पर्यावरण

PM मोदी के स्मार्टसिटी के दावों के बीच प्रदूषण से जूझते देश के खस्ताहाल शहर

Janjwar Desk
13 Nov 2022 9:15 AM GMT
PM मोदी के स्मार्टसिटी के दावों के बीच प्रदूषण से जूझते देश के खस्ताहाल शहर
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PM मोदी के बनारस रूपी ‘क्योटो’ में करोड़ों रुपये की हेरिटेज लाइट्स बर्बाद, कौन देगा जवाब (file photo)

दुनिया जिन देशों के शासकों को तानाशाह, निरंकुश या फिर राजशाही के तौर पर जानती है, ऐसे देश भी भारत से बेहतर काम कर रहे हैं। पोलैंड 15वें, बेलारूस 24वें, हंगरी 25वें, क्यूबा 49वें, अज़रबैजान 55वें, ब्राज़ील 61वें, कोलंबिया 68वें, टर्की 70वें, यूनाइटेड अरब एमिरातेस 71वें, जॉर्डन 72वें, इजिप्ट 82वें, सऊदी अरब 98वें और फिलीपींस 103वें स्थान पर है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

Narendra Modi highlights smart cities, but our urban centres are overcrowded, have shoddy infrastructure and reel under all sorts of pollution. वर्ष 2014 से देश के प्रधानमंत्री कभी स्वच्छ भारत, कभी स्वच्छता सर्वेक्षण तो कभी स्मार्ट सिटी की बात कर रहे हैं, पर आजादी के अमृत महोत्सव काल में देश की राजधानी में कचरे के ढेर के ऊपर नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं। यही वास्तविक न्यू इंडिया है, जहां हरेक क्षेत्र में असफल सरकारी तंत्र बस जुमले गढ़कर देश की दशा और दिशा तय करता है।

जैसे नोटबंदी से काला धन और आतंकवाद समाप्त हो गया, ठीक उसी तरह से स्वच्छ भारत के नारे से देश साफ़ हो गया। दरअसल हमारे शहरों का माहौल ऐसा हो चुका है, जहां बसकर संविधान द्वारा दिया गया "जीवन का अधिकार" भी बेमानी लगता है। शहरों में जब जीवन भी दुश्वार है, तब प्रधानमंत्री हरेक मंच से "इज ऑफ़ लाइफ" का नारा देने लगे हैं। पूरा देश और तथाकथित विकास इन्हीं नारों और वादों पर टिका है, जीवन स्तर सुधारने वाला विकास गाँव तक पहुंचता नहीं और हमारे शहर खोखले होते जा रहे हैं।

हमारे शहर आवास, सार्वजनिक परिवहन, ट्रैफिक, लगातार बढ़ती आबादी, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, हरियाली, जल संसाधन, कचरे और तमाम तरह के प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। सरकार इन समस्याओं को सुलझाने के बदले नए नारे गढ़ती है, और शहरी निकाय अब तो राष्ट्रीय राजनीति का अड्डा बन गए हैं। शहरी निकायों के चुनाव में भी प्रधानमंत्री के पोस्टरों से शहर पाट दिया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस वर्ष 15 नवम्बर को पृथ्वी की कुल आबादी 8 अरब पार कर जायेगी और वर्ष 2050 तक यह आबादी 9.7 अरब तक पहुँच जायेगी। इस समय दुनिया की कुल आबादी का 55 प्रतिशत शहरों में रहता है, पर वर्ष 2050 तक 68 प्रतिशत आबादी शहरी होगी। अगले 30 वर्षों के दौरान, दुनिया के शहरों में सम्मिलित तौर पर 2.5 अरब लोग बढेंगे, और शहरी जनसंख्या में यह वृद्धि सबसे अधिक एशिया और अफ्रीका के शहरों में होगी।

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि वर्ष 2018 से 2050 के बीच दुनिया के शहरों की आबादी 35 प्रतिशत तक बढ़ जायेगी, और सबसे अधिक आबादी भारत के शहरों में बढ़ेगी। इस दौरान भारत के शहरों की आबादी लगभग 42 करोड़ बढ़ जायेगी, जबकि चीन में 26 करोड़ और तीसरे स्थान पर नाइजीरिया में 19 करोड़ बढ़ेगी।

मुंबई की आबादी पिछले 30 वर्षों के दौरान 80 लाख से भी अधिक बढ़ चुकी है और वर्ष 2035 तक 70 लाख नए लोग इस आबादी में जुड़ चुके होंगे। यहाँ की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी झुगी-झोपडी में या फिर अस्थाई आवासों में बसती है। दिल्ली में वायु प्रदूषण का प्रभाव इस कदर है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल, लांसेट, में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली में वर्ष 2019 के दौरान वायु प्रदूषण के कारण 17500 असामयिक मौतें दर्ज की गईं।

चेन्नई में वर्ष 2019 की गर्मियों के दौरान सभी जल संसाधन सूख गए थे, तो दूसरी तरफ थोड़ी सी बारिश भी इस शहर को जलमग्न कर देती है। झीलों के शहर बंगलुरु में झील में पानी विषैला हो जाता है, और शहर का विकास इतना अनियोजित किया गया है कि बारिश के मौसम में यह शहर कई बार बाढ़ की चपेट में आता है। बंगलुरु के अनियोजित विकास ने यहाँ की ट्रैफिक व्यवस्था को भी डराने वाला कर दिया है। हैदराबाद को व्यवस्थित शहर कहा जाता है, पर यहाँ भी साल-दो साल में बाढ़ का नजारा देखने को मिल ही जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत की आबादी 1.4 अरब है, और वर्ष 2060 तक यह 1.7 अरब तक पहुँच जायेगी। हमारे देश की लगभग आधी आबादी शहरों में रहती है और शहरों में रहने वाली आधी से अधिक आबादी झुगी-झोपडी या फिर अस्थाई आवासों में रहती है।

