Top
बिहार चुनाव 2020

Ground Report : योग, उद्योग व बंदूक के लिए मशहूर मुंगेर-मोकामा में जाति-बाहुबल में गुम हो जाते हैं मुद्दे

Janjwar Desk
24 Oct 2020 7:51 AM GMT
Ground Report : योग, उद्योग व बंदूक के लिए मशहूर मुंगेर-मोकामा में जाति-बाहुबल में गुम हो जाते हैं मुद्दे
x

मुंगेर का ऐतिहासिक किला।

मुंगेर में देश का सबसे बडा मान्यता प्राप्त बंदूक उद्योग केंद्र था जो धीरे-धीरे अवैध हथियारों के निर्माण में परिवर्तित हो गया है...

मुंगेर से राहुल सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। परिसीमन के बाद मुंगेर लोकसभा क्षेत्र की संरचना बदल गई है। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र में इस जिले की सिर्फ दो विधानसभा सीटें मुंगेर और जमालपुर आती हैं। जबकि लखीसराय जिले की दो सीटें : लखीसरऔर सूर्यगढा व पटना जिले में पड़ने वाली दो सीटें मोकामा और बाढ आती है।

मुंगेर को बंगाल के नवाब ने मीर कासीम ने राजधानी भी बनाया था। उसने मुर्शिदाबाद की जगह मुंगेर को राजधानी चुना और यहां का कीला बहुत मशहूर है। वह एक अलग प्रसंग है।

मुंगेर आजादी के बाद कांग्रेसियों का गढ रहा और 70 के दशक में यहां समाजवादियों का दबदबा हो गया। यह अलग बात है कि समाजवादी खेमे के बिखराव के कारण अलग-अलग नाम के दल से उम्मीदवार यहां से चुनाव जीतते रहे हैं। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र का संसद में दो बार मधु लिमिये जैसे प्रखर समाजवादी भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

आज मुंगेर बाहुबली अनंत सिंह और सूरजभान सिंह के परिजनों की राजनैतिक भूमि के रूप में जाना जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव में अनंत की पत्नी पूनम देवी यहां से कांग्रेस के टिकट पर लड़ी थीं, लेकिन हार गई थीं। जबकि उससे पहले सूरजभान की पत्नी वीणा देवी यहां से लोजपा की सांसद रहीं। मुंगेर से इस समय नीतीश कुमार के भरोसेमंद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह सांसद हैं और उनके पास अपनी पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत पड़ने वाली विधानसभा सीटों पर कब्जा दिलाने का टास्क है।

फिलहाल तीन सीटों पर जमालपुर, बाढ व लखीसराय पर भाजपा जदयू का कब्जा है, जिसमें जमालपुर जदयू के बाद व बाढ व लखीसराय भाजपा के पास हैं। दो सीटें मुंगेर व सूर्यगढा राजद के पास हैं और एक मोकामा से अनंत सिंह निर्दलीय जीते थे। पिछल चुनाव जदयू-राजद ने साथ लड़ा था, तब भाजपा ने लोजपा, रालोसपा व हम के साथ दो सीटें हासिल की थीं। इस बार गठजोड़ भाजपा-जदयू का है।

जिस तरह मुंगेर का राजनैतिक प्रतिनिधित्व बदला है, वैसे ही इस इलाके की औद्योगिक पहचान भी बदली है। बिहार का यह ऐतिहासिक शहर योग और उद्योग के लिए जाना जाता रहा है। दुनिया का पहला योग विश्वविद्यालय यहीं स्थपित हुआ और बंदूक और सिगरेट कारखाने के लिए यह शहर मशहूर रहा है। पर, बीते कुछ दशकों में यहां की औद्योगिक चमक फीकी पड़ती गई है।

मुंगेर का योग विश्वविद्यालय।

एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में केंद्रीय गृह मंत्रालय से मान्यता प्राप्त 97 निजी गन फैक्ट्रियां संचालित होतीं रही हैं, जो बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, जम्मू कश्मीर, असम, कर्नाटक व हिमाचल प्रदेश में हैं। इनमें से अकेले 37 यूनिट का संचालन मुंगेर में होता था। पांच जून 1969 को सुरक्षा वजहों से सरकार ने एक फैसला लेते हुए मुंगेर की सभी इकाइयों को जगह मुंगेर किले में के अंदर एक विशाल परिसर में शिफ्ट कर दिया गया। इसकी सुरक्षा की जिम्मेवारी बिहार पुलिस के स्पेशल ब्रांच के पास है। किला परिसर में यह जगह योग विश्वद्यालय के बगल में ही स्थित है, लेकिन वहां कोई बोर्ड नहीं लगा है जिससे अनजान व्यक्ति के लिए उसकी पहचान करना मुश्किल है। शायद ऐसा सुरक्षा वजहों से ही है। किले के अंदर का गन फैक्टरी का परिसर 10 एकड़ एरिया में फैला हुआ है जो पूरी तरह जेल नुमा आकृति का है और वहां कड़ी सुरक्षा है।

