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आंदोलन

पहली बार मातम दिवस के रूप में मना 19 साल के उत्तराखंड का स्थापना दिवस

Prema Negi
10 Nov 2019 12:48 PM GMT
पहली बार मातम दिवस के रूप में मना 19 साल के उत्तराखंड का स्थापना दिवस
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19 साल में हमने पहाड़ के सवाल हल होने के बजाए आज पहाड़ से हो गए हैं बड़े, पहाड़ के हर गांव में स्कूल, अस्पताल मिलें ना मिलें, शराब की दुकानें हर जगह मिलेंगी, अर्थव्यवस्था के लिए शराब को ही क्यों बनाया गया है माध्यम...

हल्द्वानी से संजय रावत

जनज्वार। 9 नवंबर 2019 को उत्तराखंड राज्य बने 19 बरस पूरे हुए तो उसे अब युवा उत्तराखंड कहा जाने लगा है, पर इन 19 वर्षों के सफर में युवा होने से पहले ही उत्तराखंड को आती-जाती सरकारों ने अपाहिज बना डाला है। इस पर एक गोष्ठी का आयोजन हुआ चम्पावत जिले के ढोली गांव में, जिसे रामनगर के 'महिला एकता मंच' रामनगर द्वारा आयोजित किया गया। इसमें स्थानीय जनता के अलावा कई सामाजिक संगठनों ने भी भागीदारी की।

त्तराखंड में यह पहली बार हुआ कि जब राज्य स्थापना दिवस को उल्लास का दिन न मानकर जन संगठनों और स्थानीय जनता ने मातम के रूप में मनाया। लोगों का कहना था कि जिस राज्य की स्थापना के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के समय के लिए संघर्ष जारी रहा और कई कुर्बानियां दी गईं, उस पहाड़ की परेशानियां आज नीति-नियंताओं की कारगुजारियों के चलते पहाड़ से भी बड़ी हो गई हैं।

'महिला एकता मंच' की संयोजक ललिता रावत ने गोष्ठी का संचालन करते हुए कहा, '1938 से वर्ष 2000 तक संघर्ष का लम्बा सफर तय कर हमने पृथक राज्य हांसिल किया है, जिसमें मुजफ्फर नगर और मसूरी काण्ड की भयावह वेदनाएं इतिहास में दर्ज हैं। इन्हें कोई भी उत्तराखंडी नहीं भूल पाएगा। कुर्बानी देने वाले शहीदों ने जिस कल्पना के साथ राज्य के लिए संघर्ष किया था, आज उसके उलट राज्य की स्थिति हो गई है। सत्ता में हमने जिन्हें चुनकर भेजा, वो इस स्थिति के लिए पूर्णतया जिम्मेदार हैं।

माजवादी लोक मंच के संयोजक केसर राणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि राज्य स्थापना दिवस उत्तराखण्ड के मात्र शहरी क्षत्रों तक सीमित रह गया है, जबकि पूरा पहाड़ इससे अनभिज्ञ है। उत्तर प्रदेश से जमीन का टुकड़ा हासिल करना भर शहीदों का मकसद नहीं था। इस पर जिंदगी की सूरत कैसी होगी, आने वाली नस्लों की मुस्कान के लिए किन किन योजनाओं पर हमें कैसे कैसे काम करना होगा, ये सब राज्य की सत्ता पर काबिज रहे लोगों ने सिरे से नकार दिया। हालात यह हो गए कि पलायन की दर आज 4 गुना बढ़ गई है। राज्य का पानी और जवानी राज्य के लिए नहीं रह गये। पानी उत्तर प्रदेश और हरियाणा को दिया जा रहा तो पलायन के चलते युवा बाहर काम को मजबूर हैं। जिस तरह राज्य स्थापना के लिए लड़ाई लड़ी गई, फिर उसी ऊर्जा के साथ इस लड़ाई को हमें दुबारा लड़ना ही होगा।

