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विशेष रिपोर्ट : महिला वकील बोली, लॉकडाउन में मुश्किल ऐसी कि भूल गये दाल-चावल के साथ सब्जी खाना

Janjwar Desk
27 May 2021 4:32 PM GMT
विशेष रिपोर्ट : महिला वकील बोली, लॉकडाउन में मुश्किल ऐसी कि भूल गये दाल-चावल के साथ सब्जी खाना
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पहले लॉकडाउन में ही वकालत पेशे की टूट चुकी है कमर, अब फिर से लॉकडाउन के बाद और बढ़ेगी बदहाली

गया कोर्ट परिसर में दुःख-दर्द की अनगिनत कहानियां लगभग हर वकील, मुंशी और दुकानदार के भीतर मौजूद हैं, ये कहानियां वो अपनी ख़ामोशी या मुस्कुराहट में छुपाये रहते हैं, मगर बातचीत में ये दर्द उनकी आँखों में छलक भी आता है...

गया से सलमान अरशद की स्पेशल रिपोर्ट

जनज्वार। 'कोरोना के कारण अचानक लागू किये गए लॉकडाउन से वैसे तो पूरा देश बुरी तरह प्रभावित हुआ है, लेकिन वकालत पेशे से जुड़े लोग जिनकी रोज की कमाई से रोटी चलती है, उनका सबसे बुरा हाल है।'

अब एक बार फिर से सारे राज्यों में कोरोना की बढ़ती भयावहता और बड़े पैमाने पर हुई मौतों के बाद लॉकडाउन लग चुका है। यह बात अप्रैल की शुरुआत में जबकि देश की हालत कुछ बेहतर थी, कोरोना केस नगण्य थे, तब गया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिक्वक्ता ओम प्रकाश ने कही थी। अब तो वकालत पेशे से जुड़े लोगों के हालात और भी ज्यादा बुरे हो चुके हैं। न सिर्फ छोटे वकीलों, मुंशियों बल्कि जिनका धंधा ठीकठाक चलता था, उनके सामने भी बड़ा संकट है।

मुंशी गोपाल प्रसाद ने बीमार पत्नी के इलाज के लिए 4 प्रतिशत मासिक ब्याज पर उधार लिया था, कहते हैं, 'जैसे इस वक्त कचहरी में काम चल रहा है, अगर यही हाल रहा तो उन्हें ये क़र्ज़ चुकाने में 5 साल लग जायेंगे।' अब जबकि एक बार फिर से लॉकडाउन लग चुका है, हालात और बुरे हो चुके हैं, मुंशी प्रसाद जैसे लोगों के हाल जाहिर तौर पर और बदतर होंगे।

दुःख और दर्द की ऐसी ही अनगिनत कहानियां लगभग हर वकील, मुंशी और दुकानदार के भीतर मौजूद हैं, जो कोर्ट परिसर से रोटी कमाते हैं, लेकिन ये कहानियां वो अपनी ख़ामोशी या मुस्कुराहट में छुपाये रहते हैं, हाँ, बातचीत में कभी कभी ये दर्द उनकी आँखों में छलक भी जाता है।

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गया बिहार का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। गया एक प्राचीन शहर भी है, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों समेत तमाम पौराणिक कथाओं में मिलता है। गया अनेक राजाओं के उदय और अस्त का साक्षी रहा है तो राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक बदलावों का केंद्र भी। गया की पहचान बौद्ध धर्म के एक केंद्र के रूप में भी है, जो इस रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखता है। यहां बोधगया क्षेत्र में बोधि-वृक्ष और महावोधि मंदिर भी है। इसके अलावा बोधगया में कोरिया, चीन और जापान के स्थापत्य कला के अनुरूप बने मंदिर भी इस स्थान की सुन्दरता को बढाते हैं।

पिछली बार लॉकडाउन खुलने के बाद वकालत पेशे से जुड़े लोगों में बंधने लगी थी उम्मीद, गया कोर्ट परिसर में भी बढ़ती भीड़ दे रही थी इसकी गवाही

2011 की जनगणना के अनुसार गया की कुल जनसंख्या 4,391,418 है। जिला स्तर पर वकीलों के दो संघ हैं और दोनों को मिलाकर रजिस्टर्ड वकीलों की संख्या लगभग 3,500 है। इनमें महिलाओं की संख्या लगभग 150 है, लेकिन ओबीसी और SC, ST की संख्या के बारे में पता नहीं चल पाया।

