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पर्यावरण

1000 चक्कर के बाद वायुयान के इंजन में जमा हो सकती है 10 किलोग्राम तक धूल, अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

Janjwar Desk
15 July 2024 12:23 PM GMT
1000 चक्कर के बाद वायुयान के इंजन में जमा हो सकती है 10 किलोग्राम तक धूल, अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा
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वायुयान के एक बार उतरने और फिर उड़ने के दौरान इंजन में जमा होने वाले धूल की मात्रा कम लग सकती है, पर लम्बे समय में यह मात्रा प्रभावी हो जाती है। ऐसे हवाई अड्डों पर एक विमान के लगभग 1000 चक्कर के बाद इंजन में 10 किलोग्राम धूल जमा हो सकती है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

A new study reveals that high concentration of dust or sand in the air enhances the wear and tear of airplane engines and Delhi airport is worst in this regard. धूल की हवा में अत्यधिक सांद्रता के दौरान शहरों के ऊपर कम ऊँचाई पर उड़ते विमान या इनके हवाई अड्डे पर उतरते समय और उड़ते समय इनके इंजनों में धूल जम जाती है और इससे इंजन में आकस्मिक खराबी आ सकती है। हवा में धूल की अत्यधिक सांद्रता से उत्तरी भारत समेत दुनिया के अनेक क्षेत्र जूझ रहे हैं, पर गर्मी के दिनों में यह समस्या नई दिल्ली में दुनिया के किसी भी दूसरे हवाई अड्डे की अपेक्षा अधिक रहती है। इस अध्ययन को यूनाइटेड किंगडम स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग के मौसम वैज्ञानिक डॉ. क्लेयर राईडर के नेतृत्व में किया गया है और इसे नेचुरल हजार्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

वायुयानों के उत्सर्जन को लेकर वैज्ञानिक और जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित कार्यकर्ता लगातार चर्चा करते हैं, अत्यधिक वायु प्रदूषण के दौरान जब हवा में स्मौग की सांद्रता अधिक हो जाती है और दूर तक देखने की क्षमता प्रभावित होती है उस दौरान वायुयानों का आवागमन बाधित होता है। पर, यह नया अध्ययन अपनी तरह का पहला अध्ययन है, जो धूल के कारण होने वाले वायु प्रदूषण का वायुयानों पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट करता है।

इस अध्ययन के लिए दुनिया के व्यस्ततम हवाई अड्डों में से 10 ऐसे अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों को चुना गया जहां हवा में धूल की सांद्रता अत्यधिक रहती है। लगभग 17 वर्षों के वायु प्रदूषण और मौसम से सम्बंधित आंकड़े ऐसे हवाई अड्डे वाले शहरों के एकत्रित कर उनके विश्लेषण से हवा में धूल की मात्रा का आकलन किया गया। डॉ. क्लेयर राईडर के अनुसार हालांकि वायुयान के एक बार उतरने और फिर उड़ने के दौरान इंजन में जमा होने वाले धूल की मात्रा कम लग सकती है, पर लम्बे समय में यह मात्रा प्रभावी हो जाती है। ऐसे हवाई अड्डों पर एक विमान के लगभग 1000 चक्कर के बाद इंजन में 10 किलोग्राम धूल जमा हो सकती है।

एक वायुयान यदि ऐसे हवाई अड्डे पर लगभग तीन साल लगातार हरेक दिन महज एक चक्कर भी लगा ले तो यह स्थिति पैदा हो जायेगी। गर्मी से यह धूल पिघल कर इंजन के अन्दर एक ठोस खनिजीय आवरण तैयार करती है। इस आवरण से इंजन के अन्दर हवा का प्रवाह बाधित होता है और इंजन जल्दी ही खराब हो सकता है या फिर अपनी पूरी दक्षता से काम करना बंद कर सकता है।

हवा में रेत और धूल की सबसे अधिक समस्या अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान के आसपास के शहरों, मध्यपूर्व के देशों और उत्तर भारत में है। रेगिस्तान के पास और मध्यपूर्व में अधिकतर रेत की समस्या है, रेत के कण अपेक्षाकृत भारी होते हैं और हवा में बहुत दूर तक या बहुत ऊंचाई पर असर नहीं छोड़ते, जबकि उत्तरी भारत में धूल की समस्या है और महीन धूल हवा में ऊंचाई तक और बड़े क्षेत्र पर अपना असर छोड़ती है।