इन्टरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार वर्ष 2040 तक देश की शहरी आबादी में 27 करोड़ की बृद्धि हो जायेगी। जाहिर इस शहरों की बढ़ती आबादी का असर जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों पर भी पड़ेगा, क्योंकि बढ़ती आबादी के कारण उर्जा और वाहनों के इंधनों की खपत बढ़ेगी। इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के बढ़ने के कारण स्टील और कंक्रीट की खपत भी बढ़ेगी, जिनके उत्पादन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।

प्रधानमंत्री जी के विकास का आलम यह है कि सतत विकास रिपोर्ट 2021 के अनुसार सतत विकास के सन्दर्भ में भारत कुल 165 देशों में 120वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट को सस्टेनेबल डेवलपमेंट सोल्यूशन नेटवर्क, बेर्तेल्स्मन स्तिफ्तुंग और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा संयुक्त तौर पर प्रकाशित किया जाता है। वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों ने अगले 15 वर्षों तक, यानि वर्ष 2030 तक, के लिए विकास के लक्ष्य निर्धारित किये थे।

इसमें मुख्य रूप से 17 लक्ष्य है – (1) गरीबी उन्मूलन, (2) भूखमरी समाप्त करना, (3) बेहतर स्वास्थ्य, (4) बेहतर शिक्षा, (5) लैंगिक समानता, (6) साफ़ पानी और स्वछता, (7) सबके लिए और स्वच्छ ऊर्जा, (8) योग्यता के अनुरूप रोजगार और आर्थिक विकास, (9) उद्योग, अनुसन्धान और इंफ्रास्ट्रक्चर, (10) असमानता में कमी, (11) पर्यावरण अनुकूल शहर और समाज, (12) पर्यावरण अनुकूल खपत और उत्पादन, (13) जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयास, (14) जलीय जीवन, (15) पृथ्वी पर जीवन, (16) शान्ति, न्याय और सशक्त सैवाधानिक संस्थाएं, और (17) इन बिन्दुओं को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

दुनिया जिन देशों के शासकों को तानाशाह, निरंकुश या फिर राजशाही के तौर पर जानती है, ऐसे देश भी भारत से बेहतर काम कर रहे हैं। पोलैंड 15वें, बेलारूस 24वें, हंगरी 25वें, क्यूबा 49वें, अज़रबैजान 55वें, ब्राज़ील 61वें, कोलंबिया 68वें, टर्की 70वें, यूनाइटेड अरब एमिरातेस 71वें, जॉर्डन 72वें, इजिप्ट 82वें, सऊदी अरब 98वें और फिलीपींस 103वें स्थान पर है। हमारे देश का बेहतर प्रदर्शन केवल जलवायु परिवर्तन रोकने के उपायों में रहा है।

जिन मामलों में हम दुनिया के निकृष्ट देशों के साथ खड़े हैं, वे हैं – बेहतर जीवन स्तर, शिक्षा, कार्यस्थल पर लैंगिक समानता, अनुसन्धान और विकास में खर्च, झुग्गियों में बसने वाली शहरी आबादी, वायु प्रदूषण में पीएम2.5 का स्तर, स्वच्छ जल आपूर्ति और प्रजातियों का विनाश। इसके अतिरिक्त बिना आरोप के जेल में बंद कैदी, सामाजिक सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और प्रेस की आजादी के सन्दर्भ में भी हम दुनिया के पिछड़े देशों के साथ खड़े हैं।

हमारे शहरों की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण ग्रामीण क्षेत्रों की लूट से जुड़ा है। शहर सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों की मानव श्रम शक्ति को लूटते हैं, और फिर एक-एक कर उनके संसाधनों को निगल लेते हैं। शहरों के विकास के लिए ग्रामीण आबादी शहर पहुँचती है, शहरों का जितना विकास होते है उतने ही अधिक श्रमिक गाँव से आते हैं। बढ़ती श्रमिक आबादी शहरों का विकास तो करती है, पर शहर उन्हें रहने के लिए सुविधा विहीन झुग्गी-झोपडी देते हैं। शहर की आबादी बढ़ती है तो पानी के मांग बढ़ती है, यह पानी भी सुदूर ग्रामीण इलाकों से आता है। पानी की आपूर्ति बढ़ती है तो गंदे पानी की मात्रा भी बढ़ती है।

एक अनुमान के अनुसार देश के शहरों से उत्पन्न कुल गंदे पानी में से 70 प्रतिशत से भी अधिक बिना किसी उपचारण या शोधन के ही नदियों, झीलों या जमीन पर मिल जाता है। धीरे-धीरे शहर के आसपास के जल संसाधन प्रदूषित और विषैले हो जाते हैं, और शहर सुदूर गावों का पानी लूटना शुरू करते हैं। शहरों के विकास के साथ आवास, परिवहन, बिजली घर और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बढ़ती जाती हैं और साथ ही वायु प्रदूषण और कचरा भी बढ़ता है।

शहरों के विकास का सबसे दुखद पहलू यह है कि इनके विकास के आधारभूत स्तम्भ झुग्गी-झोपडी से आगे नहीं बढ़ पाते, और शहर में झुग्गी-झोपडी एक धब्बा मानकर कभी भी उजाड़ दी जाती हैं। शहरी गरीबी का स्तर भी देश की सामान्य गरीबी से अधिक है।

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