हर हर शंभू : फरमानी पर फतवा तो मो. रफी, शकील बदायूंनी और नौशाद पर फख्र क्यों?

सोशल मीडिया पर इन दिनों फरमानी नाज को भजन गाने की वजह से कुछ लोग ट्रोल कर रहे हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या एक गरीब सिंगर जो अपने शौक या जरूरत के लिए वीडियोज बनाकर पोस्ट करती है सिर्फ उसी पर उलेमाओं का फतवा जारी होगा या उन लोगों को भी कहा जाएगा जिनकी जिंदगी इस तरह के कामों से भरी पड़ी है.

Update: 2022-08-02 02:30 GMT

file photo

Har Har Shambhu: गायक मोहम्मद रफी, संगीतकार नौशाद और गीतकार शकील बदायूंनी पर ज्यादातर मुसलमान फख्र ही करते हैं और हो भी क्यों ना? क्योंकि तीनों हस्तियों ने बॉलीवुड को अपने जमाने में वो अनमोल चीजें दी हैं जो हमेशा कायम रहेंगी. भले ही आज के जमाने में कुछ अजीब-अजीब तरह के गाने हम लोगों को सुनने के लिए मिलते हैं लेकिन कभी भी पुराने जमाने के गानों की बराबरी नहीं कर पाते. नए गाने आंधी की तरह आ रहे हैं और तूफान की तरह जा भी रहे हैं. उनकी उम्र बहुत ही कम है. यही कारण है कि ना सिर्फ मुसलमान बल्कि हर हिंदुस्तानी इन हस्तियों पर नाज करती है.

इन लोगों पर फख्र क्यों?

मोहम्मद रफी, नौशाद और शकील बदायूंनी ने ना सिर्फ गानों के लिए काम किया बल्कि कई अनमोल धार्मिक गीत भी दिए. शकील के ज़रिए लिखे गए, रफी के ज़रिए गाए गए और नौशाद के म्यूजिक से सजे हुए भजन आज भी हिंदुस्तान की असली तस्वीर को पेश करते हैं. इन तीनों हस्तियों ने कई ऐसे भजन दिए हैं जो आज भी लोगों की फेवरेट लिस्ट में शामिल हैं. तीनों ही हस्तियां मुस्लिम होने के बावजूद इन पर किसी ने फतवा जारी नहीं लेकिन आज जब एक छोटे गांव की किसी बेटी ने भजन गा दिया तो उस पर उलेमाओं की नाराज़गी सामने आ गई. देवबंदी मसलक से जुड़े एक मौलाना ने कहा है कि भजन या नाच गाना इस्लाम में पूरी तरह मना है. यह शरीयत के खिलाफ है.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल कांवड़ यात्रा के दौरान एक भजन बहुत तेज़ी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है. भजन का नाम है "हर हर शंभू". कुछ लोगों को तो यह इतना पसंद आ रहा है कि लोगों ने इसको अपने मोबाइल की रिंगटोन तक सेट कर लिया. इसी बाच इंडियन आइडियल फेम, मुजफ्फरनगर की रहने वाली गायिका फरमानी नाज ने भी यह भजन गाया. फरमानी नाज का यह भजन का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल होने लगा. धीरे-धीरे ये मोलानाओं के पास भी पहुंचा. जिसके बाद उन्होंने लड़की के मुस्लिम होने की वजह से इसका विरोध करना शुरू कर दिया. जब हिंदुस्तान में पहले ही धर्म के नाम पर लड़ मर रहे हों, तो उनको इस तरह के बयान देने चाहिए.

अगर विरोध करना ही है तो पहले उन लोगों का किया जाना चाहिए जिनकी पूरी जिंदगी इसी तरह के कामों से भरी पड़ी हुई है. उदाहरण के तौर पर हम आपके लिए साल 1960 में रिलीज हुई फिल्म कोहिनूर के एक भजन की बात करते हैं. जिसने अपने वक्त में बहुत शोहरत हासिल की थी और अभी भी लोग इस भजन को खूब पसंद करते हैं. 'कोहिनूर' फिल्म दिग्गज एक्टर दिलीप कुमार पर फिल्माया गया भजन "मधुबन में राधिका नाचे रे" की क्रिएशन में सभी मुस्लिम फनकारों का हाथ था.

"मधुबन में राधिका नाचे रे"

"मधुबन में राधिका नाचे रे" भजन को लिखने वाले शायर का नाम शकील बदायूंनी, गाने वाले सिंगर का नाम मोहम्मद रफी, म्यूजिक से सजाने वाले संगीतकार का नाम नौशाद और जिस एक्टर पर फिल्माया गया उसका असली नाम मुहम्मद यूसुफ़ ख़ान यानी दिलीप कुमार है. ऐसे में सवाल यह है कि इन लोगों के नाम पर विवाद क्यों नहीं? एक छोटे से गांव में सोशल मीडिया पर अपने शौक के चलते वीडियो बनाकर डालने वाली गरीब फरमानी नाज पर फतवे क्यों?

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