मोदी के बनारस को क्योटो बनाने वाले सफाईकर्मियों के पास नहीं सिर छुपाने की भी जगह, नरक से भी बदतर हालात

सूरज के घर में उनकी बीमार मां एक तख्त पर बैठी हुई थीं और एक किनारे जमीन के फर्श पर इनकी रसोई थी, जहां पर इस परिवार का खाना बनता....

Update: 2022-11-19 08:44 GMT

देवेश पाण्डेय की रिपोर्ट

मोदी के क्योटो यानी बनारस को स्मार्टसिटी के तमाम दावों और वादों के बीच शासन प्रशासन उन लोगों के हालातों की तरफ ध्यान देना भूल जाता है, जिनके कंधों पर इसे स्मार्ट बनाये रखने की जिम्मेदारी है। हम बात कर रहे हैं किसी भी शहर को साफ सुथरा रखने वाले सफाईकर्मियों की, जो खुद गंदगी में रहकर स्वच्छता के अग्रदूत बने हुए हैं। मगर इन स्वच्छता के अग्रदूतों की ​जिंदगी इतनी नारकीय है कि न इनके पास सिर छुपाने के लिए घर है और न ही खाने के लिए दो वक्त की रोटी का ठीक से जुगाड़।

मोदी के बनारस को क्योटो बनाने की मुहिम में लगे सफाईकर्मी नगर निगम के अधीन आते हैं, शहर को चमकाने और साफ सुथरा रखने के लिए ये भोर में 7 बजे से ही अपने काम पर मुस्तैद हो जाते हैं, मगर काम के बदले इन्हें मूलभूत सुविधायें भी नहीं मिल पाती हैं। बनारस में नगर निगम के अधीन 3800 से ज्यादा सफाईकर्मी कार्यरत हैं, और ज्यादातर के पास न तो अपना घर है और न ही पीने के लिए साफ पानी की व्यवस्था। खुद का आवास न होने के कारण ये सफाईकर्मी शहर के अंदर किसी भी सरकारी जमीन या पट्टे की जमीन पर झुग्गी झोपड़ी बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इन्ही झुग्गी-झोपडिय़ो के अंदर इनकी कई पीढ़ियां खप जाती हैं। तमाम वादों के बावजूद बनारस नगर निगम इनके जीवन स्तर में सुधार के लिए कोई भी पहलकदमी नहीं ले रहा।

झुग्गी में है इनकी रसोई और यहीं है इनका आशियाना

जनज्वार टीम बनारस के कज्जाकपुरा में सफाईकर्मियों के इलाके में इनकी हकीकत से रू-ब-रू होने पहुंची। इस इलाके में चारों तरफ से नाले और विशालकाय पानी की टंकी के नीचे इनकी झोपडिय़ा बसी हुई हैं। झोपड़ी बनाकर रहने वाले सफाईकर्मी सूरज कहते हैं, रात दिन एक करके शहर के नालों की साफ सफाई करते हैं और खुद भी इनकी जिंदगी नाली से बेहतर नहीं है।

सूरज कहते हैं उनको मकान देने के लिए नगर निगम की तरफ से आवास का फार्म करीब 5 साल पहले भरवाया गया था, मगर इतने साल बीत जाने के बाद भी आज तक इन लोगों को मकान नहीं मिल पाया। हजारों सफाईकर्मी झुग्गी बनाकर अपना जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं। सूरज के घर में उनकी बीमार मां एक तख्त पर बैठी हुई थीं और एक किनारे जमीन के फर्श पर इनकी रसोई थी, जहां पर इस परिवार का खाना बनता है।

भरत के परिवार की 3 पीढ़ियां रह रहीं गंदगी में

सफाईकर्मियों के इलाके में पड़ताल करने पर हमारी मुलाकात सूरज कन्नौजिया से हुई। सूरज नगर निगम द्वारा बनाये गये हास्पिटल में कपड़ा धोने का काम करते हैं। सूरज अपनी झोपड़ी दिखाते हुए कहते हैं, वह यहां 3 पीढ़ियों यानी दादा परदादा के जमाने से रह रहे हैं। सूरज मरीजों के कपड़े धोने का काम करते थे। कोरोना काल में नगर निगम द्वारा हास्पिटल बंद कर दिया गया था, जिसके बाद सूरज के साथ साथ कई अन्य लोगों को भी अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। आज धोबी का काम करने वाले सूरज का परिवार भुखमरी के साथ भंयकर संकट का सामना कर रहा है और नगर निगम के अधिकारियों की तरफ से कोई भी कारवाई नहीं की जा रही है।