गन फैक्ट्री के परिसर में जब यह संवाददाता शाम के वक्त पहुंचा तो वहां तैनात कर्मचारियों व सिक्यूरिटी गार्ड ने बताया कि अब बहुत कम संख्या में यहां कर्मचारी हैं। पहले के जैसी रौनक नहीं है। जब इस संवाददाता ने परिसर के भीतर का फोटो लेना चाहा तो सिक्यूरिटी गार्ड ने रोक दिया और कहा किसी भी तरह का फोटो लेना मना है, अगर आपको बात करना है तो दिन में आकर यहां के प्रभारी अधिकारी से बात करें।

2005 तक मुंगेर में 37 मान्यता प्राप्त गन यूनिट होते थे लेकिन उसके बाद इनकी संख्या घटती गई और 2017 में उनकी संख्या 29 तक पहुंच गई। कई ने लाइसेंस रिन्यू नहीं कराया। बंदूकों का उत्पादन भी गिरता गया और वह मांग घटने से बामुश्किल 20 प्रतिशत या उससे कम तक आ गया।

बंदूक कारखाना परिसर में तैनात कर्मचारियों ने पूछने पर बताया कि 15 के आसपास कर्मचारी वर्तमान में यहां काम करते हैं। डीएम से लाइसेंस मिलने की प्रक्रिया जटिल होने व अन्य कारणों से भी बंदूक की खुले बाजार में मांग गिरी।

हालांकि मुंगेर में बंदूक निर्माण का इसके समानांतर एक कुटिर उद्योग फैल गया और उनके द्वारा विदेशी टैग लगाकर कर अवैध देशी बंदूक की कालाबाजारी की जाती है। स्थानीय अखबारों के लिए अवैध बंदूक कारखाने पर छापे और गिरफ्तारियां आम खबरें हैं जो अक्सर छपती रहती हैं। अवैध बंदूकों की सहज उपलब्धता ने इलाके में अपराध का ग्राफ भी बढाया और इस ऐतिहासिक स्थल को बदनामियां मिलीं।

चुनाव को लेकर पुलिस ने छापेमारी कर जिले में कई जगह छापे मार कर अवैध हथियार निर्माण कारखाने को जब्त किया है। पुलिसिया कार्रवाई के मद्देनजर अब यहां के अवैध बंदूक निर्माता बाहर से अलग-अलग पाट्र्स मंगवा कर उसकी असेंबलिंग भी करने लगे हैं।

मुंगेर में बंदूक निर्माण का इतिहास 200 साल से भी पहले तक जाता है और दोनों विश्व युद्धों में यहां के हथियारों का उपयोग किया गया था। कहते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद से इसमें कमी आना शुरू हो गई और लोगों की बेरोजगारी बढी, फिर 1980 के बाद इसमें और गिरावट आयी। हालांकि हथियार निर्माण का कौशल एक पीढी से दूसरी पीढी को ट्रांसफर हुआ और वह संगठित अवैध निर्माण में परिवर्तित हो गया।

मुंगेर का सिगरेट कारखाना

मुंगेर बंदूक फैक्टरी के बाद सिगरेट फैक्टरी के लिए मशहूर रहा है। यहां इंडियन टोबैको कंपनी यानी आइटीसी का सबसे पुराना सिगरेट यूनिट है। 1910 में इसकी स्थापना इंपीरियर टोबैको कंपनी के नाम से हुई थी। फिर 1970 में इसका नाम इंडियन टोबैको कंपनी और फिर 1974 में आइ.टी.सी. लिमिटेड और 2001 में आइटीसी लिमिटेड कर दिया गया। आज आइटीसी देश में एमएमसीजी प्रोडक्ट की तीन-चार सबसे बड़े निर्माताओं में एक है।

इस कारखाने में एक समय बड़ी संख्या में रोजगार लोगों को मिलता था। कंपनी के एक कर्मचारी ने अपनी पहचान ने उजागर करने की शर्त पर बताया कि उनके पिता और दादा भी इसी सिगेरट कारखाने में काम करते थे। पिता के जमाने में संख्या जहां 5 हजार के करीब होती थी, वहीं वह अब घटकर 1800 के आसपास हो गई। दादा के बाद पिता के समय कर्मचारियों की संख्या और कम हो गई। इसे आइटीसी का सबसे आधुनिक सिगरेट प्लांट भी बताया जाता है।

धूम्रपान वाले उत्पाद का निर्माण होने की वजह से आसपास के इलाके में तंबाकू की गंध फैली रहती है और कारखाना को प्रदूषण मानकों का पालन करना होता है और उसकी जानकारी बाहर सार्वजनिक करनी होती है।

