अंधविश्वास

नागपंचमी के दिन पशुओं की तरह भूसा खाता है महाराजगंज का बुद्धिराम पासवान, लोग आस्था में होते हैं लहालोट

Janjwar Desk
3 Aug 2022 12:53 PM GMT
नागपंचमी के दिन पशुओं की तरह भूसा खाता है महाराजगंज का बुद्धिराम पासवान, लोग आस्था में होते हैं लहालोट
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आस्था या अंधविश्वास : रोडवेज में बस ड्राइवर के पद से रिटायर हुआ यह बुद्धिराम हर तीसरी नागपंचमी पर पशुओं की तरह नाद में मुंह डालकर ढेर सारा भूसा चबा जाता है, गांव वाले इसे बुद्धिराम की आस्था मानकर लहालोट होते हैं तो चिकित्सक कुछ और ही कहते हैं...

आस्था या अंधविश्वास : सामाजिक अलगाव में कुंठाओं का शिकार बने लोग अपनी कुंठा को बाहर निकालने के लिए तरह.तरह के स्वांग रचते रहते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के बुद्धिराम पासवान ने आस्था का ऐसा तड़का लगाया कि हर तीसरी नागपंचमी पर उसके घर उसके कारनामे को देखने के लिए लोगों का मेला लग जाता है।

रोडवेज में बस ड्राइवर के पद से रिटायर हुआ यह बुद्धिराम हर तीसरी नागपंचमी पर पशुओं की तरह नाद में मुंह डालकर ढेर सारा भूसा चबा जाता है। गांव वाले इसे बुद्धिराम की आस्था मानकर लहालोट होते हैं तो चिकित्सक इसे मनोरोग की बीमारी बताते हैं।

मिली जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के कोल्हुई बाजार इलाके की ग्रामसभा रुद्रपुर शिवनाथ में रहने वाला बुद्धिराम पासवान उत्तर प्रदेश रोडवेज में बस चालक के पद पर तैनात था। इस पूरी अवधि में उसने अपना जीवन सामान्य तौर पर गुजारा, लेकिन विभाग से सेवानिवृत होने के बाद बुद्धिराम गांव में रहने के दौरान अवसादग्रस्त होने लगा। इसी अवसाद के चलते उसने एक बार नागपंचमी के दिन लोगों का ध्यान अपनी ओर करने के लिए पशुओं की नाद में मुंह डालकर भूसा चबाना शुरू कर दिया।

बुद्धिराम द्वारा भूसा चबाने की इस हरकत ने गांव में कौतूहल का वातावरण बना दिया। गांव के हर घर में इस हरकत के कारण चर्चाओं का केंद्र बने बुद्धिराम ने अगले एक साल तक सामान्य जीवन जिया, लेकिन उसके बाद की नागपंचमी पर फिर से उसने अपनी यह हरकत दोहरा डाली। इसके साथ ही उसने अपनी इस हरकत को नागपंचमी से जोड़ते हुए आस्था का तड़का भी लगा दिया, जिसके बाद रिटायरमेंट की जिंदगी जी रहे बुद्धिराम की इस हरकत की चर्चा गांव से बाहर निकलकर जिले तक में होने लगी।

इसके बाद बुद्धिराम ने हर तीसरे साल नागपंचमी पर भूसा खाने की अद्भुत परम्परा शुरू कर दी। बुद्धिराम की यह हरकत लोगों को हैरान करती तो कई लोग इसमें लिपटे आस्था के रंग की चपेट में आकर इसे भक्तिभाव से भी जोड़ने लगे।

तब से अब तक बुद्धिराम नाग पंचमी के दिन इंसान से अलग हटकर पशुओं की भांति व्यवहार करते हुए पशुओं की नाद में भूसा चारा खाने लगता है। उसकी यह हरकत केवल एक दिन होती है, बाकी दिन वह सामान्य जीवन जीता है, यानी सामान्य खाना खाता है। बुद्धिराम की इस हरकत की चर्चा इतनी हो गई है कि नागपंचमी के दिन उसके घर के बाहर सुबह से ही तमाशबीनों की भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है।

भीड़ जुटान के बाद दिन में बुद्धिराम का भूसा खाओ कार्यक्रम शुरू हो जाता है। इतने साल के बाद अब स्थिति यह हो गई है कि लोग पहले फूल मालाओं से उसका स्वागत करते हैं। उसके बाद वह धीरे.धीरे भैंसे की नाद में पशु की तरह भूसा चारा खाने लगता है।

इस नागपंचमी के दिन कल 2 अगस्त को भी बुद्धिराम के इस कौतूहल को देखने वालों की भीड़ जमी रही। काफी देर तक आस्था के नाम पर चलने वाली नौटंकी को देखने के लिए लोगों की इतनी भीड़ उमड़ी कि बुद्धिराम के घर के बाहर लोगों के खड़ा होने के लिए भी जगह नहीं बची थी। इस कार्यक्रम को देखने के लिए हुजूम के सामने बुद्धिराम ने काफी देर तक पशुओं की तरह पशुओं को चारा दिए जाने वाली नाद में भूसा चारा खाया।

बता दें कि बुद्धिराम की इस हरकत पर आस्था का ऐसा तड़का लगा हुआ है कि उसके इस कारनामे को देखकर जहां कुछ लोग शीश झुका कर उसे प्रणाम करते हैं तो कुछ लोग केवल अपनी उत्सुकता के लिए मजमे की भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं।

इस मामले में समाजवादी लोकमंच के मुनीष कुमार कहते हैं, सामाजिक.पारिवारिक अलगाव का शिकार होकर कुछ लोग दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अजीबोगरीब हरकतें रहते हैं। बुढ़ापे के दौरान आदमी सबसे ज्यादा अकेलेपन का शिकार होता है। गांव में वैसे भी सामुदायिकता समाप्त होती जा रही है। ऐसे में आदमी समाज में अपनी उपयोगिता स्थापित करने तथा लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर अपने को चर्चाओं में रखने के लिए कुछ भी उटपटांग हरकतें करने लगता है। अपनी इन हरकतों को धर्म की आड़ में देवता आने का नाम देकर आस्था का तड़का लगाया जाने से व्यक्ति की यह हरकते समाज में और ज्यादा अच्छे से स्थापित हो जाती हैं। इस मामले में भी यही बात है। यह आस्था की नहीं बल्कि मनोरोग से जुड़ी बीमारी है जिसका इलाज है। बशर्ते पीड़ित व्यक्ति इसे बीमारी के तौर पर स्वीकार करे। लेकिन जब व्यक्ति खुद ही इसे तमाशे के तौर पर स्थापित करके अपनी कुंठाओं को बाहर निकालने का माध्यम बना ले तो फिर इसका कोई इलाज नहीं है।

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