यूनियन के सचिव बताते हैं, 'संघ में जातिवार डाटा नहीं रखा जाता', लेकिन एक वकील ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि गया में पिछड़े और दलित वर्ग के वकीलों की संख्या लगभग 400 है। हालांकि जनज्वार को दूसरा कोई ऐसा वकील नहीं मिला जो इसकी पुष्टि करता। महिलाओं की संख्या भले ही 150 हो, लेकिन रेगुलर प्रैक्टिस में लगभग 30 महिलाएं ही हैं। अधिवक्ताओं की संख्या के बारे में दिया गया विवरण अधिवक्ताओं से ही बातचीत पर आधारित है। इसी प्रकार अधिवक्ता लिपिकों की संख्या लगभग 1500 है जिनमे आधे ही अभी कचहरी में आ रहे हैं।

अप्रैल के पहले सप्ताह में कोर्ट परिसर में पूरी गहमा-गहमी दिखाई दे रही थी, लोग एक दूसरे से धक्का मुक्की करते हुए आ जा रहे थे, इस भीड़-भाड़ में दो गज की दूरी किसी भी प्रकार संभव नहीं है। मास्क महज़ एक औपचारिकता भर रह गयी है, कुछ लोगों के गले में तो कुछ गिनती के लोगों के चेहरे पर मास्क नज़र आ जाता है।

अधिवक्ता राजेश कुमार कहते हैं कि कचहरी के माहौल को देखते हुए न तो मास्क लगाना संभव और न ही अब इसकी कोई उपयोगिता है। वो ये भी कहते हैं कि जब राजनीतिक रैलियों और राजनीतिक आन्दोलनों में मास्क का उपयोग नहीं किया जा रहा है और इसके कारण किसी भी तरह की कोई परेशानी भी दिखाई नहीं दे रही है तो फिर आम जनता को ही मास्क लगाने के लिए परेशान क्यों किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने अपना वक्तव्य रिकॉर्ड नहीं करने दिया।

अधिवक्ता ललित कुमार गुप्ता भी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, लॉकडाउन सिर्फ़ आम जनता के लिए है, जबकि इसी कोरोना कॉल में रैलियां हो रही हैं, सभाएं हो रही हैं और चुनाव भी हो रहा है। सीनियर वकील ललिता सिंह भी अपना आक्रोश इसी रूप में व्यक्त करती हैं।

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यानी गया कोर्ट परिसर में कोरोना प्रोटोकाल पर न तो कोई अमल करता हुआ दिखाई दे रहा है और न ही माहौल को देखते हुए ये संभव है। वकील हों या उनके मुंशी या फिर दुकानदार सभी चाहते हैं कि लॉकडाउन को पूरी तरह से ख़त्म किया जाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया का समुचित संपादन हो सके और जो लोग इस प्रक्रिया से ही रोज़ी-रोटी पाते हैं वो भी अपना काम नियमित रूप से कर पायें।

अधिवक्ता लिपिकों की दुर्दशा

वैसे तो लॉकडाउन ने कम या ज़्यादा सभी को प्रभावित किया है, लेकिन वकीलों के नीचे काम करने वाले मुंशियों या अधिवक्ता लिपिकों को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया। लिपिकों की आमदनी मुवक्किलों की आमद पर ही निर्भर है, वकीलों के निर्देशन में मुंशियों को मुवक्किलों के कुछ काम करने काअवसर मिलता है और इसके बदले में कुछ पैसे। किसी भी काम का कोई रेट फिक्स नहीं है, बस वकील और मुवक्किल के साथ डील पर ये आमदनी निर्भर है।

लॉकडाउन खुलने के बाद हालांकि सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क लगाने के नियमों का गया कोर्ट परिसर में बिल्कुल नहीं रखा गया था ख्याल

लॉकडाउन में कचहरी में बहुत कम काम हुआ और आमतौर पर मुवक्किलों का आना-जाना पूरी तरह बंद रहा, ऐसे में मुंशियों की आमदनी एकदम बंद हो गयी। मुंशियों की आमदनी आम दिनों में भी इतनी ज़्यादा नहीं होती थी कि ये लोग कुछ बचत कर पायें और मुश्किल वक्त में बचत का सदुपयोग कर पायें।इनका जीवन रोज़ रोज़ की ही कमाई पर पूरी तरह निर्भर है।

अधिवक्ता लिपिक अखिलेश कुमार शर्मा कहते हैं, 'लॉकडाउन उन पर बहुत बुरा गुज़रा है, सरकार या किसी संस्था की ओर से लिपिकों को कोई सहायता नहीं मिली, लेकिन गया बार एसोसिएशन ने जरूर खाने पीने के सामान देकर इनकी सहायता की है।

लिपिकों के साथ बात करने में जो सबसे बड़ी दिक्कत सामने आयी वो यह कि वे लोग खुलकर खासतौर पर कैमरे के सामने बोलने को तैयार नहीं थे। ऑफ कैमरा एक अधिवक्ता लिपिक अखिलेश कुमार शर्मा बताते हैं, 'यहां का लगभग हर अधिवक्ता लिपिक भारी कर्जे में डूबा हुआ है और ये कर्जा भी महाजन या किसी जान-पहचान वाले से ब्याज पर लिया गया है, लेकिन आत्मसम्मान बचा रहे इसलिए कोई इस पर बोलने को तैयार नहीं है।'