मुंगेर में आइटीसी का सिगरेट कारखाना। सभी फोटो : राहुल सिंह।

स्वास्थ्य संबंधी सवाल करने पर उस कर्मचारी ने कहा कि कंपनी नियमित रूप से हमलोगों का हर प्रकार की स्वास्थ्य जांच करवाती है, लेकिन फिर भी हर साल चार-पांच लोगों की कैंसर से मौत होती है।

कर्मचारियों का को-आपरेटिव हैं जो अब लगभग निष्क्रिय और निष्प्रभावी है। 25 साल इस कारखाने में काम कर रहे उस कर्मचारी ने बताया कि दादा के समय में काॅपरेटिव प्रभावी रूप से चलता था, जिससे कर्मचारियों को बहुत सारी सुविधाएं मिलती थीं और लाभ होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। मुंगेर में नया क्या कारखाना खुला है, सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि चार-पांच साल पहले एक दूध प्रोसेसिंग यूनिट खुला है।

मुरारी कंपनी में खाद्य सामग्री की आपूर्ति की ठेकेदारी करते हैं और इससे उनका रोजगार जुड़े होने की वजह से वे कंपनी की तारीफ करते हैं। हालांकि यह स्वीकार करते हैं कि पहले की तुलना में अब लोगों को कम रोजगार मिलता है।

मोकामा में एक-एक कर बंद होते गए सारे कारखाने

मोकामा यूं तो पटना जिले में आता है, लेकिन अब इसका राजनैतिक सरोकार मुंगेर से अधिक जुड़ चुका है।

मोकामा के शिवनार के रहने वाले बुजुर्ग क्रांति सिंह कहते हैं, पहले यहां कई कारखाने होते थे, लेकिन एक-एक कर वे सब बंद होते गए, इससे स्थानीय लोगों में बेरोजगारी फैली और कमाने के लिए यहां से बाहर चले गए। वे कहते हैं कि उनके गांव में ही लाॅकडाउन में करीब 50 लोग बाहर से पैदल आए।

वे मोकामा में बाटा, मैकडोनाल्ड, सूता फैक्टरी हुआ करता था, जो अब बंद हो गया। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां ब्रिटेनिया बिस्कीट का कारखाना था, जिससे ढाई-तीन हजार लोग रोजगार पाते थे, लेकिन वह तीन-चार साल से बंद है। सूता फैक्टरी में 500 लोग रोजगार पाते थे, लेकिन वह 15 साल से बंद है। बाटा के कारखाने में हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ था, लेकिन वह 20 साल पहले चला गया।

क्रांति सिंह के बगल में बैठे उमेश साव कहते हैं कि पुराने कारखाने बंद हुए लेकिन नया कुछ नहीं खुला। उमेश में एक कारखाने में काम करते थे और लाॅकडाउन में कुछ माह पहले गांव वापस आए। वे चुनाव व छठ पर्व के बाद फिर काम पर जाने को तैयार हैं।

मोकामा में शिवनार में ग्रामीणों से चुनावी चर्चा का दृश्य।

स्थानीय लोग कहते हैं कि यहां रेलवे रेक था जो बेगूसराय चला गया, मोकामा जंक्शन को स्टेशन में तब्दील कर दिया गया। स्थानीय लोगों में इन चीजों को लेकर सरकार से अपनी नाराजगी नहीं छिपाते।

दरअसल, एकीकृत बिहार यानी झारखंड के अलग होने से पहले उत्तरी हिस्से में प्रमुख रूप से वैसी औद्योगिक इकाइयां थी, जो कृषि पर आधारित थीं, जबकि दक्षिणी हिस्से जो आज झारखंड राज्य है, वहां खनिज आधारित बडी औद्योगिक इकाइयां लगीं।

अगर सरकारी आंकड़ों को भी देखेंगे तो कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयों की संख्या अधिक है। हालांकि अब उनमें अधिकतर सिकुड़ गई हैं या बंद होने के कगार पर हैं।

पिछले कुछ महीनों से बिहार में राजनैतिक रूप से सक्रिय लंदन स्कूल ऑफ इकोनाॅमिक्स में पढीं-लिखी प्लुरल्स पार्टी की प्रमुख पुष्पम प्रिया चौधरी ने बंद हुई औद्योगिक इकाइयों को प्रमुख मुद्दा बनाने का प्रयास किया है, लेकिन मुख्य धारा की राजनीति में यह अभी विमर्श का विषय नहीं बन सका है। मुंगेर संसदीय क्षेत्र के अंदर पड़ने वाली अलग-अलग विधानसभा सीटों पर जातीय व स्थानीय राजनैतिक समीकरण मुद्दों पर भारी पड़ते हैं।

Next Story

विविध

Share it