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बच्चों के पोट्टी से पालने तक की जिम्मेदारी महिला के मत्थे मढ़ चुका मर्द समाज मां को कमोड पर देख क्यों बिलबिलाया!

Janjwar Desk
4 March 2021 9:58 AM GMT
बच्चों के पोट्टी से पालने तक की जिम्मेदारी महिला के मत्थे मढ़ चुका मर्द समाज मां को कमोड पर देख क्यों बिलबिलाया!
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Photo Via Facebook

क्या दिख रहा है इस फोटो में? वजाईना दिख रही? पोर्न दिख रहा? क्या दिख रहा? कुछ नहीं न, एक सिंगल मदर ने अपनी व्यथा बताई तो उस पर वो लोग भी हावी हो गये जो खुद अपने घरों के महिलाओं की इज्जत नहीं करते, उन्हें यह सार्वजनिक अंग प्रदर्शन नजर आ रहा है...

प्रेमा नेगी की टिप्पणी

जनज्वार। महिलाओं के मुद्दों पर खुलकर लिखने-बोलने वाली वाली गीता यथार्थ ने फेसबुक पर एक तस्वीर शेयर की थी, जिसमें अश्लील जैसा कुछ नहीं था, बल्कि एक मां की मुश्किलें बयां हो रही थी कि वह कैसे एक छोटे से बच्चे को संभालने के अपने निहायत प्राइवेट काम भी सार्वजनिक तरीके से करने को​ विवश होती है।

गीता यथार्थ ने जो तस्वीर पोस्ट की है, उसमें एक मां ने टॉयलेट का दरवाजा पॉट पर बैठने के दौरान आधा खुला रखा है, ताकि वह अपने छोटे बच्चे पर भी नजर रख सके। मगर सोशल मीडिया पर इस फोटो को लेकर इतना हंगामा बरपा हुआ है, मानो उन्होंने कोई पोर्न मूवी पोस्ट कर दी हो। गीता यथार्थ को फोटो पोस्ट करने के लिए तमाम नैतिकताओं के पाठ पढ़ाये जाने लगे। दादी-नादी-मां के उदाहरण देते हुए गिनाया जाने लगा कि अगर किसी ​स्त्री के बस में नहीं है कि वह अकेले बच्चे की परवरिश नहीं कर सकती तो बच्चा पैदा करने का कोई हक नहीं और भी पता नहीं क्या—क्या।

हमारे देश में जब एक महिला टॉयलेट का आधा खुला दरवाजा और पॉट पर से बैठे हुए बच्चे पर नजर रखती तस्वीर पोस्ट करती है तो हंगामा बरप जाता है, सोचिये अगर देश की महिला नेता अमेरिका—न्यूजीलैंड या किसी अन्य देश की नेताओं की तरह संसद में ही दुग्धपान कराने लगे तो उसे भी चरित्रहीन साबित करते दो मिनट नहीं लगेंगे।

विदेशों अमेरिका, इंग्लैण्ड या फिर न्यूजीलैंड में महिला सांसद संसद में अपनी स्पीच के बीच आराम से बच्चों को दुग्धपान कराती हुई मीडिया में सराही गयी हैं, मगर हमारे देश में मेट्रो में सवारी करती स्त्री तक बच्चे को दूध पिलाते हुए झिझकती है, क्योंकि आसपास मौजूद लोगों को दुग्धपान में एक स्वाभाविक क्रिया नहीं बल्कि पोर्न झलकने लगेगा या फिर स्त्री के अंग विशेष नजर आने लगेंगे। अपने आसपास आपने खुद कई बार ऐसी स्थितियों को देखा होगा कि बच्चा रोता रहता है, मगर मां चाहकर भी नवजात को अपना दूध नहीं पिला पाती।

हमारे समाज का एक सच यह भी है कि सारे घरेलू कामों से लेकर बच्चों तक की सारी जिम्मेदारी महिला के मत्थे मढ़ दी जाती है। रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे जहां आपको इन हालातों से दो-चार होती स्त्री अपने घर-परिवार या आसपास में नजर आ जायेगी। पति आराम से टीवी देख रहे हैं या आराम फरमा रहे हैं, और उस दौरान महिला खाना बना रही हो, बच्चे ने पेशाब या पोट्टी कर दी तो वहां मौजूद मर्द उसे साफ करना तो दूर की बात आॅर्डर देने के अंदाज में कहता है कि मुझे बदबू आ रही है इसे तुरंत साफ करो और खाना बनाती महिला बीच में हाथ धोकर बच्चे को संभालती है। ये महिला हम—आपके बीच से कोई, हमारी रिश्तेदार, सहेली, पड़ोसी कोई भी हो सकती है।

इन हालातों में जिस स्थिति की तस्वीर गीता यथार्थ ने पोस्ट की है, वो जिंदगी की बहुत बड़ी हकीकत है। आसपास की महिलाओं से बात करेंगे तो सच समझ में आयेगा कि छोटे बच्चों की मांओं की ये रोजमर्रा की जिंदगी है।

