जनज्वार विशेष

लॉकडाउन से खौफज़दा वकील, दबी ज़ुबान में कहा 'कहीं मुंह से ऐसा सच न निकले जिससे दर्ज हो जाये देशद्रोह का मुकदमा'

Janjwar Desk
31 March 2021 10:57 AM GMT
लॉकडाउन से खौफज़दा वकील, दबी ज़ुबान में कहा कहीं मुंह से ऐसा सच न निकले जिससे दर्ज हो जाये देशद्रोह का मुकदमा
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लॉकडाउन में बुरी तरह प्रभावित बिहार के बेगूसराय के वकीलों में एक अजीब सा खौफ़ है, कुछ ने दबी ज़ुबान में तो कुछ ने डरते हुए ही सही कहा कि वो इस बात से डरे हुए हैं कि कहीं उनके मुंह से कोई ऐसी बात न निकल जाये, जिससे उन पर देशद्रोह या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्यवाही हो जाये....

लॉकडाउन के बाद से बिहार के बेगूसराय जिले में कोर्ट-कचहरी से जुड़े लोग किस तरह आजीविका के संकट से जूझे और कैसी परेशानियां उठा रहे हैं, पढ़िये सलमान अरशद की खास रिपोर्ट

जनज्वार। मार्च 2020 में एक शार्ट नोटिस पर पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया था, जो अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बल्कि एक बार फिर से लॉकडाउन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, क्योंकि कोरोना मरीजों का आंकड़ा फिर से एक बार हाइट छू रहा है।

लॉकडाउन में अमीर, गरीब, नौकरीपेशा, व्यावसायी, मज़दूर सभी को भारी तक़लीफों से गुज़रना पड़ा है। न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों पर लॉकडाउन का क्या असर हुआ, उनकी आर्थिक स्थिति कितनी खराब हुई, इसका पता लगाने के लिए वकालत से जुड़े लोगों के बीच जाकर जनज्वार टीम ने उनकी हालत जानी। इस रिपोर्ट के माध्यम से आप रू-ब-रू होंगे बिहार के बेगूसराय जिले के उन लोगों से जो न्याय व्यवस्था से जुड़े हैं और उसी से उनकी रोजी-रोटी जुड़ी है।

बेगूसराय उत्तरी बिहार का एक प्रमुख जिला है, इस जिले के बारे में आम धारणा है कि बिहार के दूसरे जिलों की अपेक्षा यहाँ के लोग सामाजिक व राजनीतिक रूप से ज़्यादा जागरूक हैं। 2011 की जनगणना के आधार पर बेगूसराय की जनसंख्या 2,970,541 है। ये जनसंख्या अर्मेनिया जैसे देश या अमेरिका के राज्य मिसीसिपी के बराबर है। जनसंख्या के आधार पर भारत के 640 जिलों में बेगूसराय 128वें नंबर पर आता है।

​जिला वकील संघ बेगूसराय

बेगुसराय में रजिस्टर्ड वकीलों की संख्या लगभग 4 हज़ार है। इनमें तकरीबन 150 महिलाएं हैं। कोर्ट में सभी स्तरों के न्यायाधीशों के पदों की कुल संख्या 61 है, 15 पदों पर कोई जज नहीं हैं। कार्यरत जजों की संख्या 41 है। लगभग 300 वकील पिछड़ा वर्ग से हैं, 60 एससी वर्ग से हैं तो मुस्लिम माइनोरिटी वर्ग से भी लगभग 100 वकील हैं। (ये आंकड़े वकीलों से बातचीत पर आधारित हैं, इनमें मामूली अंतर भी हो सकता है)

लॉकडाउन खुलने के बाद कोर्ट परिसर में वैसे तो चहल-पहल दिखाई देने लगी है, लेकिन अभी सामान्य ढंग से काम नहीं हो रहा है। वकील कहते हैं, अभी महज़ 15 से 20 प्रतिशत वकील ही काम पर लौटे हैं।

अधिवक्ता अखिलेश्वर प्रसाद सिंह, वशिष्ट कुमार, अमरेन्द्र कुमार और मौली प्रसाद सिंह समेत अन्य कई वकीलों ने बातचीत में बताया कि सिविल मामलों में केवल टाइटल सूट फाइल हो रहा है और क्रिमिनल मामलों में केवल जमानत का काम हो रहा है। औपचारिक रूप से कोर्ट में अभी भी लॉकडाउन ख़त्म नहीं हुआ है। जिस तरह के हालात कोरोना के बढ़ते मामलों के बाद फिलहाल बन रहे हैं, उससे इस आशंका को और बल मिलता है कि दोबारा पूर्ण तालाबंदी न हो जाये।

सीनियर अधिवक्ता अमरेन्द्र कुमार अमर इस पर अपनी नाराज़गी जताते हुए कहते हैं, 'कोरोना काल में चुनाव हो सकता है, रैलियां हो सकती हैं, बाज़ार खुल सकता है तो कोर्ट का कामकाज सामान्य ढंग से संचालित क्यों नहीं हो सकता? कोर्ट में कामकाज की उपेक्षा के लिए सरकार और न्यायिक प्रशासन दोनों को विचार करना चाहिए।'

एक महत्वपूर्ण बात ये कि वकीलों में एक अजीब सा खौफ़ है, कुछ ने दबी ज़ुबान में तो कुछ ने डरते हुए ही सही कहा कि वो इस बात से डरे हुए हैं कि कहीं उनके मुंह से कोई ऐसी बात न निकल जाये जिससे उन पर देशद्रोह या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्यवाही हो जाये।

अधिवक्ता वशिष्ट कुमार ने झिझकते हुए ही सही ऑन कैमरा भी ये बात कही। वो कहते हैं, 'वकालत के पेशे से जुड़े हुए लोग भी अगर सरकार से डरे हुए हैं तो वो अन्य नागरिकों की सहायता कैसे करेंगे? नागरिकों पर जब किसी भी तरह का न्यायिक संकट आता है तो वो वकीलों के पास जाते हैं और उनके ही माध्यम से अपना पक्ष नयायालय के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि एक डरा हुआ वकील किसी ज़रूरतमंद नागरिक की मदद कैसे करेगा?