गोपाल प्रासाद जो 1983 से अधिवक्ता लिपिक का काम कर रहे हैं, ने स्वीकार किया कि लॉकडाउन के दौरान आर्थिक संकट का मुकाबला करने के लिए उन्होंने ब्याज पर क़र्ज़ लिया है, ब्याज भी 4 प्रतिशत मसिक है। किसी भी प्राइवेट बैंक के मुकाबले ये क़र्ज़ बेहद महंगा है, लेकिन लिपिकों की एक बड़ी संख्या ने ऐसे ही क़र्ज़ लेकर लॉकडाउन से उपजे संकट का मुकाबला किया है। गोपाल प्रसाद को बीमार पत्नी के इलाज के लिए इतने ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ा।

अधिवक्ता लिपिक कहते हैं, 'लॉकडाउन से प्रभावित मजदूरों और किसानों को सरकार की ओर से मामूली ही सही लेकिन सहायता मिली, पर हम लोगों को कहीं से कोई सहायता नही मिली।

अधिक्वक्ता लिपिक अखिलेश कुमार शर्मा कहते हैं, 'राशन की दुकान से सरकारी रेट पर हमें थोड़ा राशन जरूर मिला, इसके अलावा और कोई सहायता नहीं मिली। गया बार एसोसिएशन ने जरूर अपने मुंशियों को राशन से मदद पहुँचाने की कोशिश की है, बकौल अखिलेश कुमार इससे उन्हें थोड़ी तो राहत मिली है।


लिपिकों से बात करते हुए यह बात महसूस हुई थी कि वो इस बात से डरे हुए हैं कि कहीं फिर से लॉकडाउन न लग जाये, अगर ऐसा होता है तो मुंशी का काम करने वाले लोगों का जिंदा रहना मुश्किल हो जायेगा। और देखिये बढ़ते कोरोना केसों के बाद यह आशंका सच ही साबित हुयी।

कोर्ट परिसर के दुकानदारों की स्थिति

कोर्ट परिसर में सभी दुकानों पर ग्राहकों की मौजूदगी अब दिखाई दे रही है। लॉकडाउन के बाद क्या अब दुकानदारों की आमदनी ठीक हो रही है? के ज़वाब में मुकेश कुमार कहते हैं, पहले की अपेक्षा आमदनी अभी आधे से भी कम ही है, लेकिन मुकेश कुमार दुबारा लॉकडाउन लगने की संभावना से डरे हुए हैं। कोर्ट परिसर में पप्पू कुमार तीन पीढ़ियों से चाय की दुकान चलाते हैं, फिर भी लॉकडाउन से उपजे संकट से निबटने के लिए उन्हें क़र्ज़ लेना पड़ा, कुछ क़र्ज़ दोस्तों से लिया तो कुछ ब्याज पर भी लिया है। इसके बावजूद भी उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए बैटरी रिक्शा चलाना पड़ा।

पप्पू कुमार कहते हैं कि अगर फिर से लॉकडाउन लगा तो बहुत से लोगों को आत्महत्या करनी पड़ेगी। लक्ष्मण प्रसाद अग्रवाल कोर्ट परिसर में स्टेशनरी की दुकान चलाते हैं, उन्होंने बताया कि लॉकडाउन के संकट से उबरने में उनकी बचत और मोहल्ले वालों का सहयोग काम आया, किराना वाले ने उन्हें उधार सामान दिया तो मोहल्ले के लोगों ने भी मदद की, लेकिन दुबारा लॉकडाउन लगने की संभावना से लक्षमण प्रसाद भी डरे हुए हैं क्योंकि अब उनके पास इतनी बचत नहीं है कि लॉकडाउन से उपजे संकट का मुकाबला कर सकें।

लॉकडाउन के दौरान कोर्ट परिसर में दुकान लगाने वालों का हुआ बुरा हाल, भारी कर्ज में डूबने के अलावा कई धंधों में आजमाना पड़ा था हाथ

क्या इतनी आमदनी हो रही है कि बच्चों के लिए फल और सब्जी लेकर जा सकें, इस सवाल के ज़वाब में लक्षमण प्रसाद मुस्कुरा कर कहते हैं, "नहीं, मुश्किल से सब्जी खरीद पाते हैं।' स्टेशनरी की दुकानों पर भीड़ देखकर लगा शायद दुकानदारों के अच्छे दिन लौट आयें हैं, लेकिन लक्ष्मण प्रसाद अग्रवाल कहते हैं, ये भीड़ दरअसल आर्मी में भर्ती प्रक्रिया से सम्बंधित लोगों की है, आम ग्राहक तो मुवक्किल ही होता है, जिसकी आमद अभी बहुत कम है। इस हकीकत को हमने चाय की दुकानों पर देखा, जहाँ सन्नाटा था।

