इधर एक सप्ताह से बिक्री काफी प्रभावित है। पहले कुछ गांव घूमने पर ही मछलियां बिक जाती थी लेकिन अब पूरे दिन घूमने के बाद भी बच जा रही है। मेहरवना घाट से सटे आधा दर्जन मल्लाहों की बहुल आबादी वाले गांवों के लोगों के सामने संकट उत्पन्न हो गया है।

गढ़वा खास गांव के निषाद, मल्लाह जाति के लोगों का कहना है कि मछली की बिक्री एकदम ठप हो गई है। इनका कहना है कि बारिश के दिन बड़ी संख्या में मछलियां निकलने के बाद भी बिक नहीं पाई। लिहाजा मुफ्त में बांटनी पड़ी। इसके बाद भी कुछ लोग डर से नहीं लिए। अगर यही हाल रहा तो कोरोना से अधिक भुखमरी भारी पड़ेगी।

संकट में फंसी सरकार अब धर्म गुरुओं का लेगी सहारा

नदियों में लगातार शव मिलने से विपक्ष के आरोपों से घिरी उत्तर प्रदेश सरकार अब धर्म गुरुओं का सहारा लेकर इस सिलसिले में लोगों को जागरूक करने की बात कर रही है।

राज्य सरकार के एक प्रवक्ता के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बैठक कर अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा है कि शवों की अंत्येष्टि के लिए जल प्रवाह अथवा नदी के किनारे दफनाने की प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। इस संबंध में धर्मगुरुओं से संवाद किया जाए क्योंकि लोगों को जागरूक करने की आवश्यक्ता है।

उन्होंने आदेश दिया है कि एसडीआरएफ तथा पीएसी की जल पुलिस प्रदेश की सभी नदियों में लगातार गश्त करती रहें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी दशा में शव का जल प्रवाह न हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि मृतकों के परिजनों के प्रति प्रदेश सरकार की संवेदनाएं हैं और अंत्येष्टि की क्रिया मरने वाले की धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप ससम्मान की जाए।

उन्होंने कहा कि अंत्येष्टि क्रिया को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा आवश्यक वित्तीय सहायता भी दी जा रही है और यदि परम्परागत रूप से भी जलसमाधि हो रही है अथवा कोई लावारिस छोड़ रहा है तो भी उसकी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप उसका अंतिम संस्कार कराया जाए।


मछुआरों की नाराजगी बढ़ी तो योगी सरकार के भविष्य पर उठेगा सवाल

यूपी में तकरीबन 12 फीसदी आबादी मल्लाह, केवट और निषाद जातियों की है। यूपी की तकरीबन 20 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां निषाद वोटरों की संख्या अधिक है। पूर्वांचल की कई लोकसभा सीटों पर इनकी संख्या और भी अधिक है। गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर लोकसभा सीटों पर निषाद वोटरों की संख्या अधिक है।

एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश के तकरीबन 100 विधानसभा सीटों पर निषाद मल्लाह जातियां चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। लोकसभा की गोरखपुर क्षेत्र में तीन से साढ़े तीन लाख, देवरिया क्षेत्र में एक से सवा लाख, बांसगांव में डेढ़ से दो लाख, महाराजगंज में सावा दो से ढाई लाख, पडरौना में ढाई से तीन लाख मतदाताओं की संख्या इन जातियों से संबंधित है। जिनकी नाराजगी प्रदेश की योगी सरकार नही झेल सकती है।

हाल यह है कि मछली का कारोबार प्रभावित होने की इन जातियों को जहां चिंता सता रही है वही दूसरी तरफ अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर इनकी नाराजगी की चिंता प्रदेश सरकार को सताना स्वाभाविक है।

ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि मछली को लेकर लोगों में फैल रहे भ्रम को दूर करने के लिए सरकार हर संभव उपाय करेगी, जिससे की मल्लाह का रोजगार बचाया जा सके व साथ में सरकार आने वाले चुनाव में इनकी नाराजगी से बच सके।

बिहार के बक्सर में लाशें मिलने के बाद नहाने से भी डरने लगे हैं लोग

बिहार में बक्सर के रामरेखा घाट का विशेष महत्व है। मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने यहां ऋषि मुनियों का यज्ञ विध्वंस करने वाली राक्षसी ताड़का का वध किया था और शिवलिंग की स्थापना भी की थी। इसके अलावा भी कई ऐतिहासिक और पौराणिक किस्से इस धरती से जुड़े हैं। मिनी काशी के रूप में विख्यात बक्सर से होकर उत्तरायणी गंगा भी बहती है, जहां स्नान ध्यान से लेकर शवदाह तक के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं, परंतु 10 मई से जो लाशों के मिलने का सिलसिला शुरू हुआ, उसने आम जनमानस को अंदर तक झकझोर दिया।

प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालुओं से गुलजार रहने वाला बक्सर का रामरेखा घाट इन दिनों अजीब खामोशी की चादर ओढ़े सो रहा है। नमामि गंगे योजना द्वारा गंगा को निर्मल बनाने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना द्वारा 20 अरब 33 करोड़ रुपये अब तक खर्च करने के बावजूद गंगा की इस दुर्दशा पर तो लोग अब सवाल भी उठाने लगे हैं। तस्वीरों के माध्यम से आप देख सकते हैं कि बिहार में संपूर्ण लॉकडाउन लगे होने के बावजूद किस कदर गंगा का पानी प्रदूषित हो चुका है। आलम यह है कि अब तो लोग पतित पावनी गंगा में स्नान करने से भी डरने लगे हैं कि कहीं पाप धोने वाली गंगा एक नया रोग न दे दे।