कोरोना प्रोटोकॉल का कोर्ट परिसर में क्या है हाल

फिलहाल कोर्ट परिसर में न तो दो मीटर की दूरी का ध्यान रखा जा रहा है और न ही कोई मास्क पहन रहा है। आम दिनों की ही तरह सभी उठ बैठ रहे हैं और दूसरे काम भी कर रहे हैं। इस बारे में वकीलों की राय है कि ये प्रोटोकॉल एक तो व्यावहारिक नहीं है, दूसरे जिस तरह का डर शासन-प्रशासन और मीडिया ने पैदा किया था, उस पर अब लोगों का भरोसा नहीं है।

अधिवक्ता वशिष्ट कुमार ने लगभग चुनौती देते हुए कहा, "कोरोना एक साजिश है, हो सकता है कि इसका असर स्वास्थ्य पर पड़ता हो, लेकिन ये वैसा बिलकुल नहीं है जैसा इसके बारे में कहा गया है।" उन्होंने किसान आन्दोलन का उदाहरण देकर कहा कि "अगर सच में कोरोना का संक्रमण वैसा होता जैसा कहा गया है तो कोरोना लाखों लोगों को तक फ़ैल गया होता, जबकि अभी तक एक भी किसान के कोरोना से संक्रमित होने की कोई खबर नहीं है।"

वहीं एक अन्य अधिवक्ता दीपक कुमार सिन्हा कहते हैं, 'भारत के लोग परिश्रमी हैं, इसलिए यहाँ के लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति दूसरे देशों की तुलना में बेहतर है। कोरोना से यहाँ ज़्यादा लोग संक्रमित नहीं हुए। हमारे देश में कोरोना के संकट को राजनीतिक कारणों से बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है।'

एक अधिवक्ता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि जज साहिबान को कोरोना के कारण विशेष सुरक्षा मिली हुई है, लेकिन सामने वकील और मुवक्किल एक दूसरे पर चढ़े हुए खड़े रहते हैं, वे हँसते हुए कहते हैं, "बावजूद इसके अभी तक किसी वकील, मुंशी या मुवक्किल के कोरोना से संक्रमित होने की कोई खबर नहीं है, लेकिन दो जज साहिबान जरूर संक्रमित हुए हैं।"

वकीलों की आमदनी पर कितना पड़ा लॉकडाउन का असर

नाम न बताने की शर्त पर एक वकील कहते हैं, 'वकालत ऐसा पेशा है जिसमें मुवक्किलों से मिली फीस पर ही एक वकील का गुज़ारा होता है, उसे और कहीं से किसी भी प्रकार की कोई आमदनी नहीं होती। एक वकील न तो कोई साइड बिजनेस कर सकता है और न ही किसी अन्य बिजनेस में सक्रिय रूप से सहयोगी बन सकता है। लॉकडाउन में वकालत के पेशे पर पूर्णविराम लग जाने के बाद भी वकीलों को इस बात की इजाज़त नहीं थी कि वो अपने जीवकोपार्जन के लिए कोई और काम कर सकते हैं, लेकिन मजबूरीवश कुछ वकीलों ने कुछ दूसरे काम भी किये। मगर वो इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इसकी उन्हें इजाज़त नहीं है।'

कितने वकीलों ने पूरी तरह से लॉकडाउन के दौरान वकालत का पेशा छोड़ दिया है, इस पर लोगों का मत अलग अलग है, लेकिन इस मुद्दे पर सबकी राय को मिलाकर कहा जाये तो तकरीबन 10 प्रतिशत लोगों ने वकालत छोड़ दी है। क्या इनके दुबारा लौटने की संभावना है, इस पर अधिकांश वकीलों की राय है कि कोर्ट के सुचारू रूप से संचालन की स्थिति में हो सकता है ऐसे लोग लौट आयें।

अधिवक्ता वशिष्ट कुमार कहते हैं, 'वकालत के पेशे में काम न मिलने के कारण कुछ वकील मास्क बेच रहे हैं। कोरोना के कारण बाज़ार में कई नये प्रोडक्ट आये हैं, मास्क भी उन्हीं में से एक है। कोरोना काल में मास्क के नाम पर भी लोगों को लूटा गया और अब इस बाज़ार में कोर्ट परिसर से बेरोजगार हुआ वकील भी दाखिल हो चुका है।'

बेगूसराय कोर्ट परिसर का एक हिस्सा, लॉकडाउन के बाद कोरोना नियमों का कोई नहीं हो रहा पालन

एक वकील ने नाम न छापने की शर्त पर अपने साथी वकील के बारे में बताया कि वो किसी दूसरे शहर जाकर सब्जी बेचते रहे हैं। कहते हैं, 'आपको खुद भी याद होगा कि लॉकडाउन के दौरान अचानक से आपके घरों के आसपास सब्ज़ी बेचने वालों के ऐसे ठेले भी दिखाई दे रहे थे जो पहले नज़र नहीं आते थे, और अब फिर वो कहीं गायब हो गये हैं। चूँकि लॉकडाउन के दौरान सब्जी बेचने पर कोई पाबन्दी नहीं थी तो बहुत से ऐसे लोग जिनका काम-धंधा बंद हो गया था या जिनकी नौकरी चली गयी थी वो सब्जी के ठेले लगाने लगे थे, ऐसे ही ठेले वालों में कुछ वकील भी रहे हों, लेकिन एक वकील के तौर पर न तो वो इस बात को स्वीकार कर सकते हैं और पता चल जाये तो हम भी उनका नाम आपके साथ शेयर नहीं कर पाएंगे।'

वकीलों से चर्चा में एक बात सामने आई कि वो वकील जो काफी पुराने हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही काफी बेहतर है, उनकी संख्या 10 फीसदी भी नहीं है।