चाय की एक दुकान पर अजय कुमार से मुलाकात हुई, जो पहले मुंबई में नौकरी करते थे, लॉकडाउन में परेशानी बढ़ी तो घर आ गये। लॉकडाउन के दौरान आर्थिक संकट बढ़ा तो जान पहचान के लोगों से ब्याज पर उधार लिया, ये उधार कैसे चुकता होगा, इस प्रश्न के ज़वाब में कहते हैं, फसल से जो नगदी हासिल होगी उसी से क़र्ज़ चुकायेंगे। अजय कुमार स्नातक हैं, पढाई के बाद कुछ दिनों तक सरकारी नौकरी के लिए कोशिश की, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कामधंधे के लिए मुंबई चले गये। ये इस देश के लाखों नौजवानों की कहानी है।

वकीलों की आमदनी पर असर

वकीलों से बातचीत में ये लगातार महसूस किया गया कि वो अपनी आमदनी को लेकर खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं थे, हालांकि ये बात कई अधिवक्ताओं ने कही कि लॉकडाउन ने सबसे ज़्यादा बर्बाद वकीलों को ही किया है।

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता ओम प्रकाश और महासचिव मुरारी कुमार हिमांशु कहते हैं, अधिवक्ता और अधिवक्ता लिपिक को इस लॉकडाउन ने पूरी तरह तोड़ दिया है। अधिवक्ता डॉ. ब्रिजेश चन्द्र मिश्र अपना आक्रोश जाहिर करते हुए लॉकडाउन को गैरज़रूरी मानते हैं और कहते हैं, 'लॉकडाउन ने वकीलों को जनता से दूर कर दिया है और उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।'

अधिवक्ता हसीबुल हसन और ललित कुमार गुप्ता भी लगभग ऐसी ही राय रखते हैं। अधिवक्ता ब्रिजेश चन्द्र मिश्र मोदी जी के पकौड़ा बेचने के सुझाव पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहते हैं, 'एक इन्सान को अपनी योग्यता और शिक्षा के अनुरूप काम मिलना चाहिए, सब अगर पकौड़ा ही बेचने लगें तो खरीदेगा कौन।'

अनौपचारिक बातचीत में कई अधिवक्ताओं ने बताया, वकीलों की एक बड़ी संख्या ने लॉकडाउन के कारण सब्ज़ी या मास्क बेचने का काम किया या कुछ दूसरे काम भी किये, लेकिन बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता ओम प्रकाश इस बात से इंकार करते हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि गया बार एसोसिएशन की ओर से आर्थिक रूप से कमज़ोर वकीलों की सहायता की गयी है, महासचिव मुरारी कुमार हिमांशु भी ऐसी ही राय व्यक्त करते हैं।

मुरारी कुमार हिमांशु बताते हैं, 'संघ में लगभग 800 ऐसे वकील हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर है। हालांकि लॉकडाउन में कई संपन्न वकीलों की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब हुयी है।' हिमांशु आगे कहते हैं, आर्थिक रूप से संपन्न रहे जिन वकीलों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी है उनकी यादाश्त भी कमजोर हो गयी है और ऐसा एक नहीं कई लोगों के साथ हुआ है और इसका कारण लॉकडाउन से उपजा अवसाद है।

नये वकीलों की स्थिति

अधिवक्ता अनिल कुमार कहते हैं, लॉकडाउन में लगभग 20 प्रतिशत वकीलों ने वकालत का पेशा छोड़कर जीवकोपार्जन के दूसरे संसाधनों को अपनाया है।' अधिवक्ता डॉ. बृजेश चन्द्र मिश्र भी ये बात कहते हैं।

बार काउंसिल के महासचिव मुरारी कुमार हिमांशु ऐसे लगभग 200 वकीलों की संख्या गिनाते हैं जो लॉकडाउन के बाद काम पर लौटे ही नहीं। हालांकि वो यह भी कहते हैं कि ये लोग अपने गांवों—घरों से अपने केस से जुड़े काम आकर करते हैं। साथ में मुरारी कुमार हिमांशु यह भी कहते हैं कि लगभग 20 वकीलों ने वकालत का पेशा छोड़कर दूसरा धंधा करने लगे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक वकील को वकालत के पेशे के साथ साथ दूसरा कोई काम करने की इजाज़त नहीं है। भुखमरी की हालत में भी कोई और काम नहीं कर सकते थे, इसलिए दर्जनभर से ज्यादा जूनियर वकीलों ने पेशा ही बदल दिया। कई जूनियर वकील दुकानों पर काम करते हैं, सब्जियां बेचते हैं, मास्क बेचते हैं और कुछ लोग दूसरे शहरों में अपनी पहचान छुपाकर कोई काम करते हैं।