मेरी एक परिचित मुझे अपनी एक जिंदगी का किस्सा बताते हुए कहती हैं, अब मेरा बच्चा 7 साल का हो गया है, मगर अकेले उसकी परवरिश के दौरान ऐसी आदत पड़ गयी कि अब तक टॉयलेट का दरवाजा बंद करना भूल जाती हूं। ये आदत ऐसी पड़ गयी कि कई बार घर में रिश्तेदार आने पर भी टॉयलेट खुला रह जाता है और एक बार तो जब मैं नहा रही थी तब घर में आये रिश्तेदार ने दरवाजा खोल दिया था, जिससे मेरे लिए बहुत अजीब स्थिति हो गयी थी।'

यहां बड़ी बात यह है कि मेरी परिचित घर में अपने पति और बच्चे के साथ रहती है, यानी जो मर्द समाज (इसमें स्त्रियां भी शामिल, जोकि मर्दवादी समाज की पोषक) आज गीता यथार्थ की तस्वीर पर फब्तियां कस रहा है क्या उसके पति की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह बच्चे को संभाले, मगर हमारे यहां पुरुषों को परवरिश ही ऐसी दी गयी है कि बच्चों को पालने और घर संभालने वाला काम दोयम दर्जा का महिलाओं के लिए रिजर्व है, पुरुष अगर इन कामों में हाथ बंटायेगा तो उसे या तो स्त्रैण घोषित कर दिया जाता है या फिर जोरू का गुलाम।

अभिषेक कुमार ने लगभग मर्दवाद को स्थापित करता लिजलिजा कमेंट किया है, तुम्हारी जांघें बहुत खूबसूरत हैं, अगली बार बिकनी में फ़ोटो सूट करवा लेना। कसम से तुम्हारी शान नहीं झुकने दी जाएगी।'

नितिन खेमचंदानी ने लिखा है, 'अगली बार ओर दूसरे गुप्त क्रियाकलाप की फ़ोटो डालना, जिससे इंटरनेशनल चर्चा मिल जाएगी। बेचारी कितनी अकेली ओर frustrated हो चुकी वामी लिबरल खातुने, अब हगने मूतने और सेक्स क्रिया कलापों की फ़ोटो डाल कर खुद की महत्ता जताने की जबरदस्ती कर रही है कि हम सिंगल मदर का दर्द समझो, जबकि सिंगल मदर कोई इशू नही है यहां, यहां इशू है खुद को चर्चा में लाने के लिए किसी भी घटिया हरकत पर उतरना, क्योंकि बहुसंख्यक समाज मे इन जैसी बीमारियों का कोई स्थान नहीं है तो ये बीमारियां समाज में अनचाहे रूप में प्रकट होना चाह रही है! सुनो फर्जी फेमिनिस्ट हमारे यहां 15 साल का एक बूढ़ा कुत्ता है उसको हमने कभी भी मल त्यागते नहीं देखा है, क्योंकि उसे भी पता है कि इस क्रिया को साइड में एकांत में जाकर करना है तो क्या तुम लोग इन कुत्तों से भी गई बीती हो चुकी हो, ध्यान करना कभी।'

प्रवीण मलिक ने तो एक कदम और आगे बढ़ते हुए लिखा है, 'कामरेडनी Geeta Yatharth को सूचित हो कि अब "सम्भोग" के दौरान ली हुई तस्वीर दुनिया को दिखाने का "संयोग" बन रहा है।

ट्रोलर्स को एक करारा जवाब देते हुए गीता कहती हैं, 'एडल्ट के लिये पोर्न लीगली एवेलेबल है,

और इस महान देश में गूगल सर्च भी उसी के लिए सबसे ज्यादा होता है। गीता आगे कहती हैं, लड़कियों का लिखना, बोलना सेंसेशन है. इसलिए बिलबिला उठते हैं। ऐसी पिक्चर कैसे खींची जा सकती है! उनकी बेचैनी बहुत बढ़ रही है तो पिक्चर विश्लेषण वालो! ये पिक्चर शेयर करने के पर्पज से ही क्लिक करवाई थी...'

हालांकि गीता यथार्थ की सिंगल पैरेंटिंग की दिक्कतों को दिखाती इस तस्वीर को तमाम लोगों ने सराहा भी है, मगर ट्रोल करने वालों की संख्या उससे कहीं ज्यादा है।

जावेद मलिक ने लिखा है, गीता यथार्थ की ये तस्वीर जिसको लेकर मीडिया औऱ सोशल मीडिया पर इन्हें ट्रोल किया जा रहा इसमें क्या गलत लग रहा है। उनको ये तस्वीर देख कर मुझे मेरी माँ के उस वक़्त की याद आती है जब मैं छोटा था और पापा भी घर पर नहीं रहते थे। तब अम्मी और मैं ही घर में होते थे जब वो टॉयलेट जाती थी तो ऐसे ही गेट खुला रखती थी, इसलिए क्योंकि मैं रो रहा होता था बाहर। इस फोटो को देख मुझे मेरी फुप्पी की याद आती है जब वो मेरे घर आती थी तो तब मैं देखता उनका बेटा जोकि मुझसे 1 साल बड़ा था और हम थोड़े बड़े हो रहे थे, तब भी वो उनके पीछे पीछे भागता था और रोता रहता था।'