डॉ. क्लेयर राईडर के अनुसार गर्मी के दिनों में वायुयानों पर धूल का सबसे अधिक प्रभाव दिल्ली के हवाई अड्डे पर पड़ता है। गर्मी के दिनों में दिल्ली में धूल भरी आंधी का चलना सामान्य है, जिससे यहाँ की हवा में धूल की सांद्रता बढ़ जाती है। दिल्ली हवाई अड्डे पर वायुयानों के उतरने के दौरान उनके इंजन में औसतन 6.6 ग्राम धूल जाती है, जबकि उड़ने के दौरान औसतन 4.9 ग्राम प्रति उड़ान धूल जमा होती है। इसके मुकाबले, नाइजर में वायुयान उतरने के दौरान 4.7 ग्राम, दुबई में 4.3 ग्राम और बीजिंग में 2.9 ग्राम धूल वायुयानों के इंजन में जाती है।

इस अध्ययन के अनुसार वायुयानों के इंजन केवल उतरते और उड़ते समय ही धूल से प्रभावित नहीं होते, बल्कि दिल्ली जैसे व्यस्त हवाई अड्डों पर उतरने की अनुमति प्राप्त करने में ही 15-20 मिनट का समय लगना सामान्य है और इससे धूल का प्रभाव बढ़ जाता है। हवाई अड्डे के पास पहुंचकर उतरने अनुमति प्राप्त करने तक वायुयान लगभग 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ते हुए हवा में शहर के चक्कर लगाते हैं।

हवा में धूल की सांद्रता लगभग डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई तक अत्यधिक प्रभावी रहती है। दिल्ली में वायुयान से जब आप ऊपर उठते हैं तब आसमान में धूल की परत बिलकुल स्पष्ट नजर आती है। हवा में एक किलोमीटर की ऊँचाई पर 10 से 15 मिनट तक उड़ने वाले वायुयानों के इंजन में जितनी धूल जमा होती है, उसकी मात्रा इसके उतरने और उड़ने के दौरान जमा होने वाली धूल से भी अधिक होती है। धूल का प्रभाव वायुयान के रनवे पर उतरने से लेकर उसके रुकने की जगह तक पहुँचने के समय पर भी निर्भर करता है, जितना अधिक समय लगेगा इंजन में उतनी अधिक धूल जमा होगी।

संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड मेटेरियोलोजिकल आर्गेनाईजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार हवा में धूल की समस्या दुनिया में हरेक जगह है और तापामान बृद्धि के असर से इसका असर बढ़ता जा रहा है। हरेक वर्ष औसतन लगभग 200 करोड़ टन धूल हवा में मिलती है और वर्ष 2023 में वैश्विक स्तर पर हवा में इसकी औसत सांद्रता 12.7 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर आंकी गयी है।

डॉ क्लेयर राईडर के अनुसार अत्यधिक धूल वाले क्षेत्रों में वायुयानों पर धूल के प्रभाव को कम करने के लिए ऐसे हवाई अड्डों पर अधिकतर वायुयानों का परिचालन दिन के बदले रात में करना चाहिए, क्योंकि धूल-भरी आंधी अधिकतर दोपहर में आती है। उतरने की अनुमति का इंतज़ार करते विमानों को हवा में शहर का चक्कर मारने की ऊँचाई लगभग 2 किलोमीटर करनी चाहिए, इतनी ऊँचाई पर हवा में धूल की सांद्रता कम हो जाती है।

संदर्भ:

1. Claire L. Ryder et al, Aircraft engine dust ingestion at global airports, Natural Hazards and Earth System Sciences (2024). DOI: 10.5194/nhess-24-2263-2024 , nhess.copernicus.org/articles/24/2263/2024/

2. https://wmo.int/news/media-centre/wmo-bulletin-spotlights-hazards-and-impacts-of-sand-and-dust-storms

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