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हालांकि मुरारी कुमार हिमांशु ये भी उम्मीद जताते हैं, 'हो सकता है कोर्ट में काम की सामान्य परिस्थितियाँ बन जाने पर वो वापस लौट आयें।'

अधिवक्ता एजाज़ हैदर और दूसरे अधिवक्ताओं की बातचीत में एक मांग बराबर उठाई जा रही है कि नये वकीलों को शुरू के 5 वर्षों के लिए न्यूनतम 5 हज़ार रुपया मासिक भत्ता मिलना चाहिए, जिससे वो अपनी वकालत की प्रेक्टिस को जमा सकें। लॉकडाउन में जिन लोगों ने वकालत का पेशा छोड़ा है या जो शहर छोड़कर अपने गांवों को लौट गये हैं, उनमें इन्हीं वकीलों की संख्या सर्वाधिक है। दरअसल कुछ गिनती के ही वकील हैं, जिन्हें संपन्न वकीलों की श्रेणी में रखा जाता हैं। वकीलों की मानें तो लॉकडाउन में इन संपन्न वकीलों की आमदनी पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन 80 प्रतिशत से ज़्यादा वकील रोज की आमदनी पर जीते हैं और लॉकडाउन ने इसी तबके को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है।

गया में कोर्ट परिसर में लॉकडाउन के बाद रौनक लौटने ही लगी थी कि बढ़ते कोरोना केसों के बाद पसर गया है फिर से सन्नाटा

गया में वकीलों को दो तरह की सहायता मिली है, प्रथम तो बार काउंसिल की ओर से उन वकीलों को 2000 रुपये की एकमुश्त सहायता राशि मिली है, जिन्होंने इसके लिए आवेदन किया था। दूसरे, गया बार एसोसिएशन ने अपनी ओर से भी अपने साथियों की सहायता की है, ये भी ज़रूरत के अनुसार एक या दो हज़ार रुपये की राशि थी, जो कुछ चुनिन्दा वकीलों को दिया गया है।

बिहार बार काउंसिल से जो कुछ अधिवक्ताओं को 2000 रुपये की सहायता राशि मिली है। उसके बारे में अधिवक्ता अवध किशोर सिंह बताते हैं, ये राशि मदद के तौर पर जरूर दी गयी है, लेकिन इसे अधिवक्ताओं के पैसे से काट लिया जायेगा। हालांकि अपनी इस बात पर वो पूरी तरह सुनिश्चित नहीं थे।

अधिवक्ता अखिलेन्द्र कुमार कहते हैं, वकीलों को कम से कम आयुष्मान योजना से जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि बीमारी या आपदा की हालत में वकील काम नहीं कर पाता। उनके लिए इलाज का बोझ उठा पाना संभव नहीं रहता। गया में अधिवक्ताओं ने हीरा बाबू वेलफेयर ट्रस्ट बनाया हुआ है, जिसका गठन 2006 में किया गया था। ये ट्रस्ट जरूरतमंद वकीलों की आर्थिक सहायता करता है।'

1995 से गया जिले में वकालत कर रहे एजाज़ हैदर इस बात पर नाराज़गी और दुःख व्यक्त करते हैं कि लॉकडाउन में आम जनता, मजदूर और दूसरे तबके के लोगों को सरकारी और गैरसरकारी सहायता कम या ज़्यादा मिली, लेकिन वकील और अधिवक्ता लिपिक को कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिली। अधिवक्ता ललित कुमार गुप्ता भी यही बात कहते हैं।

गया बार एसोसिएशन के महासचिव से मिली जानकारी के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान 18 अधिवक्ताओं की मृत्यु हुई है, जिनमें चार अधिवक्ता कोरोना से संक्रमित थे। बाकि लोगों के बारे में जानकारी मिली कि वे लॉकडाउन के कारण अवसादग्रस्त थे।

मुरारी कुमार हिमांशु कहते हैं, 'मरने वालों में कुछ लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वो अंतिम क्रिया भी संपन्न नहीं कर सकते थे, बार एसोसिएशन की ओर से ऐसे लोगों की आर्थिक रूप से सहायता की गयी।' वकीलों से बातचीत के दौरान यह बात भी सामने आयी कि जिन वकीलों को कोई आर्थिक दिक्कत नहीं भी थी, उन्हें भी लॉकडाउन से उपजे अवसाद ने घेर लिया और उनके स्वास्थ्य पर इसका असर दिखाई देने लगा। लॉकडाउन से उपजे आर्थिक संकट को देखते हुए ऐसे अवसादग्रस्त लोगों को निकट भविष्य में इससे छुटकारा मिलेगा, कहना मुश्किल है।

