प्रेमचंद के "ठाकुर का कुआं" की याद दिलाता झारखंड का अड़ाल नवाडीह गांव, जहां लोहरा आदिवासी नहीं भर सकते कुएं से पानी

लोहरा परिवारों के मुहल्ले में न तो सरकारी चापानल है, न कुंआ और न जलमीनार। अलबत्ता इन लोगों को पानी पीने के लिए गांव के बाहर तालाब के समीप एक दांड़ी है जिससे ये लोग पानी लेते हैं, लेकिन गर्मी के आते ही वह भी सूख जाता है....

Update: 2023-06-13 09:41 GMT

प्रेमचंद के "ठाकुर का कुआं" की याद दिलाता अड़ाल नवाडीह गांव, जहां लोहरा आदिवासी नहीं भर सकते कुएं से पानी

विशद कुमार की रिपोर्ट

झारखंड में लोहरा जनजाति (आदिवासी) एक बड़ी जनजाति है, जिसकी संख्या एक लाख से अधिक है। 1981 की जनगणना के अनुसार एकीकृत बिहार में इनकी कुल जनसंख्या 1,69,089 थी। झारखंड में आज अन्य जनजातियों की तरह इनका भी केन्द्रीकरण रांची, सिंहभूम, पलामू, हजारीबाग और संथाल परगना के जिलों में मिलती हैं, छिटपुट रूप से ही अन्य जिलों में मिलते हैं।

आजकल रांची जिले के सिल्ली प्रखंड अंतर्गत बड़ा चांगडू पंचायत के अड़ाल नवाडीह गांव की एक खबर सुर्खियों में है, जो काफी चौकाती है। खबर चौकाने वाली इसलिए है कि वह प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुंआ' की याद दिला रही है। खबर के मुताबिक इस गांव में 3 लोहरा जनजाति परिवार के करीब 19 सदस्य रहते हैं। इन्हें पानी के लिए रोजाना मशक्कत इसलिए करनी पड़ती है कि गांव के अन्य जाति के लोग जो ओबीसी से आते हैं, जिनमें कुरमी समुदाय सहित नाई, कमार आदि जाति के लोग रहते हैं, के कुंआ से ये लोग पानी नहीं भर सकते। यह सिलसिला लंबे समय से जारी है।

बताते चलें कि सिल्ली विधानसभा क्षेत्र है और इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक सुदेश कुमार महतो हैं, जो भाजपा की सरकार में उप मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। यह बात तो समझ में आती है कि गर्मी के मौसम आते ही लोग पानी के लिए परेशान हो जाते हैं। गर्मी में पानी की किल्लत हो सकती है, लेकिन आज पानी लेने को लेकर छुआछूत जैसा मामला जब आ जाए, तब हमें यह सोचने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है कि आज भी हम इस लोकतांत्रिक व्यवस्था और इस डिजिटल युग में कहां खड़े हैं।


आज की ऐसी परिस्थितियों पर खोरठा के साहित्यकार और व्याख्याता दिनेश कुमार दिनमणी कहते हैं - भारतीय समाज में सोपानीकृत जाति-व्यवस्था और छुआछूत आज भी एक कड़वा सच है, जो आज के कथित उच्च सभ्य समाज का बदनूमा दाग़ भी है। चतुर्वर्ण व्यवस्था में भी अन्तिम पायदान के बीच भी ऊंच-नीच का विभाजन है, श्रेष्ठता-निकृष्टता का भाव है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। झारखंड भी इससे मुक्त नहीं है। गांवों में आज़ भी यह अवांछित आचरण व्यवहार देखा जा सकता है। खासकर ग्रामीण महिलाओं में अभी भी जड़ जमाए हुए है।‌ जाहिर इस भाव का आज भी जड़ बने रहने के पीछे समुचित शिक्षा और जागरूकता का अभाव है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी नेता लक्ष्मीनारायण मुंडा कहते हैं, "सिल्ली के नावाडीह गांव : यहां सभी कुएं ऊंची जातिवालों के, दलित नही भर सकते हैं पानी" 2/6/2023 को प्रभात खबर में अखबार में समाचार प्रकाशित होने के बाद मामला गरम है। कई अखबार वाले, मीडिया वाले, यूट्यूबर, राजनेता, सामाजिक संगठन के लोग, आंदोलनकारी, सोशल एक्टिविस्ट आदि लोग इस पर बयानबाजी, नुक्ताचीनी कर रहे हैं। कई लोगों ने मुझे कहा आप चुप हैं, आपके बोलने से प्रभाव पड़ेगा, आप जरुर बोलिए। फिर भी मैं चुप रहा। जिनको शौक है इस मामले में चेहरा चमका लें या फिर कुड़मी/कुर्मी/महतो जाति को ही इसमें घसीट लें। ये इस देश का सामाजिक समस्या ( ऊंच-नीच, जातिगत भेदभाव) है।