झोपड़ी पर भी नहीं है भरोसा

झोपड़ बस्ती में कुछ और लोगों से बातचीत करने के दौरान एक दूसरे सफाई कर्मचारी उमेश मिले। उमेश कहते हैं हमारे पास न घर है न दुआर है। उमेश नगर निगम के नियमित सफाई कर्मचारी हैं और पूरे शहर को जी जान लगाकर साफ सुथरा रखते हैं, मगर उनके परिवार के पास भी रहने के लिए मकान नहीं हैं। किसी तरीके से झोपड़ी में अपने परिवार और बाल—बच्चों, नाती-पोतों के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।

उमेश की बातों में पीड़ा और सिस्टम के प्रति आक्रोश नजर आता है। उमेश कहते हैं, हमारी इन झोपड़ियों का भी कोई भरोसा नहीं है। कभी भी बुल्डोजर लेकर आ सकते हैं और हमारे मकान को गिरा सकते हैं, हमें यहां से भगा सकते हैं। आखिर हम लोग जायें तो कहां जायें, प्रशासन की ये बेरुखी हम लोगों को नागवार लगती है।

सफाईकर्मियो के अंदर बच्चों के भविष्य को लेकर है भय

कज्जाकपुरा की झोपड़ पट्टी में नगर निगम के ही संविदा सफाई कर्मचारी सूरज मिले। झोपड़ी में रहने के अलावा इनकी एक बड़ी चिंता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर भी है। सूरज कहते हैं, नगर निगम में काम करने वाले कर्मचारियों की मौत के बाद उनके बच्चों को नौकरी नही दी जा रही है। अब सारी भर्तियां आउटसोर्स के माध्यम से की जा रही हैं। जब तक हमारे शरीर में जान है, तब तक तो हम मेहनत करके अपना पेट भर रहे हैं आगे का कोई भरोसा नहीं है। इन हालातों में हमारे बच्चो का भविष्य कैसा होगा, इसे लेकर हम बहुत चिंचित हैं। इन हालातों में तो लगता है कि बच्चे रोजी-रोटी की भयंकर समस्या झेलेंगे।

सफाईकर्मियो के हर मसले पर प्रशासन के समक्ष आवाज बुंलद करने वाले पूर्वांचल मूवमेंट नामक संस्था से जुड़े राजेश आजाद कहते हैं, नगर निगम प्रशासन द्वारा हर वक्त सफाईकर्मियों का शोषण किया जा रहा है। मोदी के बनारस के कई इलाको में रहने वाले सफाईकर्मियों के हालात काफी खराब हैं। प्रशासन की तरफ से उनके लिए किसी तरह का कोई काम नहीं किया जा रहा। राजेश सफाईकर्मियों के मुद्दों के लिए कई बार आंदोलन कर चुके हैं, मगर सफाईकर्मियों की मौत के बाद उनके परिवार को नौकरी तो छोड़िये किसी और तरह की भी मदद नहीं दी जाती है।

शहर के सफाईकर्मियो की मौत के आंकड़े के बारे में जब नगर निगम के अधिकारियों से बातचीत की गई तो उन्होंने स्पष्ट जानकारी देने से मना कर दिया। बाद में जब नगर निगम के पीआरओ संदीप श्रीवास्तव से बात हुई तो उन्होंने बताया कि सालभर के अंदर बनारस के भीतर तीन सफाईकर्मियों की मौत हुई है।

नोट-ठेकेदारी प्रथा के सफाईकर्मचारी को जरूरत के अनुसार के ठेकेदार के माध्यम से हायर किया जाता है। इसी के साथ जितने दिन काम करते हैं। उसी हिसाब से उनको भुगतान किया जाता है।

संदीप श्रीवास्तव से जब सफाईकर्मियों के आवास के मसले पर बातचीत की गई तो बताया कि नगर निगम द्वारा या शासन द्वारा सफाईकर्मियों को आवास देने का कोई भी प्रावधान नही है। सफाईकर्मियों को जो भी आवास अलॉट किये जाते हैं, वह प्रधानमंत्री आवास योजना डूडा के तहत मिलते हैं। सफाईकर्मियों के स्वास्थ्य के मसले पर संदीप श्रीवास्तव बताते हैं, ये लोग यानी सफाईकर्मी अगर पात्र होंगे तो उन्हें भी आयुष्मान कार्ड योजना के तहत लाभ मिलेगा अन्यथा नहीं। मगर नगर निगम की तरफ से सफाईकर्मियों को स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए कोई भी विशेष प्रावधान नहीं किया है।

दूसरी तरफ सीएमओ वाराणसी संदीप चौधरी क​हते हैं, उनकी तरफ से बनारस के हर रहवासी को चिकित्सकीय सुविधाएं देने का निरंतर प्रयास किया जाता रहता है, फिर वह चाहे कोई भी हो। इसके साथ ही आयुष्मान कार्ड धारक को भी लाभ दिया जाता है, चाहे वह किसी संस्था का कर्मचारी हो या फिर कोई और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

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