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पर्यावरण

Plastic Waste : दुनियाभर में प्रत्येक वर्ष पैदा होता है 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा, इससे निपटने के लिए नया अंतर्राष्ट्रीय समझौता

Janjwar Desk
11 March 2022 8:09 AM GMT
Plastic Waste : दुनियाभर में प्रत्येक वर्ष पैदा होता है 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा, इससे निपटने के लिए  नया अंतर्राष्ट्रीय समझौता
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(दुनियाभर में प्रत्येक वर्ष पैदा होता है 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा, इससे निपटने के लिए नया अंतर्राष्ट्रीय समझौता)

Plastic Waste : हरेक वर्ष दुनिया से 30 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न होता है, यह वजन पृथ्वी के सभी मनुष्यों के सम्मिलित वजन के बराबर है, इस कचरे में से प्रतिवर्ष 1.2 करोड़ टन कचरा महासागरों तक पहुँच जाता है.....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

Plastic Waste : इस पृथ्वी पर सही मायने में यदि कुछ सार्वभौमिक और सर्वव्यापी है – तो वह है प्लास्टिक कचरा। इससे निपटने के लिए अनेक देशों ने या यूरोपियन यूनियन जैसे क्षेत्रों ने अपने स्तर पर प्रयास किये हैं, पर इसकी समस्या पहले से अधिक विकराल होती जा रही है। इस वर्ष फरवरी महीने के शुरू में केन्या के नैरोबी स्थित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UN Environmental Program) ने ऐलान किया था कि फरवरी के अंत में आयोजित किये जाने वाले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण अधिवेशन के पांचवें सत्र (5th Session of UN Environment Assembly) के दौरान प्लास्टिक कचरे की समस्या पर गहन चर्चा की जायेगी।

1 मार्च को इस अधिवेशन के तहत भारत समेत दुनिया के 175 देशों ने प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने के लिए एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये। इसके तहत प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र, यानि उत्पादन से कचरे के निपटान तक, को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए वर्ष 2024 के अंत तक एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते का प्रारूप और इसके लिए फण्ड के इतजाम की प्रक्रिया तैयार कर ली जायेगी। यह समझौता जलवायु परिवर्तन नियंत्रण (Agreement Climate Change Control) के सम्बन्ध में 176 देशों द्वारा स्वीकृत पेरिस समझौते (The Paris Agreement) की तर्ज पर होगा, जिसे सभी देशों को मानने की बाध्यता रहेगी।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की प्रमुख इंगेर एंडरसन (Inger Anderson) के अनुसार प्लास्टिक कचरे को नियंत्रित करने का यह समझौता, जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने से सम्बंधित 2015 के पेरिस समझौते के बाद पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सबसे बड़ा समझौता है, और वतर्मान पीढी के साथ ही भविष्य की पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह एक बीमा की तरह है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण अधिवेशन के पांचवें सत्र के अध्यक्ष और नोर्वे के पर्यावरण मंत्री एप्सें बर्थ एइडे (Epsen Barth Eide) ने कहा कि प्लास्टिक कचरे की समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि रूस-उक्रेन युद्ध के बीच यह समझौता किया जा रहा है।

पर्यावरण वैज्ञानिक इस दौर को "मानव युग" (Anthropocene) का नाम देते हैं, क्योंकि पृथ्वी पर हरेक जगह मानव के पदचिन्ह पहुँच चुके हैं। मनुष्य का जो उत्पाद सही मायने में सर्वव्यापी है, वह है प्लास्टिक का कचरा। इसका प्रभाव इस कदर बढ़ चुका है कि जिस तरह मनुष्य के विकास के क्रम को वैज्ञानिक ताम्बा युग और लौह युग में बाँटते हैं, उसी तरह आज का युग प्लास्टिक युग कहा जाने लगा है।

प्लास्टिक पर सबसे अधिक चर्चा महासागरों के सन्दर्भ में की गयी है जहां हरेक वर्ष एक करोड़ बीस लाख प्लास्टिक कचरा पहुंचता है, पर अब तो यह दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर माउंट एवेरेस्ट पर, पृथ्वी के दोनों ध्रुवों पर, हवा में, पानी में और यहाँ तक की खाद्य पदार्थों में भी मिलने लगा है।


प्लास्टिक के 5 मिलीमीटर से छोटे आकार के टुकडे, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है और 0.001 मिलीमीटर से छोटे टुकडे जिन्हें नैनोप्लास्टिक कहा जाता है- आज के दौर में पृथ्वी के हरेक हिस्से में मिलते हैं, हरेक पशु-पक्षी और मानव के शरीर में मिलते है और इनकी सांद्रता वैज्ञानिकों के आकलन से भी अधिक है।