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से इस तरह की ऊंच- नीच, जातिगत भेदभाव को लेकर हजारों घटनाएं घटती रहती हैं। ये महज सिल्ली का प्रोब्लम नहीं है, हमारे समाज के अंदर हजारों सालों से ऊंच- नीच, जातिगत भेदभाव, जातीय घृणा, पिछड़े चिंतन को स्थापित किया गया है। रांची जिले के पांचपरगना क्षेत्र के अंतर्गत सिल्ली का यह गांव ही नहीं, ऐसे बहुत सारे गांव मिलेंगे। यही नहीं कुड़मी/कुर्मी/महतो जाति ही नहीं और भी जातियां ऐसे ही पेश आती हैं। इस इलाके में तो खासकर हमारे मानकी-मुंडा परिवार और मुंडा जाति के लोग भी ऐसे ही करते हैं। इसलिए इस सच्चाई को कबूल करना होगा कि यह समस्या सिल्ली और कुड़मी/कुरमी/महतो में ही नहीं, देश और समाज के अंदर है। इसके खिलाफ देशव्यापी लडाई लड़नी होगी। अन्यथा ऐसी घटनाएं रोज कहीं न कहीं घटती रहेगी। अखबार/मीडिया में आए तो मुद्दा, न आए तो ऐसे ही चलता रहेगा।


सिल्ली निवासी और भाजयुमो के झारखण्ड के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामाकांत महतो कहते हैं कि छुआछूत व जातीय भेदभाव भारतीय संविधान के खिलाफ है, ऐसी वृत्तियों पर सरकार और प्रशासन को सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे मामले जब प्रकाश में आते हैं तो सरकार को तुरंत इसे संज्ञान में लेकर स्थानीय प्रशासन को निर्देश देना चाहिए कि वह मामले की जांच कर दोषी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें। जबकि यहां तो मामला यह हो गया है कि जिस पत्रकार ने इसे सामने लाया है कुछ लोग उसके ही खिलाफ बयान दे रहे हैं, उसे धमकी दे रहे हैं, उसपर ही कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं, जो काफी खतरनाक है।

आए दिन इस तरह की बातें सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही हैं, अतः सरकार को इसे संज्ञान में लेकर और मामले की सत्यता की जांच कराकर इन तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। रामाकांत कहते हैं आज के इस 21वीं 22वीं सदी में ऐसी वृत्ति का होना काफी चिंताजनक है। वे कहते हैं आज ऐसा नहीं है कि हर घर में पढ़े लिखे लोग नहीं हैं, बावजूद ऐसी घटनाएं अनपढ़ समाज की ओर इशारा करता है।

गौरतलब है कि झारखंड में पानी के लिए परंपरागत व्यवस्थाओं में नदी, तालाब, कुंआ के अलावा दांड़ी और चुंआ की व्यवस्था रही है। दाड़ी जो खेत या तालाब के निचले हिस्से में खोदकर बनाया जाता है, ताकि ऊपरी हिस्से का पानी का तल जब सूख जाए तो यहां से पानी लिया जा सके, वहीं नदी के सूखे हुए भाग से बालू हटाकर चुंआ बनाया जाता हैं, जहां से पीने का पानी लिया जा सके।