अधिवक्ता गोपाल कुमार ऐसे वकीलों के बारे में कहते हैं, 'उनकी आमदनी रुक जाने के बावजूद भी वो बहुत परेशान नहीं हुए। सबसे ज़्यादा नुकसान उन वकीलों को हुआ जो हाल ही में वकालत के पेशे के जुड़े थे या जिन्होंने पिछले तीन या चार साल के भीतर ही वकालत शुरू की थी। इनमें अधिकांश ऐसे लोग थे जो शहर में किराये का मकान लेकर रहते थे। इस तरह के सभी लोग शहर छोड़ कर चले गये हैं। ऐसे वकीलों की अधिकांश संख्या खेतीबाड़ी के पुश्तैनी पेशे में लग गयी है और अभी तक शहर वापस नहीं आई है।'

अधिवक्ता दीपक कुमार सिन्हा भी कहते हैं कि जो वकील किराये की मकानों में रहते थे, खराब आर्थिक दशा के कारण मकानों को खाली करके चले गये हैं। इनमें सबसे बुरी हालत एससी और एसटी समुदाय के नये वकीलों की हुई है। यहाँ ध्यान देने वाली बात ये भी है कि शहर में ऐसे लोगों की भी एक बड़ी संख्या है जो अपनी बचत के पैसे को मकानों में लगा देते हैं और इसे किराये पर देकर कुछ और आमदनी का इंतजाम कर लेते हैं, वकीलों के वापस गांवों को लौट जाने के कारण ऐसे लोगों की आमदनी पर भी बुरा असर पड़ा है।

नये वकीलों की स्थिति

वकीलों में नया किसे कहा जाए, ये एक महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है, लेकिन उन सभी वकीलों को नया वकील माना जाता है जिन्हें इस पेशे में आये हुए अभी 5 साल से ज़्यादा नहीं हुआ है। ऐसे वकील किसी सीनियर वकील के मातहत ही काम करते हैं, इनके अपने केस भी होते हैं लेकिन ज़्यादातर ये पुराने वकीलों के दिए केस पर ही काम करते हैं। ऐसे वकीलों की आमदनी सीनियर वकीलों के ज़रिये दिया गया पैसा ही होता है। एक वकील अपने नये साथी को कितना और कैसे भुगतान करेगा, इसका कोई नियम नहीं है, इसलिए ये अंदाज़ लगाना मुश्किल है कि किसी नये वकील की आमदनी कितनी होती है।

अधिवक्ता समुदाय की बातचीत को आधार मानें तो ऐसे वकीलों को बस इतना ही मिल पाता है कि उनका खर्चा किसी तरह चल जाए। ऐसे ज्यादातर वकील लॉकडाउन में अपने गांवों को लौट गये हैं और अभी भी उनमें से बहुत कम वकील लौटे हैं।

अधिवक्ता गोपाल कुमार जो सामाजिक रूप से भी काफ़ी सक्रिय हैं, उपरोक्त तथ्यों की पुष्टि करते हैं। अधिवक्ता दीपक कुमार सिन्हा भी कहते हैं, 'नये वकीलों को लॉकडाउन में ज़्यादा परेशानी हुई है और इनमें से जो किराये के मकानों में रहते थे, वो मकान खाली कर अपने घरों को लौट गये हैं। लॉकडाउन में ऐसे ही वकीलों ने वकालत के पेशे पर विराम लगने के कारण दूसरे पेशों को अपनाया है, लेकिन जैसे जैसे कोर्ट में काम सामान्य हो रहा है, नये वकील भी अपने काम पर लौट रहे हैं। सब्जी बेचने वाले जिस वकील का ज़िक्र किया गया है वो एक नया वकील ही है, जो अभी कोर्ट में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।'

दलित एवं पिछड़े समुदाय के वकीलों की हालत

हमारे देश में दलित आज भी एक बेहद पिछड़ा समुदाय माना जाता है। इस समुदाय के पास न तो ज़मीनें हैं और न ही इन्हें शिक्षा ग्रहण करने और नौकरियों में जाने का समुचित अवसर मिला है। बेगूसराय में रजिस्टर्ड कुल 4 हजार वकीलों में इनकी संख्या 100 भी नहीं है। इसी प्रकार पिछड़े समुदाय के वकीलों की भी स्थिति है। हालांकि दलित समुदाय की तुलना में इनकी स्थिति बेहतर है, लेकिन उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि दूसरे पेशों की ही तरह वकालत के पेशे में भी इन समुदायों की भागीदारी अभी भी बहुत कम है। अधिवक्ता संतोष कुमार महतो कहते हैं, जिन वकीलों को लॉकडाउन के कारण ज़्यादा कष्ट भोगना पडा, इनमें इन दोनों समुदायों के वकीलों की संख्या ज़्यादा है।

वकीलों को लॉकडाउन में कितनी मिली मदद

लॉकडाउन के दौरान केंद्र हो या फिर राज्य सरकार, लाखों रुपये के राहत पैकेज़ की घोषणा की गयी थी, लेकिन एक भी ऐसा वकील नहीं मिला जो अपने या अपने किसी साथी के बारे में कह पाता कि उसे सरकार की ओर से किसी भी तरह का कोई सहयोग मिला है। बार काउंसिल ने जरूर 2-2 हज़ार रुपये की सहायता कुछ वकीलों को दी है, लेकिन ये सोचने वाली बात है कि लॉकडाउन के लगभग एक साल पूरे होने को हैं, महज़ दो हज़ार रूपये की सहायता वो भी सिर्फ़ कुछ लोगों को कितनी राहत पहुंचायेगी?