पार्टिकल एंड फाइबर टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार गर्भवती चूहों के फेफड़े से गर्भ में पल रहे शिशु के ह्रदय, मस्तिष्क और दूसरे अंगों तक माइक्रोप्लास्टिक आसानी से पहुँच जाता है। इस अध्ययन को रुत्गेर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फोएबे स्ताप्लेतों की अगुवाई में किया गया है, और इस अध्ययन के अनुसार जिन गर्भस्थ शिशुओं में माइक्रोप्लास्टिक या नैनोप्लास्टिक पहुंचता है, उन शिशुओं का वजन सामान्य शिशुओं से कम रहता है। अध्ययन के दौरान जब गर्भवती चूहे को माइक्रोप्लास्टिक के माहौल में रखा गया तब महज 90 मिनट के भीतर यह प्लास्टिक प्लेसेंटा तक पहुँच गया।

वर्ष 2019 और 2020 के दौरान किये गए अनेक अध्ययनों में गर्भवती महिलाओं के प्लेसेंटा में और पल रहे गर्भस्थ शिशुओं में नैनोप्लास्टिक पाए गए हैं। अक्टूबर, 2020 में डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज के वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार जिन शिशुओं को प्लास्टिक की बोतल से दूध पिलाया जाता है, उनके शरीर में दूध के साथ लगातार नैनोप्लास्टिक जाता है। प्लास्टिक का कचरा महासागर के जीवों से लेकर गायों के पेट तक पहुँच रहा है। इन सबकी खूब चर्चा भी की जाती है। पर वर्ष 2019 में प्रकाशित एक शोधपत्र यह बताता है कि एक औसत मनुष्य प्रतिवर्ष भोजन के साथ और सांस के साथ प्रतिवर्ष लगभग सवा लाख प्लास्टिक के टुकड़े को अपने शरीर के अन्दर पहुंचा रहा है। यह अनुसंधान एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया था।

इस शोधपत्र के मुख्य लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ़ विक्टोरिया के वैज्ञानिक डॉ किएरन कॉक्स हैं। इस दल ने खाद्य पदार्थों में मौजूद प्लास्टिक से सम्बंधित प्रकाशित अनेक शोधपत्रों के अध्ययन, वायु में मौजूद प्लास्टिक की सांद्रता और मनुष्य के प्रतिदिन के औसत खाद्य पदार्थ के आधार पर यह बताया कि उम्र और लिंग के आधार पर औसत मनुष्य प्रतिवर्ष 74000 से 121000 के बीच प्लास्टिक के टुकड़ों को ग्रहण करता है।

कुल मिलाकर हालत यह है कि प्रतिदिन एक सामान्य मनुष्य प्लास्टिक के 142 टुकड़े खाद्यपदार्थों के साथ और 170 टुकड़े सांस के साथ अपने शरीर के भीतर डालता है। इस शोधपत्र के अनुसार यदि कोई केवल बोतलबंद पानी ही पीता है, तब उसके शरीर में प्रतिवर्ष 90000 प्लास्टिक के अतिरिक्त टुकड़े जाते हैं।

प्लास्टिक के नुकसान यहीं तक सीमित नहीं हैं। नए अनुसंधान इसे तापमान बृद्धि और जलवायु परिवर्तन से भी जोड़ने लगे हैं। सेंटर फॉर इंटरनेशनल एनवायर्नमेंटल लॉ नामक संस्था द्वारा कराये गए एक अध्ययन के अनुसार केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकने वाला प्लास्टिक जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभा रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन में से 13 प्रतिशत से अधिक का योगदान प्लास्टिक के उत्पादन, उपयोग और अपशिष्ट का होगा, जो लगभग 615 कोयले से चलने वाले ताप-बिजली घरों जितना होगा। इस संस्था के अनुसार प्लास्टिक के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की तो खूब चर्चा की जाते है पर इसके तापमान बृद्धि में योगदान को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

एक अध्ययन के अनुसार विश्व में 20 नदियाँ ऐसी हैं जिनके माध्यम से महासागरों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक जाता है। इसमें पहले स्थान पर चीन की यांग्तज़े नदी है, जिससे प्रतिवर्ष 333000 टन प्लास्टिक महासागरों तक पहुंचता है। दूसरे स्थान पर गंगा नदी है जिससे 115000 टन प्लास्टिक प्रतिवर्ष जाता है। तीसरे स्थान पर चीन की क्सी नदी, चौथे पर चीन की ही हुंग्पू नदी और पांचवे स्थान पर नाइजीरिया और कैमरून में बहने वाली क्रॉस नदी है।

