Latehar news : झारखंड का एक गांव जहां शौचालय नहीं, लेकिन गांव 'खुले में शौच से मुक्त' घोषित
Latehar news : नेतरहाट पंचायत से मात्र तीन किमी दूर लगभग 200 की जनसंख्या वाला ताहेर गांव के घरों की कुल संख्या 30 है। जहां आदिम जनजातियों में 17 घर बिरजिया और 13 घर नागेसिया जनजातियों का है...
विशद कुमार की रिपोर्ट
Latehar। झारखंड के लातेहार जिले (Latehar) का महुआडांड़ प्रखंड का पंचायत है नेतरहाट, जो प्रखंड मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर है। सर्वविदित है कि नेतरहाट राज्य में पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है। यहां पूरे साल हजारों की संख्या में पर्यटक घूमने आते हैं। बावजूद नेतरहाट पंचायत के अंतर्गत आने वाले कई गांवों के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इसी पंचायत का एक गांव है ताहेर, नेतरहाट से ताहेर गांव तीन किलोमीटर दूर है, बावजूद इसे नेतरहाट का टापू कहा जाता है।
शौचालय नहीं बावजूद ओडीएफ घोषित है
ताहेर गांव पूरी तरह मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। बावजूद क्षेत्र के प्रशासनिक हलका इतना भ्रष्ट है कि इस गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे ओडीएफ (ओपेन डेफिकेसन फ्री यानी खुले में शौच मुक्त) घोषित कर दिया गया है। ऐसे में आलम यह है कि पुरूषों या सामान्य महिलाओं को कोई विशेष परेशानी तो नहीं होती है, क्योंकि उन्हें शौच के लिए खेतों या जंगल में जाना उनकी आदत में शुमार है। लेकिन वर्तमान दौर में गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों के लिए दूर जाना काफी कष्टकारी हो जाता है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि गांव या आसपास के किसी गांव में स्वास्थ्य केन्द्र (Hospital) नहीं है, जिसकी वजह से खासकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए काफी सोचना पड़ता है। अत: सामान्त: उनका प्रसव पारंपरिक तौर पर गांव की कोई बुजूर्ग महिला करवाती है, जिसमें कभी-कभी बच्चा व जच्चा के लिए काफी खतरनाक स्थिति बन जाती है। कभी-कभी तो दोनों की जान भी चली जाती है। ऐसे में कई महिलाएं सुरक्षित प्रसव के लिए मायके या किसी रिश्तेदार के पास चली जाती हैं, जहां अस्पताल और शौच की सुविधा रहती है।
नेतरहाट पंचायत (Netarhat Panchayat) से मात्र तीन किमी दूर लगभग 200 की जनसंख्या वाला ताहेर गांव (Taher Village) के घरों की कुल संख्या 30 है। जहां आदिम जनजातियों में 17 घर बिरजिया और 13 घर नागेसिया जनजातियों का है। ताहेर गांव दो टोली में बसा है। वैसे तो नेतरहाट से गांव पहुंचने के लिए तीन किलोमीटर की सड़क है। लेकिन वह काफी जर्जर है। गांव में पीने का शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है, बिरजिया आदिम जनजातियों की गर्भवती महिलाओं का प्रसव ज्यादातर गांव में ही होता है। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है न ही विद्यालय है। बच्चों को पड़ने वाली बीसीजी और डीबीसी टीका भी समय पर नहीं लगता है।