अधिवक्ता स्मृति कुमारी ने अपने पास बैठे साथियों के हवाले से बताती हैं, ये सहायता राशि भी कुछ तकनीकी कारणों से कई लोगो को अभी तक नहीं मिल पायी है।

ऑनलाइन सुनवाई ने लॉकडाउन में बढ़ाई वकालत पेशे की बदहाली

अधिवक्ता चन्द्र मौली प्रसाद सिंह बार काउंसिल पर आरोप लगाते हैं, "उन्हें वकीलों के हितों से कुछ लेना देना नहीं है, वहां बैठे लोग बस फंड की लूटखसोट करते रहते हैं।" इसी से मिलता जुलता आरोप अधिवक्ता अमरेन्द्र कुमार का भी हैं, वो कोरोना काल में कोर्ट के सुचारू संचालन को लेकर बार काउंसिल सहित हाईकोर्ट और शासन प्रशासन सभी के प्रति रोष व्यक्त करते हैं।

अधिवक्ता चन्द्र मौली प्रसाद सिंह समेत कुछ दूसरे अधिवक्ताओं ने वकीलों की आपातकालीन सहायता के लिए कुछ सुझाव भी दिए। कहा इन्हें मुख्यतः तीन भागों में बांटा जा सकता है, प्रथम, वो वकील जिन्होंने अभी अपना पेशा बस शुरू ही किया है, उनके लिए ऐसी सहायता होनी चाहिए जिससे कम से कम उनका गुज़ारा हो सके। दूसरा, लॉकडाउन जैसी स्थिति में वकीलों की मदद हो सके, इसके लिए बार काउंसिल और सरकार को मिलकर फंड क्रिएट करना चाहिए, एक तीसरा सुझाव ये आया कि बीमारी या दुर्घटना जैसी स्थिति में भी वकीलों को सहायता मिले, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।

इन सुझावों को कुछ लोगों ने केवल वकीलों तक सीमित रखा तो कुछ वकीलों ने कहा कि इस तरह की सहायता के दायरे में वकील और मुंशी दोनों को रखा जाना चाहिए। अधिवक्ता चन्द्र मौली प्रसाद सिंह केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के एक बयान का उल्लेख करते हुए ये उम्मीद जताते हैं कि वकीलों के लिए बीमा जैसी कोई व्यवस्था शायद हो जाये।

सीनियर अधिवक्ता गोपाल कुमार कहते हैं, 'वकील बेहद निरीह प्राणी है, इसकी चिंता न तो सरकार को है न समाज को, न मीडिया को और न ही न्यायिक प्रशासन को। कोरोना काल में हर तबके के मदद की कोई न कोई योजना है, लेकिन वकील और मुंशी के पेशे से जुड़े लोगों के लिए कोई योजना नहीं है।'

अधिवक्ता प्रवीण कुमार मांग करते हैं, 'वकीलों के लिए पेंशन और आपात स्थिति में आर्थिक सहायता की व्यवस्था सरकार और बार एसोसिएशन को करनी चाहिए। अगर ये व्यवस्था पहले से ही होती तो वकीलों को वह दुर्दिन नहीं झेलने होते, जो कोरोना लॉकडाउन के कारण झेले।'

लॉकडाउन के दौरान बिहार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने वकीलों की मदद करने के लिये एक करोड़ रुपया देने का निर्णय लिया था। बीसीसीआई के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता मदन कुमार मिश्र ने बिहार अधिवक्ता कल्याणकारी कोष का जिक्र करते हुए कहा था, 'बिहार सरकार से नियंत्रित, अभी इस कोष में वेलफेयर स्टाम्प की बिक्री से जमा हुए राशि मे 30 करोड़ रुपया है। अगर लॉकडाउन लंबे समय तक जारी रहा और वकीलों की सहायता राशि के लिए और जरूरत होगी तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया का फिक्सड डिपॉजिट भी तोड़ा जा सकता है, ताकि बिहार के वकीलों को आर्थिक रूप से मदद किया जा सके। लॉकडाउन की परिस्थिति में भी अपने सीमित साधन से बार काउंसिल ऑफ इंडिया बिहार के वकीलों को हरसंभव मदद करने का प्रयास करेगा, क्योंकि यह वकीलों की अपनी संस्था है।' मगर वाकई में वकीलों की कितनी मदद मिली, यह उनकी जुबानी जानकर हैरानी होती है।

लॉकडाउन का महिला वकीलों की स्थिति पर कितना पड़ा असर

बेगूसराय में 4 हज़ार वकीलों में महिलाओं की संख्या 150 से भी कम है। लॉकडाउन में सभी महिला वकील घर बैठ गयीं थीं और अभी भी कुछ गिनती की ही महिलाएं कोर्ट परिसर में दिखाई देती हैं। इनमें से एक इंदु कुमारी ने 2018 में एक वकील के तौर पर काम शुरू किया था, उनके साथ लगभग 40 और महिलाओं ने वकील के तौर पर काम शुरू किया था।

इंदु बताती हैं, 'काम न होने के कारण ये सभी महिला वकील अभी घर पर बैठी हैं।'

लॉकडाउन का महिला वकीलों के जीवन पर क्या असर पडा है? के ज़वाब में उनके चेहरे का रंग बदल जाता है, चेहरे पर उदासी तैर जाती है और बड़ी झिझक के साथ वो बताती हैं, 'एक महिला जब चार पैसे कमाती है तो परिवार और समाज़ में उसका सम्मान बढ़ जाता है। महिला बाहर काम के लिए निकलती है तो परिवार की जरूरतों को पूरा करना थोडा आसान हो जाता है, लेकिन जब आमदनी घटती है तो दूसरी दिक्कतों के साथ ही घरेलू हिंसा के मामलों में भी भारी इजाफा होता है।'

अपनी दूसरी सहकर्मी महिलाओं के साथ ही इंदु भी इंतजार कर रही हैं कि कोर्ट में कामकाज का माहौल बने और वो काम पर लौटें। एक महिला वकील स्मृति कुमारी जो फ़िलहाल कोर्ट परिसर में मौजूद थीं, उनसे दूसरे कई मुद्दों पर बात करने के अलावा हमने पूछा कि लॉकडाउन से पहले और अब जबकि कोर्ट आंशिक रूप से खुला हुआ है, उनकी आय में क्या अंतर आया है? उनका ज़वाब था कि 75 प्रतिशत तक आमदनी कम हुई है। कहती हैं, 'जब मुवक्किलों की ही आमदनी नहीं है तो वो हमें कहाँ से देंगे, लेकिन हम उनका काम करते जा रहे हैं इस उम्मीद पर कि हो सकता है कल उनकी स्थिति बेहतर हो तो वो हमें भी भुगतान करें।