कनकलता यादव लिखती हैं, कहीं भी पैंट खोलकर खड़े हो जाने वाले मर्द, औरतों को ज्ञान देते हैं तो अच्छा नहीं लगता है। किसी महिला को क्या करना है, क्या नहीं करना है वो ये खुद तय करेगी। मर्द पहले अपना चीजें देख लें, और गाइडलाइंस तैयार करने का इतना ही शौक है तो खुद के लिए तैयार कर लें। हर वक्त अपना कम, सड़ा हुआ और बेकार दिमाग इस बात में न खर्च करें कि औरत को क्या करना है।'

लेखिका नीलिमा चौहान लिखती हैं, 'यही हाल हमारा था बेटा रो रो कर जान देने को हो आता था । विजेंन को भी हाथ लगाने नहीं देता था। जब अकेली होती तो सामने ही प्रेम में बैठा लेती पर रो रोकर उसमे से गिरने को होता। सोने खाने नहाने की लग्ज़री ही होती। इतने पैसे नहीं होते थे कि कोई सहायक रख लिया जाता। हम लोग का चाल चलन ऐसा होता कि पड़ोसियों को अर्बन नक्सल लगते होते थे शायद तो वो भी गुंजाइश नहीं। रिश्तेदारी में एक सहायता के बदले सौ दबाव मिलने के खतरे थे। वो वक्त ऐसा था कि मुझे याद भी नहीं करना है।'

नरेंद्र कुमार झा कहते हैं, 'बच्चे को दूध पिलाती माँ के स्तनों में भी यौन आकर्षण ढूंढ़ लेने वाला समाज कमोड पर बैठी उस माँ की व्यथा क्या ही समझ लेगा, जिसे अपने दूधमूहे की चिंता हो?

मुझे इस पोस्ट में अपनी बहन दिखती है, जो दूधमूहे भांजे को लेकर पॉटी करने जाया करती थी, क्योंकि जीजाजी अपने काम में व्यस्त होते थे, और भांजा अपनी माँ के बगैर रह नही पाता था। किसी भी प्रकार के उलजुलूल टिप्पणी करने से पहले, अपने घर में मौजूद माओं से जरूर पूछ लें, वो समझेंगी और बताएंगी मातृत्व के कठिन परिस्थितियों को, अपनी मजबूरी को।'

अपना उत्तराखंडी ने गीता यथार्थ की तस्वीर पर भद्दे कमेंट करने वालों को जवाब देते हुए लिखा है, 'क्या दिख रहा है इस फोटो में? वजाईना दिख रही? पोर्न दिख रहा? क्या दिख रहा? कुछ नहीं न ....एक सिंगल मदर ने अपनी व्यथा बताई तो उस पर वो लोग भी हावी हो गये जिनके घर की महिलाएं आज भी खेत में पिछवाड़े को खोलकर बैठती हैं। अगर पुरुष को चुनाव का अधिकार होता तो खुद को संस्कारी दिखाने के चक्कर में कोर्ट में हलफ़नामा दे देता कि भाई हमें मां की योनि से नहीं बल्कि नाक से पैदा होना है। तुम और तुम्हारी बातें मेरे जूते से, शर्म करो सिंगल मदर है वो, कमोड पर बैठती है दरवाजा खोलकर क्योंकि उसका बेबी चीखता है, रोता है मां को न देखकर, पर इस ममता को वो क्या समझेंगे तो अपनी मां का दूध पीते वक्त भी मां का साइज देखकर खुश होने का माद्दा रखते हो। आस्था के नाम पर नदी तालाब नहाने जाती हैं जब मां-बहनें तो वहीं खुले में कपड़े बदलती हैं जहाँ बगल मे बाबा जी लंगोटी के नाम पर एक पतली सी कपड़े की लकीर पहनकर नहाते हैं। वो अश्लील नहीं लगता क्या, बस करो मर्दो इतना दोगलापन भी ठीक नहीं।'

अंत में एक बात और ये ट्रोलर्स जोकि गीता यथार्थ को कह रहे हैं कि उन्हें अपने सेक्स वीडियो अपलोड कर ज्यादा पॉपुलेरिटी ले लेनी चाहिए, वही लोग हैं जो 8 मार्च को आने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं के सम्मान में लंबे-चौड़े कसीदे पढ़ेंगे। हां, अपने घर में भी मां—बहनों की इज्जत इनमें से शायद ही कोई करता होगा, पत्नी को बराबरी का हक और उसका सहयोग करना तो बहुत दूर की बात है।

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