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आतंकियों का साथ देने वाले दविंदर सिंह को जमानत और गुजरात दंगों में मोदी पर सवाल उठाने वाले संजीव भट्ट को उम्रकैद

Janjwar Desk
22 Jun 2020 8:44 AM GMT
आतंकियों का साथ देने वाले दविंदर सिंह को जमानत और गुजरात दंगों में मोदी पर सवाल उठाने वाले संजीव भट्ट को उम्रकैद

दविंदर सिंह पर 90 के दशक से आरोप लगते रहे हैं। हर बार उनकी गतिविधियों के खिलाफ जांच बैठाई गई और क्लीन चिट दी गई। इसके साथ उनको प्रमोशन भी मिलते चले गए। कई महत्वपूर्ण जगहों पर भी उनकी तैनाती की गई....

जनज्वार ब्यूरो। इस समय तक जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेना के बीच खूनी संघर्ष की घटना सुर्खियों में थी तभी दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व डीएसपी दविंदर सिंह को जमानत दे दी। दविंदर सिंह को एक लाख के निजी मुचलके पर जमानत दी गई। ये वही दविंदर सिंह हैं जिनपर आतंकियों के साथ सांठ-गांठ का गंभीर आरोप है। दविंदर सिंह को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के दो आतंकियों के साथ गिरफ्तार किया गया था।

यही नहीं दविंदर सिंह पर संसद पर हुए साल 2001 के हमले में भूमिका निभाने का भी आरोप लग चुका है। दरअसल संसद हमले के दोषी अफजल गुरू ने खुद कोर्ट में दविंदर सिंह का नाम लिया था। बाद में 2013 में आतंकी अफजल गुरू को फांसी दे दी गई थी। अफजल गुरू ने अपने वकील (सुप्रीम कोर्ट) को एक पत्र लिखा था कि अगर जेल से रिहाई हो भी गई तो भी दविंदर सिंह उन्हें परेशान करते रहेंगे। दविंदर ने मुझे एक विदेशी चरमपंथी को दिल्ली साथ ले जाने के लिए मजबूर किया, फिर उन्हें एक रूम किराए पर दिलवाने और पुरानी कार ख़रीदने के लिए कहा।

दविंदर सिंह कश्मीर के पुलवामा जिले के त्राल के रहने वाले हैं जिसे घाटी में आतंकियों का गढ़ माना जाता है। दविंदर सिंह पर नब्बे के दशक से आरोप लगते रहे हैं। हर बार उनकी ्गतिविधियों के खिलाफ जांच बैठाई गई और क्लीन चिट दी गई। इसके साथ उनको प्रमोशन भी मिलते चले गए। यही नहीं दविंदर सिंह को कई महत्वपूर्ण जगहों पर भी तैनाती दी गई। जब उनके खिलाफ जांच चल रही थी तब भी उन्हें कई संवेदनशील जगहों पर तैनाती दी गई। खराब रिकॉर्ड के बावजूद उन्हें साल 2003 में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के साथ पूर्वी यूरोप भेजा गया। यही नहीं उन्हें रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले एयरपोर्ट पर एंटी हाईजैकिंग विंग में भी तैनात किया गया।

एक ऐसा शख्स जिसका ट्रैक रिकॉर्ड इतने सवालों से घिरा हो उसे जमानत कैसे मिल गई। दरअसल दिल्ली पुलिस 90 दिन बाद भी आरोप पत्र दाखिल नहीं पायी। दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के अधीन काम करती है इसलिए सरकार पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण इस मामले पर लिखते हैं, 'सरकार की आंख के तारे दविंदर सिंह को जमानत मिलने पर कोई शक नहीं होता है। यह वही है जो खूंखार हिजबुल आतंकियों के साथ 26 जनवरी से ठीक पहले दिल्ली रवाना होते हुए गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने इसे जानबूझकर जाने दिया है। इससे गंभीर सवाल उठते हैं कि क्या वह सरकार के इशारे पर काम कर रहा था। क्या यह ध्यान भटकाने का कोई विफल तरीका है?' इसके साथ ही भूषण ने पुलवामा हमले की जांच की भी मांग की है।

वहीं दूसरी ओर इन बीते सालों में कई ऐसे लोगों को सलाखों के पीछे डाला गया है जो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते थे। सरकार की नीतियों की आलोचना करते थे। सीएए विरोधी आंदोलनों में सक्रिय रही जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी की शोध छात्रा सफूरा जरगर पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तिहाड़ जेल में रखा गया है। बावजूद इसके कि वह गर्भवती हैं और कोरोना महामारी का एक अनिश्चित समय चल रहा है। भीमा कोरेगांव की हिंसक के नाम पर कई वामपंथी बुद्धिजीवियों, लेखकों, कवियों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया।

