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जम्मू: परम्परागत मक्के की खेती छोड़ लैवेंडर के फूल उगा रहे किसान, चार गुना से अधिक बढ़ा मुनाफा

Janjwar Desk
14 April 2021 10:49 AM GMT
जम्मू: परम्परागत मक्के की खेती छोड़ लैवेंडर के फूल उगा रहे किसान, चार गुना से अधिक बढ़ा मुनाफा
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जम्मू की महिला किसानों में लैवेंडर की खेती बहुत लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि इससे उन्हें गाँव के बाहर नहीं जाना पड़ता। इसके सूखे फूल फूल बेचने वाले खरीदते हैं, तेल सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग वाले खरीदते हैं और तेल निकालने के बाद जो ठोस अपशिष्ट बचाता है उसे साबुन और रूम-फ्रेशनर उद्योग वाले खरीदते हैं.....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

जम्मू के कुछ जिलों के किसान, जो परम्परागत तौर पर मक्के की खेती करते थे, अब बड़े पैमाने पर लैवेंडर के फूल उगा रहे हैं। लैवेंडर की खेती से किसानों का मुनाफा चार-गुना से अधिक बढ़ गया है और सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत भी नहीं होती। जम्मू के डोडा, किश्तवार और राजौरी जिलों के अनेक गाँव में बड़े पैमाने पर लैवेंडर की खेती की जा रही है और इसमें मदद के लिए भारत सरकार के इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च और काउंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च भी सामने आ रहे हैं। इस वर्ष डोडा जिले के लहरोते गाँव के किसान 43 वर्षीय भारत भूषण को लैवेंडर की खेती और इसे बढ़ावा देने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च का पुरस्कार भी दिया गया है। यह पुरस्कार खेती में अभिनव प्रयोग के लिए दिया जाता है।

भारत भूषण ने वर्ष 2010 में ही लैवेंडर की खेती छोटे पैमाने पर शुरू की थी और अब उनसे प्रोत्साहन लेकर आसपास के 30 गाँव के 200 से अधिक किसान इसकी खेती कर रहे हैं। इस काम में उनकी मदद जम्मू स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटीग्रेटेड मेडिसिन ने की थी। भारत भूषण के अनुसार पहले जब वे मक्के की खेती करते थे, तब सिंचाई के लिए पानी की बहुत जरूरत होती थी, पर लैवेंडर में सिंचाई की जरूरत कम होती है, इसपर सूखे की मार नहीं पड़ती, यह अपेक्षाकृत खराब मिटटी में आसानी से पनपता है और इससे उनकी आमदनी चार-गुना से भी अधिक बढ़ गयी है। इसके लिए उन्हें महंगे रासायनिक उर्वरक भी नहीं खरीदने होते, बल्कि वे उर्बरक के नाम पर गोबर का उपयोग करते हैं।

जाहिर है, जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब बारिश कम होती जा रही है और सिंचाई के दूसरे साधन भी सूख रहे हैं, लैवेंडर एक बेहतर विकल्प है। भारत भूषण ने 500 किसानों का एक स्वयं-सहायता समूह भी स्थापित किया है और दो नर्सरी भी स्थापित की हैं जहाँ लैवेंडर के पौधे उपलब्ध कराये जाते हैं। भारत भूषण ने अपने गाँव में ही लैवेंडर का तेल निकालने के लिए एक डिस्टिलेशन इकाई भी स्थापित की है। इसके तेल की मांग सौन्द्रर्य प्रसाधन उद्योगों में बहुत है।

जम्मू की महिला किसानों में लैवेंडर की खेती बहुत लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि इससे उन्हें गाँव के बाहर नहीं जाना पड़ता। इसके सूखे फूल फूल बेचने वाले खरीदते हैं, तेल सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग वाले खरीदते हैं और तेल निकालने के बाद जो ठोस अपशिष्ट बचाता है उसे साबुन और रूम-फ्रेशनर उद्योग वाले खरीदते हैं। इन उत्पादों की मांग बहुत अधिक है और उद्योग वाले गाँव में आकर ही उत्पाद खरीदते हैं इसलिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


जम्मू में लैवेंडर की खेती की सफलता से प्रभावित होकर काउंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ने वर्ष 2016 में अरोमा मिशन की स्थापना की, जिसके तहत किसानों को लैवेंडर, रोजमेरी, लेमनग्रास और अश्वगंधा की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके तहत किसानों को फसल उगाने के लिए कटिंग उपलब्ध कराई जाती है, 50 किसानों के एक समूह पर डिस्टिलेशन इकाई स्थापित की जाती है, डिस्टिलेशन इकाई से निकले तेल के गुणवत्ता की जांच की जाती है और बाजार उपलब्ध कराया जाता है।

लैवेंडर मूलतः यूरोप का पौधा है, पर अब इसकी बड़े पैमाने पर खेती अपने देश के पहाडी क्षेत्रों में की जाने लगी है। वर्ष 2017 में देश की कृषि से सम्बंधित 5 प्रयोगशालाओं ने देश के 6000 हेक्टेयर क्षेत्र में 20 औषधीय और खुशबू वाले पौधों के खेती की योजना शुरू की थी। इसमें से सबसे कामयाब और किसानों में लोकप्रिय लैवेंडर ही है। लैवेंडर की एक हेक्टेयर खेती से 30 से 45 लीटर तेल प्राप्त किया जा सकता है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है की जम्मू और कश्मीर के अनेक सेब उत्पादक से के बगान के चारों तरफ लैवेंडर की खेती करने लगे है और सेव से अधिक मुनाफा लैवेंडर से कम रहे हैं। जम्मू और कश्मीर से प्रभावित किसान अब उत्तराखंड, असम और नागालैंड में भी लैवेंडर की खेती कर रहे हैं।

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