स्थानीय निवासी हेमा फर्त्याल ने भी अगली बात इस सभा में रखी। उन्होंने अपनी बात कुमाउंनी में रखते हुए कहा,- पहाड़ की महिलाओं को ये पता ही नहीं था कि राज्य स्थापना दिवस होता क्या है। जल, जंगल, जमीन के साथ—साथ बाकी ढेर सारे क्या क्या अधिकार हैं हमारे, ये हमें 'महिला समाख्या' से जुड़ी महिलाओं ने बताया। वो युवा लड़कियां बताती थी कि हम आगे कैसे बढ़ सकते हैं, बैंक कैसे हमारी मदद करेंगे, गर्भवती महिलाओं और शिशु मृत्युदर को हम कैसे नियंत्रित कर सकते हैं। इस तरह की जानकारियों के अभाव में हमारी जैसी ग्रामीा महिलायें जी रही थीं, महिला सामाख्या ने हमारे जीवन की दिशा बदलने का काम किया। हमारे जीवन की दिशा बदलती, इससे पहले ही सरकार ने 2015 में ये प्रोग्राम ही बंद कर दिया। इससे साफ समझ आता है कि सरकार किसकी पक्षधर है। अब हम महिला एकता मंच के माध्यम से इस रुके काम को आगे बढ़ाएंगे।'

जनकवि गिर्दा के गीत 'ततुक नि लगा उदेख, घुनन मुनई नि टेक जैंता एक दिन तो आलो...के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अर्धविधिक स्वयंसेवक केसर सिंह फर्त्याल ने अपनी बात रखते हुए कहा, खेती-बाड़ी की समस्या, जानवरों का आतंक और कृषि सुरक्षा जैसे कई मदों में राज्यहित में बडा बजट आता है, पर वन विभाग जैसे महकमे इन पर 20 प्रतिशत की खर्च कर अपने कामों में व्यय कर देते हैं। युवा नशे की गिरफ्त में इसीलिए हैं कि रोजगार नहीं हैं।

माजवादी लोक मंच के सह संयोजक मुनीष कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा, '19 साल के मूल्यांकन में हमने पाया कि पहाड़ के सवाल हल होने के बजाए आज पहाड़ से बड़े हो गए हैं। पहाड़ के हर गांव में स्कूल, अस्पताल मिलें ना मिलें, शराब की दुकानें हर जगह मिलेंगी। अर्थव्यवस्था के लिए शराब को ही क्यों माध्यम बनाया गया है। ऐसा ही पलायन आयोग बनाकर खाने पीने का नया प्रपंच रचा गया है। संविधान में संशोधन के बिना पलायन आयोग का कोई मतलब नहीं है। मौजूदा जनगणना के मुताबिक अल्मोड़ा और नैनीताल जिले में जनसंख्या दर कम हुई है, जबकि पूरे देश में बढ़ रही है इससे बेरोजगारी और पलायन का पैमाना माना जाना चाहिए। जंगली जानवर हमारे खेत और ग्रामवासियों के लिए अभिशाप हो गए हैं, इन्हें मारने का अधिकार सत्ता में बैठे लोग हमें नहीं देंगे, तो हम उन्हें जूतों की माला पहना कर विरोध दर्ज कराएंगे। राज्य विरोधी ही बारी बारी से इस राज्य के मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। हमारे सपनों के उत्तराखंड के लिए हम आज से 4 मांगें दर्ज कराते हैं।

न्य वक्ताओं में रिखोली के ग्राम प्रधान जगदीश सिंह सिंगवाल, इको सैंसटिव ज़ोन विरोधी संघर्ष समिति के सह संयोजक महेश जोशी, ग्राम प्रधान ढोली गांव कमल पांडे, गोपाल लोधियाल वन पंचायत संघर्ष मोर्चा आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का समापन जनकवि गिर्दा के गीत 'ततुक नि लगा उदेख, घुनन मुनई नि टेक जैंता एक दिन तो आलो उ दिन यो दुनी में...के साथ हुआ।

दौरान मांगें उठीं कि रोजगार उत्तराखण्ड के लोगों का मौलिक अधिकार बने। दो तरह की स्कूली व्यवस्था बंद कर सारे स्कूलों को सरकारी किया जाए। सारे प्राइवेट अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण किया जाए। सभी के लिए आवास का अधिकार मुहैया कराया जाए। साथ ही उत्तराखण्ड स्थापना दिवस के बजाय मातम दिवस के रूप में आयोजित इस कार्यक्रम में यह बात भी प्रमुखता से सामने आयी कि राज्य स्थापना के नाम पर हम उत्सव तब तक नहीं मना सकते, जब तक राज्य शहीदों की अवधारणा के मुताबिक नहीं बन जाता।

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