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अधिवक्ता एजाज़ हैदर और अन्य अधिवक्ताओं ने बातचीत में नए वकीलों को शुरू के 5 सालों में कम से कम 5 हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता दिये जाने, जिससे वो कोर्ट में धीरे धीरे अपनी प्रैक्टिस जमा सकें, आपदाकाल या किसी विशेष आर्थिक संकट में सभी वकीलों को या कम से कम कमज़ोर आय वर्ग वाले वकीलों को आर्थिक सहायता एवं चिकित्सा सुविधा देने और बुजुर्ग वकीलों को पेंशन मिलने की मांग रखी। गया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और दूसरे कई अधिवक्ताओं ने सुझाव दिया कि आयुष्मान भारत योजना के लाभ के दायरे में वकीलों को भी लाया जाना चाहिए। गया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता ओम प्रकाश जी ने बताया कि नये वकीलों को सरकार की और से कुछ आर्थिक सहायता मिले, इस आशय का प्रोपोज़ल सरकार को भेजा गया है। हालांकि ये मांगें बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन देश के आर्थिक हालात और वर्तमान सरकार की स्थिति को देखते हुए लगता नहीं है कि इन मांगों पर विचार भी होगा।

महिला वकीलों की स्थिति

गया बार काउंसिल के महासचिव के अनुसार लगभग 150 महिलाएं यहाँ वकालत कर रही हैं, इनमें भी 30 के आसपास रेगुलर हैं। कोर्ट में कुछ गिनती की ही महिलाएं नज़र आयीं। इनमें से तीन महिला वकीलों ने जनज्वार टीम से बात की, लेकिन ऑन कैमरा सिर्फ़ दो ही ने अपनी बात रखी। कुछ और महिला वकीलों से जब जनज्वार टीम ने बात करने की कोशिश की तो उन्होंने साफ मना कर दिया।

महिला वकील शशिकला और ललिता सिंह : घर चलाना भी हो गया था मुश्किल

20 साल से वकालत कर रही शशिलता देवी कहती हैं, 'लॉकडाउन में वकीलों को बहुत परेशानी हुई है और महिला वकीलों को तो विशेष परेशानी हुई है क्योंकि उन्हें घर भी चलाना होता है। भारत की महिलाओं में एक विशेष शक्ति होती है जिसके कारण वो हर हाल में अपने परिवार और बच्चों का भारण पोषण कर लेती हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में एक महिला के रूप में उन्हें बहुत कष्ट भी हुआ है।'

गया में महिला वकीलों की संख्या इतनी कम क्यों है? के ज़वाब में वो कहती हैं, "आप मर्द लोग उन्हें बाहर निकलने कहाँ देते हैं। अब जिस तरह महिलाओं को पढ़ने-लिखने का अवसर मिल रहा है, भविष्य में महिला वकीलों की संख्या बढ़ेगी।' वहीं अधिवक्ता ललिता सिंह कहती हैं, उन्हें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि लॉकडाउन इतने लम्बे समय तक चलेगा। हम तो यह बात भूल ही गये हैं कि दाल चावल के साथ सब्जी भी खाई जाती है, कमाई लॉकडाउन के कारण बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुयी है।

ऑनलाइन सुनवाई की स्थिति

ऑनलाइन सुनवाई के बारे में अधिवक्ता अनिल कुमार शर्मा बताते हैं, 'सभी वकीलों की ऐसी स्थिति नहीं है कि वो ऑनलाइन सुनवाई में सहभागी हो पायें। ऑनलाइन सुनवाई के लिए न तो वकील टैक्निकल तौर पर स्ट्रॉंग हैं और न ही उनके पास संसाधन ही मौजूद हैं।

एक अन्य वकील बताते हैं, 'मुश्किल से 10 प्रतिशत वकील ही ऑनलाइन सुनवाई में शामिल हो पाने की दक्षता रखते हैं। ऑनलाइन सुनवाई को सरल बनाने के लिए ज़रूरी है कि अधिवक्ताओं को तकनीकी दक्षता के लिए प्रशिक्षित किया जाए।' लॉकडाउन खुलने के बाद जब आमने सामने सुनवाई होने लगी तो जज सिर्फ़ दो घंटा ही सुनवाई करने लगे। ऐसे में वकील कितने वादों का निपटारा करेंगे, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

अधिवक्ता अनिल कुमार की मानें तो 150 नये केस रोज़ रजिस्टर्ड हो रहे हैं। अधिवक्ता ललित कुमार गुप्ता भी ऑनलाइन सुनवाई को महज़ खानापूर्ती मानते हैं। गया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता ओम प्रकाश कहते हैं, 'ऑनलाइन सुनवाई में वकीलों का बड़ा हिस्सा ठीक से शामिल नहीं हो पाया, लेकिन जो वकील तकनीकी रूप से सक्षम थे या जो एक्सपर्ट को हायर कर सकते थे, उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, मगर ऐसी स्थिति में बहुत थोड़े सीनियर वकील हैं।