खैर अभी बात पुलिस महकमे की है तो पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट का नाम कैसे छूट सकता है। संजीव भट्ट इस समय 30 साल पुराने 1990 के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। उन्हें गुजरात की जामनगर की एक अदालत ने यह उम्रकैद की सजा सुनाई थी। 1990 में जब संजीव भट्ट जामनगर में एएसपी के पद पर तैनात थे। उस समय जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को रोका गया तो उन्हें गिरफ्तार किया गया।

इसके बाद भारत बंद का आह्वाहन किया गया तो कई जगहों पर दंगे भी भड़के। इसके साथ दंगा करने वालों ने कई जगहों पर आगजनी भी शुरू कर दी। इसके बाद 133 लोगों को टाटा कानून के तहत हिरासत में लिया गया। इनमें एक 39 वर्षीय प्रभुदास मानधवजी वैशनानी भी थे। हालांकि इन 133 लोगों में से अधिकांश आरोपियों से इस कानून को वापस ले लिया गया।

इसके बाद माधवजी वैशनानी की तब मौत हो गई जब वह पुलिस की हिरासत में थे। उनके बड़े भाई अम्रुतभाई ने शिकायत दर्ज कराई जबकि संजीव भट्टी की पत्नी कहती हैं कि गिरफ़्तार किए गए 133 लोगों में मृतक और उसका भाई, संजीव भट्ट या उनके स्टाफ़ की हिरासत में नहीं थे। इनमें से किसी से भी संजीव भट्ट या उनके स्टाफ़ ने पूछताछ नहीं की थी। श्वेता के मुताबिक अम्रुतलाल माधवजी वैश्नानी ने शिकायत दर्ज कराई थी वे विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी के सक्रिय सदस्य भी थे।

संजीव भट्ट की परेशानियां यहीं खत्म नहीं होती हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) और अमित शाह का जैसे जैसे राजनीतिक कद बढ़ता गया, संजीव भट्ट के लिए मुश्किलें बढ़ती गईं। संजीव भट्ट ने गुजरात दंगों (2002) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ हलफनामा दायर कर दिया था।

इस हलफनामे में उन्होंने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पुलिस अधिकारियों से बैठक में भाग लेने का दावा किया। जिसमें उन्होंने दावा किया कि मोदी ने शीर्ष पुलिस अधिकारियों को कथित तौर पर कहा कि हिंदुओं को मुस्लमानों के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने दें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने निष्कर्ष निकाला कि भट्ट इस बैठक में शामिल नहीं हुए और उनके आरोपों को खारिज कर दिया गया। हालांकि 2011 में भट्ट ने हलफनामे में विशेष जांच दल पर गुजरात दंगों की सच्चाई छिपाने का आरोप लगाया। 13 अक्टूबर 2015 को देश की सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल पर लगाए गए आरोप को आधारहीन बता दिया।

बता दें कि दिसंबर 1999 से सितंबर 2002 तक संजीव भट्ट गांधीनगर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो में उपायुक्त (इंटेलीजेंस) के पद पर रह चुके हैं। उन पर गुजरात की आंतरिक, सीमा, तटीय और अहम प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का जिम्मा तो था ही, साथ ही गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा भी उनके ही हाथों में थी।

2002 दंगों के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं के समूह ने एक ट्रिब्यूनल का गठन किया। तब इस ट्रिब्यूनल को गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पांड्या ने भी बताया था कि गोधरा हादसे के बाद मुख्यमंत्री आवास पर नरेंद्र मोदी ने एक बैठक बुलाई थी। बैठक में मोदी ने पुलिस अधिकारियों से कहा कि हिंदुओं को अपना गुस्सा उतारने का मौका देना चाहिए। इस बैठक में शामिल पुलिस अफसरों में संजीव भट्ट भी थे।

गुजरात दंगों के 9 साल बाद 14 अप्रैल 2011 को भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और यही आरोप लगाए थे। पूर्व गृह मंत्री अमित शाह ने हरेन पंड्या हत्या मामले में महत्वपूर्ण सबूतों को नष्ट करने के लिए दबाव डाला था। 20 जून 2019 को भट्ट को 1990 के हिरासत में प्रभुदास की मौत के मामले में गिरफ्तार किया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। बहरहाल संजीव भट्ट खुद दो ताकतवर नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह से संघर्ष की कहानी बनकर रह गए हैं।

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