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कोविड -19

वैश्विक महामारी कोरोना का इलाज रोकथाम की तुलना में कई गुना महंगा, विशेषज्ञों ने दी मांसाहार कम करने की सलाह

Janjwar Desk
3 Nov 2020 8:52 AM GMT
वैश्विक महामारी कोरोना का इलाज रोकथाम की तुलना में कई गुना महंगा, विशेषज्ञों ने दी मांसाहार कम करने की सलाह
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file photo

वैज्ञानिकों के अनुसार कोविड 19 कोई अकेली वैश्विक महामारी नहीं है, भविष्य में दुनिया को और अधिक खतरनाक महामारी के लिए तैयार रहने की जरूरत है....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। एक नई रिपोर्ट के अनुसार किसी भी वैश्विक महामारी का इलाज इसके रोकथाम की तुलना में कई गुना अधिक रहता है, इसलिए अब वैश्विक महामारी से निपटने के तरीके में व्यापक बदलाब की जरूरत है। वैज्ञानिकों के अनुसार कोविड 19 कोई अकेली वैश्विक महामारी नहीं है, भविष्य में दुनिया को और अधिक खतरनाक महामारी के लिए तैयार रहने की जरूरत है।

इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र की संस्था, इन्टरगवर्नमेंटल साइंस पालिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज ने तैयार किया है। इसके अनुसार वन्यजीवों और पालतू मवेशियों में आपसी संपर्क को रोकने की आवश्यकता है, क्योंकि वन्यजीवों से उनके बैक्टीरिया और वायरस मवेशियों तक पहुंचाते है और फिर इंसानों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। दुनिया के जिन क्षेत्रों में वन्यजीवों और मवेशियों में संपर्क की संभावना है, उन क्षेत्रों में मवेशियों और मनुष्यों के लिए विशेष स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।

रिपोर्ट के अनुसार कोविड 19 जैसी वैश्विक महामारी से बचने के लिए खानपान के तरीके और भूमि उपयोग परिवर्तन पर ध्यान देने की जरूरत है। खाद्य के तौर पर मांस की खपत कम करने के प्रयास में तेजी लाने और वन्यजीवों के क्षेत्र में भूमि उपयोग में बदलाव कर कृषि, उद्योग या इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को पूरी तरह रोकने की जरूरत है।

भविष्य में यदि दुनिया में वैश्विक महामारी से निपटने के लिए एक समन्वित नीति नहीं बनाई गई तो भविष्य में ऐसी महामारी के परिणाम और भी भयानक होंगें और इस बार से अधिक लोगों की मृत्यु तय है। अनुमान है कि कोविड 19 के असर से अगली गर्मियों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था को लगभग 16 खरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके विपरीत पूरे विश्व में फैले वन्यजीवों के अवैध कारोबार रोकने के लिए महज 22 से 31 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी। हालांकि यह राशि भी छोटी नहीं है, पर कोविड 19 से होने वाले नुक्सान की तुलना में महज एक छोटा भाग है।

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कण्ट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार वर्ष 1960 के बाद से पनपी नई बीमारियों और रोगों में से तीन-चौथाई से अधिक का सम्बन्ध जानवरों, पक्षियों या पशुओं से है, और यह सब प्राकृतिक क्षेत्रों के विनाश के कारण हो रहा है। दुनिया भर को अपना गुलाम बनाने वाले कोविड 19 के लिए भी यही कहा जा रहा है।

दरअसल दुनियाभर में प्राकृतिक संसाधनों का विनाश किया जा रहा है और जंगली पशुओं और पक्षियों की तस्करी बढ़ रही है और अब इन्हें पकड़कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में खरीद-फरोख्त में तेजी आ गयी है। प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने पर या फिर ऐसे क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का जाल बिछाने पर जंगली जानवरों का आवास सिमटता जा रहा है और ये मनुष्यों के संपर्क में तेजी से आ रहे है, या फिर मनुष्यों से इनकी दूरी कम होती जा रही है।

घने जंगलों में तमाम तरह के अज्ञात वैक्टीरिया और वायरस पनपते हैं, और जब जंगल नष्ट होते हैं तब ये वायरस मनुष्यों में पनपने लगते हैं। इनमें से अधिकतर का असर हमें नहीं मालूम पर जब सार्स, मर्स या फिर कोरोना जैसे वायरस दुनिया भर में तबाही मचाते हैं, तब ऐसे वायरसों का असर समझ में आता है।