बुजुर्ग नाविक की आंखें एक बार फिर से देखना चाहती हैं गंगा को गुलजार, ताकि घर की रोजी रोटी चल सके ठीक से

पिछले वर्ष 2020 में भी संपूर्ण देश में लॉकडाउन लगा था, लेकिन तब गंगा निर्मल व स्वच्छ हुई थी। लेकिन, इस बार लोगों के पाप धोने वाली गंगा खुद लाशों के बोझ से कराह रही है। वहीं दूसरी तरफ गंगा के किनारे बसा एक बड़ा तबका मछली मारकर अपनी आजीविका चलाता है। लेकिन गंगा में लाशों का दौर शुरू होने के बाद लोग मछलियों को खाने से भी डरने लगे हैं, जिसके कारण इन मछुआरों के आजीविका पर भी संकट आ खड़ा हुआ है। सरकार गरीब बेसहारों के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, लेकिन इन योजनाओं का लाभ इस वर्ग को नहीं मिल पा रहा है। जिसको लेकर इन मछुआरों और पंडे—पुजारियों में खासा आक्रोश व्याप्त है।

गंगा में बहती लाशों से मिर्जापुर के मछुआरों के जीविकोपार्जन पर बड़ा बुरा असर

मिर्जापुर में कल तक जो मछुआरे नाव संचालन के साथ साथ गंगा नदी से मछलियां मारकर अपने व अपने परिवार का पेट पालते आ रहे थे, इन दिनों वह ना केवल काफी परेशान हो उठे हैं, बल्कि उनकी रोजी रोटी कैसे चलेगी इसके लेकर भी वह खासे चिंतित हैं। जनज्वार टीम ने शनिवार 22 मई को मिर्ज़ापुर नगर से लगे हुए नारघाट तथा अन्य गंगा के तटवर्ती इलाकों का जायजा लेने के साथ इन मछुआरों से रू-ब-रू होते हुए उनके आर्थिक स्थिति की नब्ज को न केवल टटोला है, बल्कि उनकी वेदनाओं को भी करीब से जाना देखा और सुना।

गौरतलब है कि बिहार राज्य के बक्सर, गाजीपुर, वाराणसी, उन्नाव, भदोही, प्रयागराज सहित अन्य कई जनपदों की नदियों में भारी संख्या में बहती हुई लाशें, रेत में गड़ी हुई लाशों के मिलने से मछली खाने के शौकीन लोगों ने अब मछली से दूरी बना ली है। लोगों को भय है कि गंगा में बहाए जाने वाली लाशें कोविड मरीजों की रही हैं, जो कोरोना संक्रमित होने के कारण काल के गाल में समा गए, जिनकी लाशों को बहा दिया गया है ऐसे में उनकी लाशों को मछलियां खाई होंगी इसलिए उन मछलियों को खाना हितकर नहीं होगा। लोगों को भय है कि कहीं मछलियों के खाने से उन्हें भी कोविड का खतरा ना उत्पन्न हो जाए, जिसका सीधा असर मछुआरों के रोजी-रोटी पर पड़ा है। किसी तरह मछली मारकर परिवार की रोजी रोटी चलाने वाले मछुआरे इन दिनों परेशान हैं। कोई उनकी मछलियों को लेने वाला नहीं है, ऐसे में वह परिवार की जिम्मेदारियों का कैसे निर्वहन करें? उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सरकारी स्तर पर भी अभी तक उनके मदद के लिए कोई आगे नहीं आया है।

मछुआरा राजू कुमार : कोरोना संक्रमण के कारण तथा गंगा नदी में मिलने वाली लाशों की वजह से मछलियों का व्यापार बुरी तरह से हुआ है प्रभावित

मिर्जापुर के नारघाट निवासी राजू कुमार बताते हैं, "कोरोना संक्रमण के कारण तथा गंगा नदी में मिलने वाली लाशों की वजह से मछलियों का व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। पिछले दिनों लोग गंगा घाट तक मछलियों को लेने के लिए आ जाते थे, लेकिन अब मछलियां तो लेना दूर है लोग इधर झांकना भी नहीं चाहते हैं उन्हें कोविड का भय है।"

कुछ इसी तरह की चिंता अन्य मछुआरे भी व्यक्त करते हैं। वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यह संक्रमण का दौर कब समाप्त होगा और कब उनकी रोजी-रोटी प्रारंभ होगी? मिर्ज़ापुर नगर से लगने वाले गंगा घाटों के किनारे कभी गंगा की लहरों में रफ्तार भरती हुई दिखने वाली नावें इन दिनों एक किनारे खड़ी हो गई हैं। गंगा इस पार से लेकर उस पार तक लोगों को पार कर आने वाले नाविक नाव संचालन के साथ-साथ मछली मार कर भी अपने दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर लिया करते थे, लेकिन गंगा नदी में बहती हुई लाशों के कारण नाव का संचालन भी बुरी तरह से प्रभावित हो गया है। गौरतलब हो कि मिर्जापुर नगर के गंगा के तटवर्ती इलाकों के कई ऐसे परिवार हैं जिनके गुजर बसर का सहारा नाव संचालन से लेकर मछली मारकर परिवार का पेट पालना है वह इन दिनों मछली व्यवसाय पर आफत के बादल मंडराने से काफी परेशान हैं।

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