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नई शिक्षा नीति में पूंजीपतियों के लिए सस्ते और कुशल श्रमिक तैयार किए जाने पर दिया जा रहा है जोर

Janjwar Desk
13 Jan 2023 7:42 AM GMT
नई शिक्षा नीति में पूंजीपतियों के लिए सस्ते और कुशल श्रमिक तैयार किए जाने पर दिया जा रहा है जोर
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प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक की औपचारिक शिक्षा केवल श्रम के खरीददारों, पूंजीपति धनवानों के कारखानों, घरों और संस्थानों में श्रम बेचने वाले नौकर पैदा करने तक सीमित है और उसी उद्देश्य से दी जा रही है....

Varansi news : फ़ातिमा-सावित्री जनसमिति की ओर से फ़ातिमा शेख की स्मृति में स्वयंवर वाटिका में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनवादी विमर्श मंच के संयोजक हरिहर प्रसाद ने कहा कि नई शिक्षा नीति संयुक्त राष्ट संघ के सतत विकास एजेंडे को अमल में लागू करने के लिए लागू की जा रही है। इसके तहत देसी-विदेशी पूँजीपतियों के लिए सस्ते व कुशल श्रमिक तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके चलते उच्च शिक्षा महंगी हो जाएगी। सभी के लिए समान व निःशुल्क शिक्षा की पुरजोर हिमायत करते हुए उन्होंने कहा कि अगर इसका विरोध नहीं किया गया तो गरीबों-वंचित तबके के बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित हो जाएंगे और केवल अमीरों के बच्चे ही ऊंची शिक्षा हासिल कर पाएंगे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ, वाराणसी की सचिव डॉ. वंदना चौबे ने कहा कि अंग्रेजों के समय में भारत का जो औपनिवेशिक ढाँचा था, उसे वे अपने दम पर अकेले नहीं चला रहे थे। यहाँ की जो ब्राह्मणवादी ताकतें थीं, संपन्न लोगों की जो ताकतें थीं, जिनके पास संपत्ति थी, प्रभुत्व था, जाति की ताकत थी, उन सारी ताकतों के साथ उन्होंने गठजोड़ किया। इतना आसान नहीं था उनके लिए भारत की जनता के साथ लोहा लेना। उन्होंने बड़े लोगों से गठजोड़ करके अपना शासन यहाँ पर फैलाया और यहाँ की शिक्षा पर सबसे पहले प्रहार किया।

उन्होंने कहा कि आजादी मिलने के बाद भी शिक्षा व्यवस्था में बहुत हद तक निरंतरता बनी रही। वर्तमान दौर को साम्राज्यवाद का दूसरा दौर बताते हुए उन्होंने कहा कि सरकारी संस्थानों को लेकर आजादी के बाद जनता में विश्वास था। सरकारी चीजों पर भरोसा था, लेकिन धीरे-धीरे 90 के दौर में यह भरोसा छीजने लगा। प्राइवेट के पक्ष में पूंजी की मदद से माहौल बनाया गया। हर सरकारी चीज पर अविश्वास प्रकट किया जाने लगा और इस तरह से नैरेटिव बनाया गया कि जनोपयोगी सेवाओं के सभी क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दीजिए।

प्रचार और विज्ञापन का पूरा दौर आया और बताया गया कि पूँजीपतियों और कंपनियों के लिए सब कुछ खोल देने का नाम ही आजादी है। उन्होंने कहा कि जब शिक्षा-स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार के पास होती है तो उनकी खराब गुणवत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का हमारा हक़ होता है क्योंकि हम वोट देकर सरकार बनाते हैं। लेकिन जब उन्हें निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाता है तो हम बोल ही नहीं पाते हैं क्योंकि निजी क्षेत्र तो अपने मुनाफे के लिए ही सभी गतिविधियों को संचालित करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता पवन कुमार ने कहा कि आज की पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के श्रम को भी बाजारी वस्तु बना दिया है और हम लोग अपने श्रम को बेचकर पैसे का अर्जन करते हैं और इस पैसे से अपने जरूरत की चीजें बाजार से खरीदते हैं। इस पूंजीवादी बाजारवाद में शिक्षा जीवन की अन्य जरूरतों जैसे स्वास्थ्य, परिवार के परिवेश से, मकान, भोजन, कपडा आदि से अलग थलग नहीं है, बल्कि सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

शिक्षा केवल स्कूल और कॉलेजों में मिलने वाली औपचारिक शिक्षा ही नहीं है, बल्कि इस औपचारिक शिक्षा के साथ अनौपचारिक शिक्षा जन्म के साथ ही माँ बाप से, परिवार के परिवेश से,आसपास के परिवेश से और परिवार के आर्थिक सामाजिक हालातों से मिलने लगती है और आजकल के व्हाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य सामाजिक मीडिया के माध्यम से यह अनौपचारिक शिक्षा लगातार दी जा रही है।

औपचारिक शिक्षा में जहाँ उच्च शिक्षा केवल धनवानों और श्रम खरीदने वाले पुन्जीवानों तक ही सीमित की जा रही है और अपना श्रम बेचकर जीविकोपार्जन करने वालों की पहुँच से दूर होती जा रही है, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक की औपचारिक शिक्षा केवल श्रम के खरीददारों, पूंजीपति धनवानों के कारखानों, घरों और संस्थानों में श्रम बेचने वाले नौकर पैदा करने तक सीमित है और उसी उद्देश्य से दी जा रही है।

