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राजनीति

हरेन पांड्या हत्याकांड मामले में किसका फैसला सही, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट!

Prema Negi
7 July 2019 2:30 PM GMT
हरेन पांड्या हत्याकांड मामले में किसका फैसला सही, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट!
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पत्रकार राणा अय्यूब ने अपनी किताब 'गुजरात फाइल्स' में किया खुलासा कि हरेन पंड्या की हत्या थी एक राजनीतिक साजिश और साजिश में कई राजनेताओं के साथ-साथ डीजी वंजारा सहित आईपीएस अधिकारी भी थे शामिल...

जेपी सिंह की रिपोर्ट

गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पांड्या की हत्या के 16 साल बाद उच्चतम न्यायालय ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को पलट कर 12 आरोपियों को दोषी ठहराये जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को फिर से बहाल कर दिया, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट के उन सवालों का जवाब नहीं दिया, जो उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उठाया था।जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस विनीत सरन की पीठ ने 13 फरवरी को याचिका पर सुनवाई के बाद ये फैसला सुरक्षित रख लिया था।

गुजरात हाईकोर्ट ने पूरी जांच को न केवल गलत दिशा में ले जाने की बात कही थी, बल्कि जांच में शामिल सभी अफसरों और कर्मचारियों को जमकर फटकार लगायी थी।हाईकोर्ट ने कहा था कि संबंधित जांच अफसरों को उनकी अयोग्यता की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए, जिसके नतीजे के तौर पर यह अन्याय, बहुत सारे लोगों की प्रताड़ना और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संसाधनों का नुकसान और अदालत का समय जाया हुआ है।

कोर्ट ने कहा था कि मौजूदा केस के रिकॉर्ड से जो साफ-साफ दिख रहा है, वह यह कि हरेन पांड्या की हत्या के केस में चकती लगायी गयी है और बहुत कुछ जो किया जाना था उसे छोड़ दिया गया।

पांड्या की हत्या के आरोपी 12 लोगों को बरी करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने कहा था कि सीबीआई की जांच न सिर्फ दोषपूर्ण थी, बल्कि ‘बंद आंखों वाली’ और ‘अक्षम’ भी थी। क़ानूनी भाषा में कहा जाए तो हाईकोर्ट ने यह पाया कि पांड्या की हत्या की जो कहानी सीबीआई पेश कर रही है, उस तरह से उनकी हत्या नहीं हो सकती।

जांच में अनगिनत सुरागों को नजरअंदाज कर दिया गया। साथ ही पांड्या के कर्मचारियों को इस बारे में गवाही देने की भी इजाजत नहीं दी गई कि उन्हें पांड्या का शव किस हालत में मिला था।

हाईकोर्ट के इस फैसले को देखने के बाद सौ टके का सवाल है कि या तो हाईकोर्ट का फैसला सही है या फिर सुप्रीम कोर्ट का, क्योंकि दोनों फैसले न केवल एक दूसरे के विपरीत हैं बल्कि दोनों अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं।

पांड्या की हत्या 26 मार्च 2003 को हुई थी। उसके पहले पांड्या अपनी हत्या को लेकर कई बार आशंका जता चुके थे। उन्होंने इस बात को आउटलुक के साथ एक इंटरव्यू में भी कहा था। पहली बार उन्होंने यह आशंका तब जतायी थी जब उन्होंने 27 फरवरी 2002 (गोधरा कांड के दिन) की रात को तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बंगले पर हुई अफसरों की बैठक के बारे में बताया था। उनके मुताबिक इस बैठक में ही मोदी ने अगले दिन वीएचपी द्वारा बुलाए गए बंद के दौरान पुलिस को ढिलाई बरतने या कहिए कोई हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया था।

उटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक उपरोक्त बयान देते हुए पूर्व रेवेन्यू मंत्री ने कहा था कि 'मेरा नाम किसी भी खबर में कोट नहीं किया जाना चाहिए। यहां तक कि एक मंत्री या बीजेपी नेता के रूप में भी नहीं। अगर आप बीजेपी नेता लिखेंगे तो मैं मारा जाऊंगा। अगर आप मंत्री लिखेंगे तो भी मेरी हत्या हो जाएगी।8 इसके बाद पांड्या ने यह बात गुजरात दंगे की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कृष्ण अय्यर के नेतृत्व में गठित 10 सदस्यीय कंसर्न सिटीजन्स ट्रिब्यूनल के सामने भी कही थी। इन्हीं बयानों के छह महीने बाद उनकी हत्या हो गयी।

स समय केंद्र में बीजेपी की सरकार थी और लालकृष्ण आडवाणी केंद्रीय गृहमंत्री थे। हत्या को अभी दो दिन भी नहीं बीते थे कि आडवाणी ने मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया। मामला सीबीआई को क्यों सौंपा गया, उसका खुलासा खुद उसी के एक अफसर ने पत्रकार राणा अय्यूब के सामने किया था, जो उनकी किताब 'गुजरात फाइल्स' में दर्ज है।