ऑनलाइन सुनवाई की स्थिति

लॉकडाउन ने ऑनलाइन काम को बहुत बढ़ावा दिया है और भविष्य की संभावना के तौर पर ऑनलाइन प्लेटफार्म को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। इस संभावना के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि ऑनलाइन बिजनेस, काम, मीटिंग और कॉन्फ्रेंस आदि के बहुत से बिलकुल नये प्लेटफार्म इस लॉकडाउन में ही लांच हुए हैं और उनका उपयोग भी तेज़ी से बढ़ा है। बहुत से लोगों ने ऑनलाइन प्लेटफार्म को इस लॉकडाउन में पहली बार इस्तेमाल किया है। मुकदमों की ऑनलाइन सुनवाई भी इस दौरान ही शुरू हुई है। जब भी ऐसा कोई तकनीकी विकास सामने आता है तो उसके तमाम फायदों के साथ कुछ चुनौतियाँ भी सामने आती हैं।

कोर्ट में ऑनलाइन सुनवाई में भी इसे शिद्दत से महसूस किया गया। वकीलों की पुरानी पीढी ऑनलाइन सुनवाई तो छोड़िये, अभी तक स्मार्टफ़ोन भी इस्तेमाल नहीं करती, इसके अलावा जो लोग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करते भी हैं वो भी तकनीकी तौर पर इतने दक्ष नहीं हैं कि इस सुविधा का सहज रूप में इस्तेमाल कर सकें।

वकील बताते हैं, इंटरनेट की स्लो स्पीड के कारण भी ऑनलाइन सुनवाई में बहुत बाधा होती है। कोर्ट परिसर में एक भी वकील ऐसा नहीं मिला जिसने खुलकर ऑनलाइन सुनवाई को सपोर्ट किया हो। इंदु कुमारी तो सीधे सीधे मांग करती हैं कि मुकदमों की ऑफलाइन सुनवाई ही होनी चाहिए।


अधिवक्ता प्रमोद कुमार कहते हैं, ऑनलाइन सुनवाई में पारदर्शिता को मेंटेन रखना बहुत मुश्किल है, जबकि न्याय का सिद्धांत है कि न्याय होना नहीं, होते हुए दिखना भी चाहिए। ऑनलाइन सुनवाई इस शर्त को पूरा नहीं करती।

अधिवक्ता गोपाल कुमार कहते हैं, '60 प्रतिशत वकीलों के पास ऑनलाइन सुनवाई के लिए न तो तकनीकी संसाधन हैं और न ही दक्षता।'

बकौल अधिवक्ता राम मूर्ति प्रसाद सिंह, 'कोरोना की आड़ में सभी संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया गया है। कोर्ट नाम मात्र का ही खुला है, इसका कोई लाभ न तो वकीलों को हो रहा है और न मुवक्किलों को। मुश्किल से 1 प्रतिशत वकील हैं जो ऑनलाइन सुनवाई में खुद को सक्षम पाते हैं, इस लॉकडाउन में ऐसे वकीलों की आमदनी भी हुई ,लेकिन अधिकांश वकील ऑनलाइन सुनवाई की प्रक्रिया के लिए अभी तैयार नहीं है।'

जिला वकील संघ बेगूसराय के महासचिव संजीव कुमार कहते हैं, 'वकील ऑनलाइन सुनवाई के लिए सक्षम नहीं हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए ज़रूरी संसाधन नहीं हैं और वकील भी इसके लिए अपेक्षित दक्षता नहीं रखते। भौतिक रूप से पक्ष-विपक्ष के वकीलों और मुवक्क्लिों की मौजूदगी में सुनवाई का विकल्प ऑनलाइन सुनवाई कभी भी नहीं हो सकती।'

मुवक्क्लिों की बढ़ी भारी मुश्किलें

लॉकडाउन में दीवानी मामले पूरी तरह बंद रहे और फौज़दारी मामलों में भी कम ही सुनवाई हुई। अधिवक्ता वशिष्ट कुमार बताते हैं, 'दबंगों ने कमज़ोरों की ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और लॉकडाउन के कारण जरूरतमंदों को न्याय नहीं मिल पाया।'

अधिवक्ता मौली प्रसाद सिंह, अखिलेश्वर प्रसाद सिंह, गोपाल कुमार समेत कई अन्य वकीलों से बातचीत में ये बात प्रमुखता से उभरकर सामने आयी कि बेगूसराय में ज़मीनों का कारोबार करने वालों ने खूब अवैध कब्ज़े किये, धनबल और बाहुबल के धनी लोगों ने पुलिस से सांठगांठ करके ऐसे अपराधों को अंजाम दिया। दूसरी तरफ ऐसे कई मामले जिनमें किसी की जमानत होनी थी, लेकिन सुनवाई न हो पाने के कारण उन्हें जेलों में महीनों गुज़ारना पड़ा। कुछ तो अभी भी जेलों में सिर्फ़ इसलिए हैं कि समय पर उनके मामले की सुनवाई नहीं हो पाई है।

अधिवक्ता अखिलेश्वर प्रसाद दर्जन भर मुकदमों की सूची दिखाते हुए बताते हैं, कैसे लॉकडाउन के कारण इनकी सुनवाई नहीं हो पाई और सम्बंधित लोगों को बहुत नुकसान झेलना पड़ा। वहीं अधिवक्ता गोपाल कुमार कहते हैं कि जमानत के जो मामले 2020 की जनवरी और फ़रवरी में फाइल किये गये हैं, उनकी सुनवाई की अभी कोई डेट ही निश्चित नहीं हुई है।

गोपाल कुमार पटना हाईकोर्ट में भी कुछ मामले देखते हैं। कहते हैं पटना हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत के मामलों पर सुनवाई को फ़िलहाल रोक रखा है और हालत ये है कि 6-6 महीने पुराने मामलों पर अभी तक सुनवाई नहीं हो पाई है।