इन बीस नदियों में से चीन में 6, इंडोनेशिया में 4, नाइजीरिया में 3 नदियाँ स्थित है। इसके अतिरिक्त भारत, ब्राज़ील, फिलीपींस, म्यांमार, थाईलैंड, कोलंबिया और ताइवान में एक-एक नदी स्थित है। स्पष्ट है की महासागरों तक प्लास्टिक पहुंचाने वाली अधिकतर नदियाँ एशिया में स्थित है। वर्ष 2014 में वैज्ञानिकों के एक दल ने अनुमान लगाया था कि महासागरों में 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकडे हैं, जिनका वजन 25 लाख टन है। पर, नए आकलन बताते हैं की महासागरों में प्लास्टिक की मात्रा इससे लगभग 10 गुना अधिक है। वर्ष 2019 के आकलन के अनुसार महासागरों के प्लास्टिक केवल महासागरों में ही नहीं रहते, बल्कि इसमें से 136000 टन प्लास्टिक हरेक वर्ष वायुमंडल में मिल जाता है। माहासागारों में प्लास्टिक की सघनता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कुछ जगहों पर प्लास्टिक का घनत्व 19 लाख टुकडे प्रति वर्ग मीटर है।

प्लास्टिक के छोटे टुकडे जो हवा में तैरते हैं और सांस के साथ हमारे अन्दर जाते हैं, उनपर खतरनाक रसायनों, हानिकारक बैक्टीरिया और वाइरस का जमावड़ा भी हो सकता है। कुछ मामलों में इसके असर से कैंसर भी हो सकता है। प्लास्टिक का मानव शरीर में आकलन कठिन काम है, शायद इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन लगातार बताता है की प्लास्टिक हरेक जगह है, मानव अंगों में भी है, पर इससे कोई नुकसान नहीं होता। वर्ष 2020 में एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शरीर में प्लास्टिक की उपस्थिति को परखने का एक नया तरीका खोजा है।

वरुण कलाकार, इस दल की अगुवाई कर रहे हैं और इनके अनुसार अधिकतर प्लास्टिक उत्पादन में बिसफिनॉल ए नामक रसायन का उपयोग किया जाता है, यदि इस रसायन को मानव उत्तकों में मापा जाए तो इससे प्लास्टिक का पता किया जा सकता है। इस अध्ययन दल ने मानव उत्तकों के जितने भी नमूनों का परीक्षण किया है, सबमें बिसफिनॉल ए नामक रसायन की उपस्थिति पाई गयी है। अमेरिका के एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार बिसफिनॉल ए के असर से विकास और प्रजनन से सम्बंधित प्रक्रियाएं बाधित होती हैं। इस अध्ययन को अमेरिकन केमिकल सोसाइटी की अगस्त 2020 के बैठक में प्रस्तुत किया गया था।

वैज्ञानिक सीधे तौर पर तो नहीं बताते, पर यदि उनके अनुसार माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक पर वायरस और बैक्टेरिया पनप सकते हैं, तो जाहिर है कोविड 19 के वायरस भी इनके द्वारा फैल सकते हैं। वैज्ञानिक पहले ही बता चुके हैं कि यह वायरस हवा में सक्रिय रहता है और प्लास्टिक की सतह पर 8 घंटे से अधिक समय तक सक्रिय रहते हैं। वर्ष 1950 तक पूरी दुनिया में 20 लाख टन प्लास्टिक का प्रतिवर्ष उत्पादन था, जो 2017 तक बढ़कर 40 कार्ड टन तक पहुँच गया।

हरेक वर्ष दुनिया से 30 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न होता है, यह वजन पृथ्वी के सभी मनुष्यों के सम्मिलित वजन के बराबर है। इस कचरे में से प्रतिवर्ष 1.2 करोड़ टन कचरा महासागरों तक पहुँच जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2040 तक महासागरों तक पहुंचाने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा चार-गुनी बढ़ जायेगी। प्लास्टिक के कचरे को पुनः-चक्रित किया जा सकता है, पर संयुक्त राष्ट्र की वर्ष 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में उत्पन्न कुल प्लास्टिक कचरे में से महज 9 प्रतिशत का ही पुनः-चक्र किया जाता है।

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