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पर्यावरण

दुनिया के बड़े बैंक पर्यावरण कर रहे हैं बड़ा विनाश, विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में किया खुलासा

Janjwar Desk
31 Oct 2020 10:21 AM GMT
दुनिया के बड़े बैंक पर्यावरण कर रहे हैं बड़ा विनाश, विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में किया खुलासा
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रिपोर्ट बनाने वाली कंपनी पोर्टफोलियो अर्थ, दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों, पर्यावरणविदों और बैंकों से अवकाशप्राप्त अधिकारियों का समूह है और जिसका मुख्य काम बैंकिंग गतिविधियों से समाज को पहुँचाने वाले नुकसान का आकलन करना है....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। एक नई रिपोर्ट के अनुसार भारत के स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया समेत दुनिया के सभी बड़े बैंक ऐसी परियोजनाओं की आर्थिक मदद में संलग्न हैं, जिनके कारण प्रजातियों के विलुप्तीकरण की दर बढ़ रही है और जैव विविधता नष्ट हो रही है। पोर्टफोलियो अर्थ नामक संस्था द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट "बैंकरोलिंग एक्सटीन्क्शन" में दुनिया के 50 बड़े बैंकों द्वारा परियोजनाओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत आकलन किया गया है।

इन बैंकों में बैंक ऑफ़ अमेरिका, सिटीग्रुप, जेपी मॉर्गन चेज, बर्कलेज, एसएमबीसी, एचएसबीसी, मित्सुबिशी यूऍफ़जे, बीएनपी परिबास, वेल्स फ़ार्गो, मिजुहो फाइनेंसियल और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जैसे बैंक शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार इन बैंकों ने पिछले वर्ष सम्मिलित तौर पर 2.6 खरब डॉलर की वित्तीय मदद ऐसी गतिविधियों के लिए की जिससे पारिस्थिकी तंत्र को नुकसान पहुँच रहा है या फिर जैव-विविधता प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के किसी भी बैंक की नीतियों में जैव-विविधता के प्रभाव के आकलन का समावेश नहीं है। रिपोर्ट बनाने वाली कंपनी पोर्टफोलियो अर्थ, दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों, पर्यावरणविदों और बैंकों से अवकाशप्राप्त अधिकारियों का समूह है और जिसका मुख्य काम बैंकिंग गतिविधियों से समाज को पहुँचाने वाले नुकसान का आकलन करना है।

हमारे देश में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने 2019 में दिए गए कुल लोन का लगभग 1 प्रतिशत से अधिक ऐसी परियोजनाओं को दिया है जिससे पर्यावरण को सीधा नुकसान पहुँच रहा है। कुल लोन का 0.31 प्रतिशत जीवाश्म ईंधन वाली परियोजनाओं को दिया गया है, जिससे तापमान बृद्धि में बढ़ोत्तरी होगी और 0.48 प्रतिशत ऐसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए दिया गया है जिससे जैव-विविधता प्रभावित होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त कुछ और लोन हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को अप्रत्यक्ष तौर पर नुकसान पहुंचा रहे हैं।

वर्ष 2016 में जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित पेरिस समझौते के दौरान दुनिया के बैंकों और वित्तीय संस्थानों से विशेषज्ञों ने आग्रह किया था कि जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि को बढाने वाली परियोजनाओं को मदद करना बंद करें, पर इसका असर आज तक नजर नहीं आ रहा है। रेनफारेस्ट एक्शन नेटवर्क नामक संस्था द्वारा मार्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पेरिस समझौते के बाद से दुनिया के 35 बड़े बैंक 2.2 खरब डॉलर का लोन ऐसी परियोजनाओं को स्वीकृत कर चुके हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन में तेजी आयेगी और तापमान और बढेगा।

जलवायु परिवर्तन तो अब अधिकतर बैंकों की नीतियों में शामिल हो गया है, पर जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर किसी का ध्यान नहीं है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा बनाई गई 'इन्टरगवर्नमेंटल साइंस पालिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम्स सर्विसेज' के अनुसार जैव-विविधता को नुकसान पहुंचाने में कृषि, वानिकी, खनन, जीवाश्म इंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यटन और परिवहन क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक है, पर बैंक इन्हीं क्षेत्रों में अधिक मदद कर पारिस्थितिकी तंत्र को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।

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