कोर्ट परिसर में ही खुशबू देवी से मुलाकात हुई, जिनकी शादी 2013 में गोरेलाल साहनी से हुई थी। खुशबू कहती हैं, वर्ष 2016 में उनको उनकी बेटी के साथ ससुराल पक्ष ने मारपीट कर घर से निकाल दिया। उन्हें दहेज़ के लिए लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। कोर्ट ने खुशबू देवी के भरण-पोषण के लिए पति को 4500 रूपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया, लेकिन पति ने कोई भुगतान नहीं किया। इसी बीच लॉकडाउन लग गया और खुशबू देवी फिर से कोर्ट की शरण नहीं ले सकीं। पूरे लॉकडाउन में उन्हें न तो ससुराल और न ही मायके से ही किसी तरह का आर्थिक सपोर्ट मिला। अब जब न्यायालय फिर से शुरू हुआ है तो कोर्ट ने खुशबू के पति गोरेलाल साहनी से 80 हज़ार रुपये की रिकवरी का आदेश दिया है।

रूबी का गुजारा भत्ता भी लॉकडाउन के कारण उसके पति ने नहीं दिया, जिस कारण बड़ी मुश्किल से वह अपनी रोटी का जुगाड़ कर पायीं

महज़ लॉकडाउन के कारण इस खुशबू और उनकी बेटी को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा, रोजी-रोटी की व्यवस्था भी मुश्किल से हो पायी।

इसी से मिलता-जुलता केस रूबी का भी है। रूबी का गुजारा भत्ता भी लॉकडाउन के कारण उसके पति ने नहीं दिया, जिस कारण बड़ी मुश्किल से वह अपनी रोटी का जुगाड़ कर पायीं। ऐसी न जाने कितनी रूबियों और खुशबूओं को इस अचानक लागू किये किये लॉकडाउन ने भारी आर्थिक संकट में डाल दिया, उन्हें भारी मानसिक अवसाद झेलना पड़ा। शासन-प्रशासन की तरफ से आज भी ऐसी कोई तैयारी दिखाई नहीं देती कि अगर फिर से कोरोना के कारण लॉकडाउन घोषित करना पड़े तो रूबी और खुशबू जैसी महिलाओं की मदद कैसे हो पायेगी।

एक बुज़ुर्ग महिला रानी देवी कोर्ट परिसर में महीनों से चक्कर लगा रही हैं, इनके जवान बेटे को पुलिस ने एक मामले में लॉकडाउन लगने से ठीक पहले ही गिरफ्तार किया था, अभी जमानत की कार्यवाही हो ही रही थी कि लॉकडाउन लग गया। लॉकडाउन के दौरान भी जमानत की कोशिश होती रही और अब लॉकडाउन में आंशिक छूट के बाद भी जमानत की कोशिश हो रही है, लेकिन केस से जुड़े कुछ दस्तावेज़ जो पुलिस विभाग से लॉकडाउन के दौरान कहीं खो गये हैं, उनके कारण जमानत की कार्यवाही नहीं हो पा रही है. ऐसे तकनीकी कारणों से भी न जाने कितने लोग जेलों में सड़ रहे हैं।

लिपिकों के हालात

बेगूसराय जिला कोर्ट में लगभग 2200 लिपिक हैं। अब जबकि कोर्ट में मुक़दमों की सुनवाई थोड़ी बहुत शुरू हुई है तो ये भी अपने काम पर लौटे हैं। लगभग 500 लिपिक अपने काम पर लौट आये हैं। लॉकडाउन के बाद इनकी आमदनी में कितना अंतर आया है, पूछने पर कहते हैं, पहले की तुलना में उनकी आमदनी 10 से 20 प्रतिशत के बीच हो रही है।

लॉकडाउन में कैसे काम चलाया? स्वाल के ज़वाब में अरुण कुमार महतो और कुछ दूसरे लिपिक कहते हैं, निर्माण कार्यों में मजदूरी करके रोटी का जुगाड़ किया। जिनके पास खेती है, उन्होंने अपने खेतों में काम किया और जिनके पास कुछ बचत थी, उन्होंने उससे काम चलाया। एक बड़ी संख्या ऐसे लिपिकों की भी है, जिन्होंने क़र्ज़ लेकर किसी तरह काम चलाया। और इनमें भी कई लोगों ने ब्याज पर क़र्ज़ लेकर 2 वक्त की रोटी का जुगाड़ किया।'

लॉकडाउन में लिये गये क़र्ज़ को कब तक चुका पायेंगे? कोर्ट के हालात को देखते हुए इनके पास इसका कोई उत्तर लिपिकों के पास नहीं है।

बृजनंदन सिंह 2005 से अधिवक्ता लिपिक के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए 35 हज़ार रुपये ब्याज पर उधार लिए हैं। ब्याज पर लिये कर्ज को इतने ज्यादा बिगड़ चुके आर्थिक हालातों में कब तक और कैसे चुकायेंगे? के जवाब में वो कहीं और ताकने लगते हैं, आंखें भर आती हैं।

अधिवक्ता लिपिकों का अपना संघ भी है। रणविजय कुमार कहते हैं, संघ की ओर से सरकार व चीफ जस्टिस से अधिवक्ता लिपिकों की आर्थिक मदद के लिए प्रार्थना की गयी थी, लेकिन इन्हें किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिली।

लिपिक मोहन कुमार उन दानदाताओं की सराहना करते हैं, जिन्होंने मुसीबत के दौर में उनके घरों में राशन पहुँचाया और जिनके कारण बहुत से लोग भुखमरी से बच गये।

एक और लिपिक मनीराम सिंह बात करते हुए आक्रोशित हो जाते हैं। शिकायत के साथ ही उनकी आँखों में बेबसी की नमी भी उतर जाती है। कहते हैं, 'वर्तमान सत्ताधारी पार्टी भाजपा से वो जनसंघ के ज़माने से जुड़े हैं, लेकिन लॉकडाउन में उन्होंने जो परेशानियाँ उठाई हैं, उसके कारण इस पार्टी से उनका मोहभंग हो गया है।'

लॉकडाउन में लिपिक मनीराम का लुट गया सबकुछ, गंभीर रूप से बीमार पत्नी को पटना अस्पताल ले गये तो 3 बार कर दिया क्वारंटीन, और इलाज के अभाव में लगातार बिगड़ती हालत से हो गयी मौत