दूसरी तरफ, अनौपचारिक शिक्षा जो विभिन्न सामाजिक और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा दिन रात दी जा रही है, वह लोगों के दिमाग में एक दुसरे के खिलाफ धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के आधार पर एक दूसरे के खिलाफ जहर पैदा कर रही है, ताकि औपचारिक शिक्षा के बाजारीकरण जैसी समस्यायों पर लोगों का ध्यान न जाए और लोग इसके खिलाफ लामबंद न होकर एक दुसरे के खिलाफ ही लड़ते रहे। यह अनौपचारिक शिक्षा यह झूठी दिलासा देने का प्रयास कर रही है कि इसी व्यवस्था में जन साधारण अर्थात श्रम बेचकर जीवन निर्वाह करने वालों के भी अच्छे दिन आ जायेंगे और केवल धैर्य की जरूरत है।

वक्ताओं ने कहा, फातिमा शैख़ और सावित्री बाई फुले को याद करने की सार्थकता इसी में है कि जैसे उन्होंने अपने समय में जनसाधारण में सामान्य शिक्षा के लिए स्कूल खोला और अंग्रेज सरकार से उच्च शिक्षा के स्थान पर, जिनसे उस समय केवल ब्राह्मण या उच्च वर्ग को ही ज्यादा लाभ हो रहा था, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने और इस पर धन खर्च करने की गुजारिश की थी, उससे तरह आज के परिवेश में हमें उच्च शिक्षा को सर्वसुलभ करने और शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ लामबंद होना चाहिए।

आज की पूंजीवादी राजसता, पहचानवाद की राजनीति कर रही है। पिछड़ावाद, जातिवाद, नारीवाद, पुरुषवाद, क्षेत्रवाद आदि अनेक पहचानें खड़ी की जा रही हैं और इनमें जन सामान्य के मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। हम श्रम बेचकर जीविकोपार्जन करने वालों को, श्रम खरीदने और श्रमिकों के शोषण पर लगातार बढ़ने वाले परजीवी पूंजीपतियों और शोषकों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। जातीय, धार्मिक, क्षेत्रीय और अन्य पहचानों को छोड़कर इन आधारों पर होने वाले भेदभावों के विरुध्ध हमारा संघर्ष इस तरह का हो कि जाति, धर्म, आदि की पहचान खतम हो।

शिक्षा को अन्य समस्यायों के साथ समेकित रूप से जोड़कर लड़ने की आवश्यकता है। वक्ताओं ने कहा, पूरी राजसत्ता के खिलाफ लामबंद होना होगा। यह पूंजीवादी व्यवस्था एक हाथी की तरह है और इसको पुरी समग्रता में, इसके हर अंग को देखते हुए इसके हर रूप चुनौती देनी होगी। ऐसा करके ही हम फातिमा शेख़ और सावित्री बाई फुले जैसे लोगों के असमानता और भेदभाव के विरूद्ध संघर्षों को सार्थक परिणति दे पायेंगे।

सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट शहजाद ने कहा कि सावित्रीबाई फुले व फातिमा शेख को आज के दौर में याद किया जा रहा है, क्योंकि उस दौर में कमजोर वर्ग पिछड़ी वर्ग को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं दिया गया था। दुनिया का भी इतिहास गवाह है जहां वेश्या को सिर्फ विज्ञान को लागू करने के लिए कड़ी से कड़ी सजा दी गई और उनकी हत्या कर दी गई। क्लारा जेटकिन ने भी महिलाओं के पक्ष में क्रांति और आंदोलन किया, जिसमें महिला राष्ट्रीय अधिकार विश्व में मनाया जाता है। इसकी संस्थापक क्लारा जेटकिन ही हैं।

भारत में महिला सशक्तीकरण के नाम पर झूठा प्रचार किया जाता है कि महिला बहुत आगे बढ़ रही है, वास्तव में महिलाओं की भी स्थिति जो सामंती दौर में थी वही आज है। महिलाओं के 3 मूल अधिकार आज तक उनको नहीं मिल पाए। अपनी मर्जी से शादी करने का अधिकार आज तक नहीं मिल पाया, कितने बच्चे पैदा करेंगे यह भी अधिकार नहीं मिल पाया। आज निर्णय करने का भी अधिकार नहीं मिल पाया, महिलाओं को जब तक यह तीन मूल अधिकार नहीं मिलेंगे भारत में सशक्तीकरण का प्रचार पूरा झूठा प्रचार साबित होगा।

ऐसे में फातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले की शिक्षा नीति को जन-जन तक पहुंचाना बहुत जरूरी है। महिलाएं पढ़ना लिखना सीखें और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। यह तभी संभव हो सकता है जब उत्पादन के क्षेत्र में महिलाओं को भी बराबर से हिस्सेदारी दी जाएगी और उनका सम्मान किया जाएगा। उनको मुफ्त शिक्षा दी जाएगी, उनके बच्चों को दवा इलाज किया जाएगा, उनके आवास की व्यवस्था की जाएगी, किसी भी तरह का कोई शोषण नहीं किया जाएगा।

आज भी बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर गुजरता है। अंधविश्वास, धर्म, जाति, भाषा, लिंग सभी वाद ने इस दुनिया को गर्त में डालने का काम किया है। जिन देशों ने इसको समझ लिया, आज कम्युनिज्म को स्वीकार कर लिया, वह देश खुशहाल हैं। जिन देशों ने इसको स्वीकार नहीं किया वह आज भी झूठ फरेब मक्कारी के दौर से गुजर रहे हैंं। हमारे देश में भी विकास तभी संभव है जब उत्पादन की पद्धति से संबंधित शिक्षा पद्धति होगी और इस पद्धति के द्वारा महिला या पुरुष दोनों का ही विकास हो पाएगा।

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