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जनज्वार विशेष

जलवायु आपातकाल 2019 का सबसे प्रचलित शब्द

Prema Negi
22 Nov 2019 7:04 AM GMT
जलवायु आपातकाल 2019 का सबसे प्रचलित शब्द
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file photo

जलवायु परिवर्तन के तमाम प्रभावों के बाद भी हमारी पीढ़ी अपनी आदतों में बदलाव करने को तैयार नहीं है जबकि हमें भी पता है कि हम जो आज कर रहे हैं उसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ना तय है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

क्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने “जलवायु आपातकाल” को इस वर्ष का सबसे प्रचलित शब्द घोषित किया है। इसके अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में जलवायु आपातकाल के उपयोग में 100 गुणा से भी अधिक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। जलवायु आपातकाल एक ऐसी स्थिति है जिसमें जलवायु परिवर्तन को रोकने या फिर कम करने की तत्काल आवश्यकता है, जिससे इसके कारण होने वाले प्रभावों को कम किया जा सके।

नेक भाषाविदों ने यह सवाल उठाया कि यह एक शब्द नहीं बल्कि दो शब्द है, पर दूसरे भाषा विशेषज्ञों के अनुसार यह एक शब्द है जिसके दो हिस्से है और आमतौर पर “हार्ट अटैक” या फिर “फेक न्यूज़” जैसे शब्द एक ही शब्द मान लिए जाते हैं।

लवायु परिवर्तन किस हद तक पहुँच गया है, “जलवायु आपातकाल” का वर्ष 2019 का शब्द माना जाना ही बता देता है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष इसका इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि की तुलना में भी अधिक किया गया है। दरअसल जलवायु आपातकाल शब्द आपातकाल की एक नयी कड़ी है। इससे पहले राजनीतिक आपातकाल और स्वास्थ्य आपातकाल की ही चर्चा की जाती थी। आपातकाल से जुदा इसका नजदीकी दावेदार स्वास्थ्य आपातकाल इस वर्ष रहा, पर इसकी चर्चा जलवायु आपातकाल की तुलना नेम एक-तिहाई भी नहीं की गयी।

लवायु आपातकाल इस वर्ष अनेक देशों और शहरों में घोषित भी किया गया। अप्रैल के महीने में स्कॉटलैंड में जलवायु आपातकाल घोषित किया गया, फिर मई के महीने में इंग्लैंड की संसद ने इसे इंग्लैंड में घोषित किया, इसके बाद कनाडा और फ्रांस में जलवायु आपातकाल घोषित किया गया और अभी हाल में ही ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में इसे घोषित किया गया।

हाल में ही दुनिया के 153 देशों के 11258 वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि को दुनिया के लिए आपातकाल घोषित कर दिया है और कहा है कि इसके ऐसे प्रभाव पड़ेंगे, जिसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते। इसमें भारत के 65 वैज्ञानिक भी शामिल हैं जो विभिन्न शोध संस्थानों और शिक्षण संस्थानों से जुड़े हैं। यह रिपोर्ट प्रसिद्ध विज्ञान जर्नल, बायोसाइंस, के नवीनतम अंक में “वर्ल्ड साइंटिस्ट्स वार्निंग ऑफ़ ए क्लाइमेट इमरजेंसी” शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इन वैज्ञानिकों ने पिछले 40 वर्षों के सम्बंधित आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद इस रिपोर्ट को प्रस्तुत किया है।

रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन रोकने में नाकाम सरकारों के विरुद्ध प्रदर्शनों की सराहना भी की गई है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आलम यह है कि जिस दिन यह रिपोर्ट सामने आयी ठीक उसी दिन संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड मेटेरिओलोजिकल आर्गेनाईजेशन ने बताया था कि इस वर्ष का अक्टूबर महीना इतिहास के किसी भी अक्टूबर महीने की तुलना में अधिक गर्म था।

स बीच सामाजिक मनोविज्ञानी अनेक अध्ययन कर रहे हैं, जिससे इस पीढ़ी को जो जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार है, को भावी पीढ़ी के लिए उत्तरदायी बनाया जा सके। समस्या यह है कि जलवायु परिवर्तन के तमाम प्रभावों के बाद भी हमारी पीढ़ी अपनी आदतों में बदलाव करने को तैयार नहीं है जबकि हमें भी पता है कि हम जो आज कर रहे हैं उसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ना तय है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेस्सेचुसेत्ट्स की सामाजिक मनोविज्ञानी हेन्ने मेल्गार्ड वाटकिंस और यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया के ज्यॉफ्री गुडविन के एक शोधपत्र के अनुसार हमारी पीढ़ी को भावी पीढ़ी के लिए जिम्मेदार करने के लिए ऐसी कहानियों को प्रचारित करने की जरूरत है जिसमें हमसे पहले की पीढ़ी के लोगों ने भावी पीढ़ी के लिए बलिदान किया हो, या फिर अपने में कुछ परिवर्तन किया हो। यह शोधपत्र पर्सनालिटी एंड सोशल साइकोलॉजी नामक जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित किया गया है।

क्लाइमेट इमरजेंसी के सन्दर्भ में अगला वर्ष यानी 2020 महत्वपूर्ण है। अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार यदि अगले वर्ष से दुनियाभर में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में प्रभावी कटौती होगी, तभी भावी पीढ़ी को एक सामान्य जलवायु या पर्यावरण नसीब होगा, अन्यथा बहुत देर हो चुकी होगी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को वापस नहीं किया जा सकेगा। पर दुखद तथ्य यह है कि इसकी कोई संभावना कहीं नजर नहीं आ रही है।

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