लिपिक मनीराम सिंह आगे कहते हैं, 'लॉकडाउन के दौरान मेरी पत्नी बीमार थी, पहले स्थानीय चिकित्सकों को दिखाया। कोई राहत न मिली तो इलाज के लिए पटना PMCH लेकर आया। यहाँ आने के लिए कोरोनो प्रोटोकॉल के तहत हमें कई दिक्कतों से गुज़रना पड़ा। पटना पहुँचने पर बीमार पत्नी के साथ 14 दिन के क्वारंटीन में डाल दिया गया और ज़रूरी इलाज भी नहीं उपलब्ध कराया गया। 14 दिन बाद फिर से चिकित्सकों को दिखाया गया, तो दोबारा 14 दिन के क्वारंटीन में भेज दिया गया, ज़रूरी इलाज से मेरी पत्नी लगातार वंचित हो रही थी। मुझे उम्मीद थी कि इलाज मिलेगा, लेकिन जब फिर से 14 दिन के क्वारंटीन में डाल दिया गया और मेरी पत्नी की सेहत लगातार बिगड़ती रही तो मेरी हिम्मत जवाब देने लगी और मैं अपनी पत्नी को घर ले आया। मरीज़ को घर ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस दी जाती है, लेकिन हमें यह सुविधा भी नहीं मिली। प्राइवेट एम्बुलेंस ने 10 हज़ार रुपये लेकर घर पहुंचाया। वहां से लौटने के 2 दिन बाद ही मेरी पत्नी का देहांत हो गया।'

आक्रोश और गुस्से से भरे मनीराम आगे कहते हैं, 'मेरा घर उजड़ गया। मैं बूढ़ा हूं और लगातार अपनी पत्नी के साथ रहा, लेकिन मुझे कोरोना या कोई अन्य बीमारी नहीं हुई, आखिर ऐसा क्या डर था, जिसके लिए बार-बार मेरी पत्नी को क्वारंटीन भेजा गया।'

कोर्ट परिसर के दुकानदारों की स्थिति

लॉकडाउन का भारी असर वैसे तो न्यायिक व्यवस्था से जुड़े वकील, मुंशी और मुवक्किलों सभी पर पड़ा है, लेकिन फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों पर इसका सबसे ज़्यादा असर हुआ है। इसका कारण है बाकी सबके पास कोई न कोई जमापूंजी कम या ज़्यादा थी, लेकिन इस वर्ग का के पास ऐसा कोई सपोर्ट नहीं नहीं था, इसलिए लॉकडाउन में सबसे ज्यादा आर्थिक किल्लतों से इसी वर्ग को जूझना पड़ा।

बेगूसराय कोर्ट परिसर में चाय बेचने वाले एक शख्स ने आत्महत्या कर ली थी। वकीलों से बातचीत में ही पता चला कि चाय बेचने वाले ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर ली थी। हालांकि जब जनज्वार टीम किसी तरह से मृतक के छोटे भाई से संपर्क करने में कामयाब हुई तो वह आत्महत्या की बात से मुकर गया, शायद उस पर कोई दबाव रहा हो। उसने बताया कि हार्टअटैक के कारण उसके भाई की मौत हुई थी।

कोर्ट परिसर के दर्जनों वकीलों ने इस बात की पुष्टि की चायवाले ने आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाने के कारण यानी 2 वक्त की रोटी का भी जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण मौत को गले लगाया था।

उसके साथ ही चाय बेचने वाले धरम महतो कहते हैं, 'वो लगातार तनाव में था, परिवार के खर्चे नहीं निकल पा रहे थे, क़र्ज़ भी हो गया था, उसने आत्महत्या ही की होगी। हालांकि धरम महतो थोड़ा डरकर यह भी कहते हैं, ​हो सकता है तनाव में उसे हार्ट अटैक आ गया हो।' जो भी हो, मौत हार्ट अटैक से हुई हो या उसने आत्महत्या की हो, लेकिन कारण लॉकडाउन में रोटी रोज़ी का संकट ही था।

धरम महतो परिसर में लगभग 25 साल से दुकान लगाते हैं। कहते हैं लॉकडाउन में उनकी हालत एक समय बहुत खराब हो गयी थी, तब एक वकील साहब ने 20 हज़ार रुपये से उनकी मदद की थी, जिससे वह उबर पाये।

कोर्ट परिसर में एक महिला जगवंती से मुलाकात हुई, वो सब्जी और फल का ठेला लिए हुए खड़ी थीं, ठेले पर सामान भी बहुत कम था। जगवंती कहती हैं, 'लॉकडाउन से पहले मेरा बेटा दुकान लगाता था, हमारी हालत अच्छी थी, लेकिन अब वो बीमार है।' बेटे को क्या बीमारी है ये तो वह नहीं बता पायीं, लेकिन निवेदन करती हैं कि हम कुछ ऐसा करें, जिससे उनके बेटे का इलाज हो जाये। जगवंती के पास इतना पैसा नहीं है कि बेटे का इलाज हो सके। वो किसी तरह बस इतना ही कमा पाती हैं कि वो बेटे के साथ किसी तरह जी सकें। बीमार पड़ा युवक जगवंती का इकलौता बेटा है।

कोर्ट परिसर में फल और सब्जी का ठेला लगाने वाली बुजुर्ग जगवंती, बेटे के इलाज के लिए हर किसी से लगा रहीं गुहार

कोर्ट परिसर में ही हमारी मुलाकात अर्जुन कुमार महतो से हुई। लॉकडाउन से पहले अर्जुन गेट और ग्रिल बनाने का काम करते था। लॉकडाउन में काम बंद हो गया तो कोर्ट परिसर में चाय बेचना शुरू कर दिया। अर्जुन महतो कहता है, खर्चा भी मुश्किल से निकलता है।