अधिवक्ता सहदेव यादव तकलीफ बयां करते हैं, 'ऑनलाइन सुनवाई का जो बुनियादी ढांचा है वो ही इतना सक्षम नहीं है कि सुनवाई को सरल एवं सहज बनाया जा सके। यहाँ बुनियादी ढाँचे से तात्पर्य नेट की स्पीड और कंप्यूटर और लैपटॉप जैसे संसाधनों की उपलब्धता से है।'

मुवक्किलों की परेशानी

अधिवक्ता अखिलेन्द्र कुमार कहते हैं, 'कोर्ट में ऑनलाइन सुनवाई हुई लेकिन सुनवाई आम दिनों की अपेक्षा और केसों की आमद को देखते हुए बहुत कम हुई है। कोर्ट और अधिवक्ताओं दोनों का प्रयास रहा है कि पीड़ित लोगों को समय से न्याय मिले, लेकिन लॉकडाउन के कारण प्रक्रियात्मक दिक्कतें आयी हैं, जिनके कारण पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाया। इसी तरह की दिक्कतों के कारण जमानत के कई मामले समय पर सुनवाई न होने के कारण हल न हो पाए और लोगों को अपेक्षा से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा।'

अधिवक्ता अनिल कुमार एक केस के बारे में बताते हैं, 'एक किसान जिसने जानवरों से फसल को बचाने के लिए कांटेदार तारों से अपनी फसल को घेर रखा था, उसके खेत के बगल में ट्रांसफार्मर था, जिसका तार टूटकर बाड़ के रूप में लगाये तारों पर गिर गया, इन तारों की चपेट में आकर एक आदमी की मौत हो गयी, इस किसान पर FIR हुई और उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। लॉकडाउन के कारण सुनवाई न हो पाने की वजह से 80 साल का किसान अपने एक बेटे के साथ अभी भी जेल में पड़ा हुआ है।'

अधिवक्ता डॉ. बृजेश चन्द्र मिश्र कहते हैं, उनका खुद का एक केस लॉकडाउन से पहले फैसले के स्टेज तक पहुँच गया था, लेकिन लॉकडाउन के कारण उस पर आगे सुनवाई नहीं हो पायी, अब जबकि सुनवाई हो रही है तो न्यायिक पदाधिकारी का तबादला हो गया है और उनकी जगह कोई नया पदाधिकारी अभी आया नहीं है, ऐसे में फैसले के स्तर तक पहुँच चुके केस की सुनवाई फिर कब होगी, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। दीवानी के मामलों में 20—20 साल तक फैसले नहीं हो पाते, ऐसे में किसी केस का फैसले के स्तर तक पहुंचना और उस पर कोई कार्यवाही न हो पाना कितना पीड़ादायी है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

अधिवक्ता ललित कुमार गुप्ता ​के मुताबिक, उनकी जानकारी में 10 से ज़्यादा ऐसे केस हैं जिनकी समय पर सुनवाई न होने के कारण लोग जेल में हैं। अधिवक्ता लिपिक मोहम्मद रोशन एक मुवक्किल के बारे में बताते हैं जिसकी जमानत रद्द कर दी गयी है और वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के। ऐसा ही और भी कई लोगों के साथ हुआ है, मोहम्मद रोशन के अनुसार 100 से ज़्यादा केसों में ऐसा हो चुका है। अधिवक्ता बैकुंठ सिंह भी इसी तरह की राय व्यक्त करते हैं। इस मुद्दे पर वकीलों और लिपिकों का ऐतराज़ ये है कि लॉकडाउन के कारण अभी भी प्रक्रियात्मक दिक्कतें ख़त्म नहीं हुई हैं, ऐसे में जज साहिबान को जमानत रद्द करने के बजाय इस पहलु को ध्यान में रखना चाहिए। अधिवक्ता लिपिक अखिलेश कुमार शर्मा अपने एक मुकदमे के उदाहरण के ज़रिये बताते हैं, 'लॉकडाउन में सुनवाई न हो पाने कारण न्यायार्थियों को बहुत परेशानी हुई है।

कोर्ट परिसर में ही एक मुवक्किल धर्मवीर भारती से मुलाकात हुई, लॉकडाउन लगने से पहले इनकी पुश्तैनी ज़मीन पर कुछ लोगों ने अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया था। इस सिलसिले में मुकदमा दायर किया लेकिन लॉकडाउन के कारण अपेक्षित कार्यवाही नहीं हुई, इसलिए अवैध कब्जाधारियों को ज़मीन से हटाया नहीं जा सका। अवैध कब्जाधारी उनकी ज़मीन से अब दूसरी फसल काटने जा रहे हैं।