सीबीआई अफसर वाई.ए. शेख ने बताया कि सीबीआई ने इस मामले में अपनी कोई जांच की ही नहीं। उसने केवल वही दोहरा दिया जो गुजरात पुलिस ने उसको बताया था। उन्होंने इस बात का भी खुलासा किया कि पांड्या की हत्या राजनीतिक थी। इसके पीछे एक पूरा राजनीतिक षड्यंत्र था। साथ ही इसमें ढेर सारे नेता और डीजी वंजारा समेत आईपीएस अफसर शामिल थे। शेख का कहना था कि सीबीआई को मामला लीपापोती के लिए सौंपा गया था। यह काम उसे इसलिए सौंपा गया क्योंकि सीबीआई की साख चलते हर कोई उस पर आसानी से भरोसा कर लेगा।

सीबीआई के अनुसार पंड्या की हत्या से पहले दोषियों ने 11 मार्च, 2003 को एक स्थानीय वीएचपी नेता जगदीश तिवारी पर जानलेवा हमला किया था। एजेंसी ने दावा किया था कि ये दो घटनाएं गोधरा के बाद के दंगों के बाद लोगों में आतंक फैलाने की एक ही साजिश का हिस्सा थीं।

जेंसी ने यह दावा किया था कि फरार आरोपी रसूल पारती और मुफ्ती सूफियान पतंगिया द्वारा आरोपियों को पाकिस्तान भेजा गया था और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर प्रशिक्षित किया गया था। इस मामले की जांच पहले राज्य पुलिस ने की थी लेकिन बाद में इसे सीबीआई को सौंप दिया गया था।

यी जनहित याचिका गुजरात कैबिनेट में भाजपा नेता और गृहमंत्री रहे हरेन पंड्या की हत्या के लगभग 16 साल बाद सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी, जिसमें अदालत की निगरानी में मामले की नए सिरे से जांच कराने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया कि सोहराबुद्दीन मामले के एक गवाह आजम खान द्वारा किए गए ताजा खुलासे के बाद मामले की नए सिरे से जांच की जरूरत है।

याचिका के अनुसार 3 नवंबर को, आज़म खान ने सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई के दौरान एक बयान दिया था कि सोहराबुद्दीन शेख ने उन्हें बताया था कि हरेन पंड्या की हत्या भाड़े की हत्या थी, जिसके लिए डीजी वंजारा द्वारा कांट्रेक्ट दिया गया था। उन्होंने यह भी खुलासा किया था कि सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसीराम प्रजापति ने 2 अन्य लोगों के साथ उस कांट्रेक्ट के तहत हरेन पंड्या की हत्या की थी।

याचिका में पत्रकार राणा अय्यूब द्वारा लिखित पुस्तक "गुजरात फाइल्स" में दर्ज एक वार्तालाप का उल्लेख किया गया था। बातचीत के अनुसार हरेन पंड्या मामले को संभालने वाले सीबीआई अधिकारी वाई. ए. शेख ने अय्यूब से खुलासा किया कि सीबीआई ने अपनी कोई जांच नहीं की थी और केवल वही माना जो गुजरात पुलिस द्वारा उन्हें बताया गया था।

न्होंने कथित तौर पर यह भी खुलासा किया कि हरेन पंड्या की हत्या एक राजनीतिक साजिश थी और साजिश में कई राजनेताओं के साथ-साथ डीजी वंजारा सहित आईपीएस अधिकारी भी शामिल थे। इसमें वर्ष 2013 की टाइम्स ऑफ इंडिया रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि वंजारा ने गुजरात में मुठभेड़ की आड़ में हत्याओं की जांच करने वाली टीम को बताया था कि पंड्या की हत्या राजनीतिक साजिश के तहत की गई थी।

फैसले में पीठ ने प्रशांत भूषण पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि जब बार काउंसिल का नियम है कि किसी संस्था का पदाधिकारी कोर्ट में बहस नहीं कर सकता तो प्रशांत भूषण इस मामले में कैसे पेश हुए। इस पर प्रशांत ने कहा कि वो इस केस में बिना किसी फीस के पेश हो रहे हैं और उन्होंने बार काउंसिल के इस नियम को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जहां बार काउंसिल ने इस प्रावधान में संशोधन का आश्वासन है।

लेकिन कोर्ट इससे संतुष्ट नहीं हुई और कहा कि जब संशोधन होगा तब होगा आज जो प्रावधान है कोर्ट उसे मानेगा। पीठ ने न केवल जनहित याचिका खारिज दी, बल्कि 50 हज़ार का जुर्माना भी लगा दिया।

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