रोजगार के अभाव में गांव के लगभग सभी नौजवान दूसरे राज्यों में पलायन को मजबूर हैं। बता दें कि ताहेर गांव में एक भी चापाकल नहीं है। जिसके कारण ग्रामीण गांव से सटे कुछ दूर जंगल में स्थित चुआं या चुआंड़ी का पानी पीने को विवश हैं। वहीं कुछ लोग पहाड़ी नाला की रेत को हटाकर गढ्ढा करके चुआं बनाकर पानी पीते हैं। हालांकि गांव में एक कुआं था। गांव में पेयजल की समस्या दूर करने के लिए उस कुआं में 2019 14वीं वित्तीय योजना के तहत सोलर सिस्टम से चलने वाली पानी की टंकी लगायी गयी थी। मगर 2020 से कुआं धंसने के कारण पानी की टंकी बेकार पड़ी हुई है। बता दें कि गांव के आदिवासी परिवार चुआं और नाले का इस्तेमाल पानी पीने के साथ-साथ मवेशी को नहलाने एवं कपड़ा धोने के रूप में भी करते हैं।
ग्रामीण वीरेन्द्र बिरजिया बताते हैं कि गांव में पीने का पानी की भारी समस्या है, हमलोग चुआं और नाले से पानी पीते हैं। मवेशी भी इसी से पानी पीते हैं। गांव में पुराना कुआं था, वह एक साल पहले धंस गया। जनप्रतिनिधि भी ध्यान नहीं देते हैं। गांव तक पहुंचने वाली सड़क भी काफी जर्जर है। जनप्रतिनिधियों के सामने कई बार गुहार लगा चुके हैं। लेकिन सुनवाई नहीं, चुनावों के समय तो बड़े-बडे दावे व वादे किए जाते हैं। किंतु चुनाव जीतने बाद जनप्रतिनिधि फोन तक नहीं उठाते हैं।
गांव की सुचिता नगेसिया कहती हैं, ताहेर गांव में एक भी शौचालय नहीं बनाया गया है। लेकिन इसे ओडीएफ घोषित कर दिया गया है। पुरूषों या सामान्य महिलाओं को कोई विशेष परेशानी इसलिए नहीं महसूस होती है कि शौच के लिए खेतों या जंगल में जाना उनकी आदत में शुमार है। लेकिन वर्तमान दौर में गर्भवती महिलाओं व बीमार लोगों के लिए दूर जाना काफी कष्टकारी हो जाता है। सुचिता कहती हैं कि गांव या आसपास के किसी गांव में स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है, जिसकी वजह से गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए काफी सोचना पड़ता है।
अत: सामान्त: उनका प्रसव पारंपरिक तौर पर गांव की कोई बुजुर्ग महिला करवाती है, जिसमें कभी-कभी बच्चा व जच्चा के लिए काफी खतरनाक स्थिति बन जाती है। कभी दोनों की जान भी चली जाती है। ऐसे में कई महिलाएं सुरक्षित प्रसव के लिए मायके या किसी रिश्तेदार के पास चली जाती हैं, जहां अस्पताल की सुविधा रहती है। सुचिता बताती हैं कि वैसे तो महिलाओं को सशक्त करने के लिए गांव में दो महिला समूह 'सरई फूल' व 'सहेली समूह' बनाया गया है, जिसमें एक में 10 एवं दूसरे मे 12 महिला सदस्य हैं, लेकिन यह सिर्फ नाम का है। आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। संस्था जेएसपीएल के सीसी इस समूह की तरफ कभी ध्यान नहीं देता है।
वार्ड सदस्य शांति देवी कहती हैं कि गांव में कोई रोजगार का साधन नहीं है, मनरेगा के तहत भी कोई योजना नहीं चलती है। कौन रोजगार सेवक है? इसकी भी जानकारी ग्रामीणों को नही है। गांव तक कोई अधिकारी नहीं आता है। क्षेत्र की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि खेती भी नहीं के बराबर होती है। क्योंकि सिंचाई का कोई साधन नही है।
लगभग 25 से अधिक युवक इस वर्ष गांव छोड़कर केरल, दिल्ली या अन्य राज्यों में कमाने चले गये हैं। दूसरी तरफ सरकारी राशन लेने के लिए ग्रामीणों को तीन किलोमीटर पैदल चलकर नेतरहाट जाना पड़ता है। इन तमाम समस्याओं पर नेतरहाट की मुखिया मानती देवी से पूछे जाने पर वे कुछ भी कहने से इनकार करती हैं।