बताते चलें कि गांव के इन लोहरा परिवारों के मुहल्ले में न तो सरकारी चापानल है, न कुंआ और न जलमीनार। अलबत्ता इन लोगों को पानी पीने के लिए गांव के बाहर तालाब के समीप एक दांड़ी है जिससे ये लोग पानी लेते हैं, लेकिन गर्मी के आते ही वह भी सूख जाता है। इस दांड़ी पर बाकी अन्य जाति के लोग पानी लेने नहीं जाते हैं, जबकि यह दांड़ी उन्हीं लोगों की जमीन पर बना है।

यही वजह है कि गर्मियों में लोहरा जनजाति की महिलाओं का पूरा दिन पानी के जुगाड़ में गुजर जाता है, क्योंकि उनसे खुद को बड़ी जाति समझने वाले लोग अपने कुंए से उन्हें खुद से पानी नहीं भरने देते हैं। उनकी मर्जी से ही उनके कुएं से इन्हें पानी मिलता है, जब ये लोग खुद से पानी निकाल कर उन्हें देते हैं।

कभी कभी स्थिति यह होती है कि लोहरा परिवार का कोई सदस्य उनके कुंए के पास जाकर उनका इन्तजार करता है कि कोई आए तो एक बाल्टी पानी नसीब हो। ऐसे में जब अन्य जाति का कोई आता है तब भी उसकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वह उन्हें पानी दे या नहीं। कभी इसके लिए उन्हें झिड़कियां भी सुननी पड़ती हैं। इनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती, यदि उनकी मर्जी पानी देने की नहीं हुई, तो उनकी खरी-खोटी सुनाकर वे पानी नहीं देते हैं ऐसे में लोहरा परिवार के लोगों को मायूस होकर वापस लौट जाना पड़ता है।


इस बाबत लोहरा परिवार के लोग गांव की मुखिया और जनप्रतिनिधियों से कई बार गुहार भी लगा चुके हैं, लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। कमला देवी कहती है - साल में कुछ माह एक ढांड़ी जो उन्हीं लोगों की जमीन पर बना है, से पानी नसीब हो जाता है। लेकिन गर्मी आते ही हमलोग अपने से ऊंची जाति के लोगों के कुए पर निर्भर हो जाते हैं। हमलोग खुद से उनके कुएं से पानी नहीं ले सकते इसलिए घंटों खड़े होकर कुएं के पास किसी के आने का इंतजार करते रहते हैं।

सीमा देवी बताती है कि गांव में उनसे बड़ी जाति के लोगों के चार अलग- अलग कुंए हैं। घंटों खड़े रहने के बाद जब कोई कुंए पर आता है, तब जाकर कहीं हमें पानी नसीब हो पाता है, उसपर भी हर रोज बुरा-भला सुनने के बाद। फिर भी हमें उनके कुंए पर पानी मांगने के लिए जाना ही पड़ता है।

पुइतू देवी कहती है - हमारी परेशानियों से न तो सरकारी अफसरों को कोई लेना-देना है और न ही मुखिया को, हमलोगों ने कई बार नेताओं और मुखिया को अपनी समस्या बतायी है, लेकिन किसी ने स्थायी समाधान नहीं निकाला है। अब तो ऊंची जाति के लोगों से मांग कर पानी पीने की आदत सी हो गयी है।

बड़ा चांगडू पंचायत की मुखिया सरिता मुंडा कहती हैं - जिस इलाके के सबंध में सवाल पैदा हो रहे हैं, वहां मौजूद सरकारी व्यवस्था की पूरी जानकारी मुझे नहीं है। हालांकि, जल्द ही नल-जल योजना के तहत सभी प्रभावित परिवारों के घरों तक पीने का पानी की व्यवस्था की जाएगी तब उन्हें सुगमता से पानी मिलने लगेगा।

इसकी जानकारी जब बीडीओ पावन आशीष लकड़ा को होता है तो वे कहते हैं कि यह काफी गंभीर विषय है। वे स्वयं जाकर स्थिति की जांच करेंगे। वैसे मैंने संबंधित पंचायत सेवक को कार्यालय बुलाकर तत्काल गांव में जाकर पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए जरूरी प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया है। अब देखना यह होगा कि इस पर पहल कब, कैसे और कहां तक होगा।

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