कोर्ट परिसर में ही कुछ फोटोकॉपी करने वाले कुछ दुकानदारों से भी बात हुई। ऑन कैमरा सिर्फ़ पुनपुन सिंह और चन्द्र शेखर कुमार बात करने को राजी हुए। फोटोकॉपी करने वाले ज़्यादातर लोगों पर क़र्ज़ चढ़ा हुआ है और ये क़र्ज़ भी साहूकार या किसी परिचित से ब्याज पर लिया गया है। कोर्ट में काम शुरू हो गया है, लेकिन अभी इतनी आमदनी नहीं है कि घर का काम ठीक से चल सके। कुछ लोगों ने "हम किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहते" कहकर बात करने से साफ इंकार कर दिया।

स्टेशनरी का सामान बेचने वाला एक दुकानदार यह कहकर बात करने से मना कर देता है कि अगर वकील या कोई सरकारी कर्मचारी नाराज़ हुआ तो उसे अपनी दुकान हटानी पड़ जायेगी।

बढ़ा अपराध का ग्राफ, भूमाफियाओं की पौ बारह

अधिवक्ता आलोक कुमार मानते हैं कि कोर्ट के सामान्य रूप से संचालन में बाधा उत्पन्न होने से कई प्रकार के अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। कहते हैं, 'भू-माफियाओं ने ग़लत तरीके से ज़मीने कब्जायी हैं और दूसरे दबंग लोगों ने भी ऐसा किया है। कमज़ोर लोग जिनकी इस सूरत में कोर्ट से मदद हो सकती थी, नहीं हुई है। अब वो मामले अगर कोर्ट में आते भी हैं तो कब्जाधारियों के खिलाफ़ कोर्ट का फैसला आने में ही सालों लग जायेंगे, ऐसे में ये साफ़ दिखाई देता है कि लॉकडाउन के कारण लोग न्याय से वंचित हुए हैं।'

अधिवक्ता गोपाल कुमार सरकार और प्रशासन दोनों के प्रति नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहते हैं, 'लॉकडाउन के दौरान आपराधिक गतिविधियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, लेकिन पुलिस प्रशासन इनके प्रति लापरवाह है। थानों में FIR दर्ज नहीं होती, ताकि अपराध रेट कम दिखाया जा सके। थाने पर समस्या का समाधान न होने के कारण लोग कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हैं और जब कोर्ट इस सम्बन्ध में आदेश देती है तो उस आदेश पर पुलिस अमल नहीं करती।

जिला अधिवक्ता संघ के महासचिव संजीव कुमार कहते हैं कि दबंगों ने पुलिस के साथ मिलकर बहुत से अपराधों को अंजाम दिया, खासतौर पर ज़मीने हड़पने के बहुत से मामले सामने आये हैं और चूँकि दीवानी मामलों में सुनवाई बंद थी, इसलिए ऐसे पीड़ितों को न्याय भी नहीं मिल पाया।

लॉकडाउन में घरेलू हिंसा

लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की तमाम घटनायें दबकर रह गयीं। यह कहकर बात हल्के में टालने की कोशिशें हुईं कि सभी लोग घरों में हैं तो उनके बीच असहमतियों के कारण घरेलू हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन अधिवक्ता इंदु कुमारी और स्मृति कुमारी इससे अलग राय रखती हैं।

वे दोनों कहती हैं, घरेलू हिंसा का कारण आर्थिक है, लोग घरों में तो बैठ गये, लेकिन उनके खर्चे कम तो हुए नहीं उलटे बढ़ गये और आमदनी कम या बंद हो गयी। ऐसे में परिवार के सदस्य आपस में उलझने लगे। अगर लोगों की आमदनी नहीं घटती या नहीं बंद होती तो ये नौबत नहीं आती। स्मृति कुमारी कहती हैं कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान एक संस्था से जुड़कर ऑनलाइन घरेलू हिंसा के मामलों में काउसलिंग की है और खुद घर में रहने के दौरान जो कुछ अनुभव किया है उसके आधार पर कह सकती हैं कि घरेलू हिंसा बढ़ने का बड़ा आधार आर्थिक किल्लतें रही हैं।

लॉकडाउन ने वकालत के पेशे से जुड़े हर इंसान को किया तबाह

वकीलों की नाराज़गी

अधिवक्ता वशिष्ट कुमार राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के दुरुपयोग से नाराज़ हैं। ऐसे दर्जनों वकीलों ने इस कानून के दुरुपयोग से नाराज़गी जताई और कई ने तो शासन-प्रशासन के प्रति अपने रुख का इज़हार महज़ इसलिए नहीं किया कि उन पर देशद्रोह या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्यवाही हो सकती है।

दीपक सिन्हा कहते हैं, भारत की जनता अत्यधिक सहनशील है, लॉकडाउन के दौरान इस जनता ने पुलिस की पिटाई का सामना किया, लेकिन इसके खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई, किसान आन्दोलन भी इतने दिनों से चल रहा है, सरकार सुन नहीं रही है लेकिन देश की जनता सहनशील बनी हुई है। जनता की इस हालत के लिए दीपक सिन्हा मीडिया के सरकार समर्थक रुख को जिम्मेदार मानते हैं और कहते हैं कि मीडिया ने जनता को कंफ्यूज कर रखा है।

अधिवक्ता दीपक कुमार साहू कहते हैं कि कोरोना काल में जिस तरह पूरे देश को बंद कर दिया गया, इसकी कोई जरूरत नहीं थी। हमारी सरकार आपदाकालीन परिस्थितियों से निबटने के लिए तैयार नहीं रहती है। वो न्यायिक प्रशासन से भी नाराज़ हैं और कहते हैं हायर कोर्ट के जज का आम वकीलों से कोई संपर्क नहीं है, वो अत्याधुनिक सुविधाओं में रहते हैं, इसलिए आम वकीलों के दर्द को नहीं समझते।

कुल मिलाकर लॉकडाउन ने वकालत से जुड़े लोगों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा कर दिया, जिसे खुलेआम नहीं तो दबी जुबान से सभी वकील स्वीकार करते हैं।

(यह रिपोर्ट ठाकुर फैमिली फाउंडेशन द्वारा समर्थित एक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। ठाकुर फैमिली फाउंडेशन ने इस प्रोजेक्ट पर किसी तरह का कोई संपादकीय नियंत्रण नहीं रखा है।)

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