धर्मवीर भारती जी कहते हैं, आर्थिक संकट के दौर में एक खेती ही ऐसी चीज़ है जो लोगों को भूखों नहीं मरने देती, इसलिए सरकार को खेती और किसानी को बचाए रखने के लिए उपाय करना चाहिए। उनका इशारा था कि खेती से सम्बंधित विवादों के निपटारे को प्राथमिकता देनी चाहिए, लेकिन सच तो ये है कि खेत और ज़मीन से सम्बंधित विवाद ही सबसे ज़्यादा हैं, यहाँ तक कि फौजदारी मामलों में ज़्यादातर विवादों की जड़ में खेत और ज़मीन के मामले हैं। इस तरह अगर खेत और ज़मीन के मामलों को सुनवाई में प्राथमिकता मिलने लगे तो कोर्ट कचेहरी खाली हो जायेंगे। फिर भी एक किसान के रूप में ये बेहद ज़रूरी मांग है।

गया कोर्ट परिसर में वकीलों के पास खड़ी मुवक्किलों की भीड़ न्याय की आस में, अब एक फिर से करना होगा लंबा इंतजार

लॉकडाउन में अपराध

लॉकडाउन में अपराध बढ़ा है या घटा है, इस पर अधिवक्ताओं की मिली-जुली राय है, अधिवक्ता अखिलेन्द्र कुमार कहते हैं कि अपराध में कमी आई है, क्योंकि लोग अपने अपने घरों में क़ैद थे, उन्हें बाहर निकलने की आजादी नहीं थी। कुछ लोगों की राय थी कि ज़मीन हथियाने के मामले लॉकडाउन में बेहद ज्यादा बढ़े हैं, लेकिन अधिवक्ता अखिलेन्द्र कुमार इससे सहमत नहीं हैं। वो कहते हैं लैंड डिस्प्यूट पहले भी थे, लॉकडाउन में भी हुए और अभी भी हो रहे हैं।

वहीं कुछ वकील लॉकडाउन में अपराध बढने का कारण भी लॉकडाउन को ही मानते हैं। उनका कहना है, लॉकडाउन के कारण बड़े पैमाने पर लोग बेरोजगार हुए हैं, ऐसे में जिसके पास आमदनी का कोई और ज़रिया नहीं है, वो क्या कुछ नहीं कर सकता। अधिवक्ता ललित कुमार गुप्ता कहते हैं, 'दीवानी मामलों की सुनवाई बंद होने से ज़मीनों को कब्जाने और परिणामस्वारूप अपराध के मामले लॉकडाउन में बढ़े हैं। गया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता ओम प्रकाश भी इससे सहमति जताते हैं। अधिवक्ता लिपिक अखिलेश कुमार शर्मा अपने आसपास के अनुभवों के आधार पर कहते हैं, लॉकडाउन में अपराध बढ़ा है, खासतौर पर चोरी डकैती के मामले में।

लॉकडाउन में घरेलू हिंसा

अधिवक्ता अखिलेन्द्र कुमार और अनिल कुमार शर्मा मानते हैं कि लॉकडाउन में घरेलू हिंसा नहीं बढ़ी है, बल्कि परिवारों में और प्रेम बढ़ा है, इसके पीछे उनका तर्क ये है कि पारिवारिक सदस्यों को एक दूसरे के साथ ज़्यादा समय गुज़ारने का मौक़ा मिला है। लेकिन महिला वकील शशिलता देवी कुछ और ही बताती हैं। शशिलता बताती हैं, 'भारत में और विशेष रूप से बिहार में महिलाओं की स्थिति काफी ख़राब है। महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा बेहद आम बात है और लॉकडाउन में ये हिंसा बढ़ी है।' घरेलू हिंसा को को कैसे रोका जाए? के ज़वाब में वो कहती है, 'महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा, तभी उनके प्रति घरेलू हिंसा को रोका जा सकेगा, लेकिन सीनियर वकील ललिता सिंह घरेलू हिंसा को एक सामाजिक समस्या मानती हैं और कहती हैं महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हमेशा से होती रही हैं, लेकिन पारिवारिक मर्यादा के कारण वो इस पर खुलकर बात नहीं करतीं।

कोर्ट परिसर से रोज कमाने खाने वाले हर इन्सान के चेहरे की ख़ामोशी या मुस्कराहट के पीछे एक दुःखभरी कहानी है, जिसे कोरोना लॉकडाउन ने लिखा है। अफ़सोस कि मान-मर्यादा उन्हें ये कहानी कहने भी नहीं देती और हालात उनसे सहने की ताकत छीनता जा रहा है।

(यह रिपोर्ट ठाकुर फैमिली फाउंडेशन द्वारा समर्थित एक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। ठाकुर फैमिली फाउंडेशन ने इस प्रोजेक्ट पर किसी तरह का कोई संपादकीय नियंत्रण नहीं रखा है।)

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