इसी को ध्यान में रखकर अब वैज्ञानिक पूरे पृथ्वी के स्वास्थ्य की बात करने लगे हैं क्योंकि मानव का स्वास्थ्य केवल मनुष्य के रहन-सहन, दूसरे मनुष्य के साथ सम्बन्ध या फिर आस-पास के परिवेश पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि पूरे पर्यावरण पर निर्भर करता है।

कोरोना की उत्पत्ति का केंद्र चीन के जिस वुहान शहर के मांस के बाजार को बताया जा रहा है, वहां तस्करी के जंगली जानवरों का बहुत बड़ा कारोबार किया जाता है। इस कारोबार को चीन सरकार ने नवम्बर के बाद प्रतिबंधित कर दिया था, पर अब यह बाजार फिर से सजाने लगा है। अनुमान है कि इन्हीं वन्य जीवों से यह वायरस पहले चीन में और अब पूरी दुनिया में फ़ैल गया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने लेख में डेविड कुँममें ने लिखा था, हम पेड़ काट रहे हैं, हम जानवरों को मार रहे हैं या फिर इन्हें पिंजरे में डाल कर बाजार में बेच रहे हैं – इससे हम पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को और विभिन्न अनजान वायरस को प्रभावित कर रहे हैं और उसके परम्परागत होस्ट से अलग कर रहे हैं, इन्हें नया होस्ट चाहिए और अधिकतर मामलों में यह मनुष्य होता है जो पृथ्वी पर हरेक जगह है। जानवरों से फैले कुछ रोग, रैबीज और प्लेग, को सभी जानते हैं पर नए रोगों के बारे में जानकारी कम है।

इन्टरगवर्नमेंटल साइंस पालिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज के रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक महामारियों का खतरा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। दुनिया में हरेक साल 5 से अधिक नए रोग पनपते हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक का स्त्रोत वन्यजीव या फिर मवेशी में पनपने वाले बैक्टीरिया या वायरस हैं।

घने जंगलों में रहने वाले स्तनपायी प्राणी और पक्षियों में दस लाख से अधिक ऐसे वायरस या बैक्टीरिया पनपते हैं, जिनसे विज्ञान अनजान है। जाहिर है ऐसे वायरस या बैक्टीरिया से पनपने वाले रोगों के बारे में भी विज्ञान अनजान है।

रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक महामारी का विस्तार अब एक सामान्य बात लगने लगी है, पर दुनिया अभी तक इसके प्रति गंभीर नहीं हो रही है। बेहिसाब मौतें होतीं हैं, अर्थव्यवस्था धराशायी होती है, समाज की विषमता बढ़ती जाती है, फिर भी इसकी रोकथाम की कोई चर्चा नहीं की जाती। दूसरी तरफ बड़ी कम्पनियां महामारी पनपने के बाद दवा और टीके बनाकर बेहिसाब मुनाफे पर पूरा ध्यान देती हैं।

कोविड 19 जैसी महामारी की रोकथाम के लिए रिपोर्ट में कुछ सुझाव भी दिए गए हैं। भविष्य में पनपने वाले वैश्विक महामारियों की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र को जलवायु परिवर्तन की तर्ज पर एक पैनल गठित करना चाहिए। वन्यजीवों के परम्परागत क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, कृषि विस्तार, पर्यटन और उद्योगों पर पूरी तरह से रोक लगानी चाहिए।

रिापोर्ट में सुझाव दिया गया है कि वन्यजीवों का अवैध कारोबार पर सख्त अंकुश लगाने की और दुनिया में मांस की खपत कम करने की जरूरत है। वैश्विक महामारी की रोकथाम, नियंत्रण और इसके लिए नीतियों से सम्बंधित एक अंतरराष्ट्रीय समझौते की जरूरत है। दुनियाभर में भूमि-उपयोग परिवर्तन से सम्बंधित नियम एक जैसे होने चाहिए।

पर, सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूंजीवादी दुनिया में जब सभी प्राकृतिक संसाधन बाजार के हवाले किये जा रहे हैं, और आबादी पर संकट बढ़ाकर पूंजीपति अपना कारोबार और मुनाफा और सरकारें अपनी निरंकुशता बढ़ा रही हैं, तब क्या कोई भी अगले वैश्विक महामारी की रोकथाम करना चाहेगा?

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