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शिक्षा

दावे जो हों, पर हकीकत यह है कि देश के 3 करोड़ 22 लाख बच्चे नहीं जा पाते स्कूल

Janjwar Desk
8 Aug 2020 4:25 AM GMT
दावे जो हों, पर हकीकत यह है कि देश के 3 करोड़ 22 लाख बच्चे नहीं जा पाते स्कूल
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प्रतीकात्मक तस्वीर

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में यह हकीकत सामने आई है और ये आंकड़े देश की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पेश कर रहे हैं...

जनज्वार। देश में शिक्षा की स्थिति (Situation of Education) को लेकर सरकारें लाख दावे करें, पर अब भी देश में छह से 17 वर्ष के बीच की उम्र के 3 करोड़ 22 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते (Not going to schools) हैं। यह खुलासा NSSO (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के 75वें राउंड हाऊसहोल्ड सर्वे (Household Survey) में हुआ। शिक्षा प्रणाली से बाहर (Out Of Education System) हुए ऐसे बच्चों को स्कूली शिक्षा की मुख्य धारा में वापस लाने की जरूरत अब भी बनी हुई है।

ये आंकड़े देश में शिक्षा की स्थित की वास्तविक तस्वीर (Real Picture Of Country's Education System) बता रहे हैं।देश मे सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education) जैसी कई योजनाएं चलाई जा रहीं हैं, पर ये नतीजे इन योजनाओं के प्रतिफल की हकीकत भी उजागर कर रहे हैं। कक्षा छठी से आठवीं का GER (सकल नामांकन अनुपात) 90.9 प्रतिशत है, जबकि कक्षा नौ-10 और 11-12 के लिए यह क्रमश: 79.3 प्रतिशत और 56.5 प्रतिशत है।

ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार कक्षा पांच और विशेष रूप से कक्षा आठ के बाद नामांकित छात्रों का एक महत्वपूर्ण अनुपात वर्ग शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाता है। ऐसे बच्चों को यथासंभव पुन: शिक्षा प्रणाली में वापस लाने के लिए वर्ष 2030 तक प्री स्कूल से माध्यमिक स्तर में 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ आगे बढऩे की आवश्यकता नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी जताई गई है। इसमें कहा गया है कि भविष्य के छात्रों का ड्रॉपआउट दर भी कम करना होगा।

इसके तहत प्रभावी और पर्याप्त बुनियादी ढांचा विकसित करना होगा, ताकि सभी छात्रों को इसके माध्यम से प्री-प्राइमरी स्कूल से 12वीं कक्षा तक सभी स्तरों पर सुरक्षित और आकर्षक स्कूली शिक्षा प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त प्रत्येक स्तर पर नियमित प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराने के अलावा विशेष देखभाल की व्यवस्था करनी होगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी स्कूल में अवस्थापना की कमी न हो।

सरकारी स्कूलों की विश्वसनीयता फिर से स्थापित करने और ऐसा मौजूदा स्कूलों का उन्नयन और विस्तार करना होगा। जहां स्कूल नहीं हैं, वहां अतिरिक्त गुणवत्तापूर्ण स्कूल बना कर और छात्रावासों, विशेष कर बालिका छात्रावासों तक सुरक्षित और व्यावहारिक पहुंच प्रदान करना होगा, ताकि सभी बच्चों को अच्छे स्कूल में जाने और समुचित स्तर तक पढऩे का अवसर मिले।

प्रवासी मजदूरों के बच्चों और विविध परिस्थितियों में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों को मुख्य धारा शिक्षा में वापस लाने के लिए सिविल समाज के सहयोग से वैकल्पिक और नवीन शिक्षा केंद्र स्थापित करना होगा।

दूसरा यह कि स्कूलों में सभी बच्चों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए उनकी ट्रैकिंग करनी होगी। उनके सीखने के स्तर और उनकी उपस्थिति पर नजर रखनी होगी। इस बात ध्यान होगा कि ड्रॉपआउट से लौटने वाले बच्चे पीछे न रह जायें।

फाउंडेशन स्टेज से लेकर 12वीं कक्षा तक की स्कूली शिक्षा के जरिये 18 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने के लिए बुनियादी सुविधा की व्यवस्था करनी होगी। प्रशिक्षित शिक्षकों एवं कर्मियों की भरती करनी होगी।

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